जमीनी सच्चाई सपा गठबंधन के फेवर में फिर एक्जिट पोल खिलाफ़ क्यों ?
जमीनी सच्चाई सपा गठबंधन के फेवर में फिर एक्जिट पोल खिलाफ़ क्यों ?
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-एम फ़ारूक़ ख़ान
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-एम फ़ारूक़ ख़ान
जयपुर। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सम्पन्न होने के दिन ही 7 मार्च को विभिन्न प्रकार के एक्जिट पोल के आंकड़े सामने आए। इस लेख में अन्य राज्यों की बजाए विशेष तौर पर यूपी चुनाव पर फोकस है, क्योंकि कमोबेश सभी एक्जिट पोल यूपी में भाजपा सरकार को रीपिट कर रहे हैं। यह लेख एक्जिट पोल के अगले दिन 8 मार्च को लिखा गया है, यानी मतगणना से दो दिन पहले। असल आंकड़े तो मतगणना के बाद ही सामने आएंगे। यहाँ सवाल यह है कि कमोबेश सभी राजनीतिक विश्लेषक और धरातल से जुड़े हुए लोग जब सपा गठबंधन की एकतरफा जीत बता रहे हैं, तो फिर एक्जिट पोल के आंकड़े ऐसे कैसे आए ?
पहली बात तो यह है कि एक्जिट पोल एक खुला फर्रुखाबादी खेल है, जो किसी का धन बढ़ाने और किसी की जेब कटवाने के लिए होता है। यानी शुद्ध देशी भाषा में कहा जाए तो यह एक तरह की सट्टेबाजी की लूट व बरबादी है। जिसमें कोई लूटता है और कोई बरबाद होता है। दूसरी बात यह है कि पहले भी कई बार एक्जिट पोल के आंकड़े गलत साबित हुए हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद एक्जिट पोल में भाजपा की खुली जीत बताई जा रही थी, लेकिन परिणाम बहुत ही उलटा आया, ममता बनर्जी को ऐतिहासिक जीत मिली। इसी तरह बिहार चुनाव में भी कुछ एक्जिट पोल भाजपा गठबंधन को खुली जीत दे रहे थे, लेकिन गठबंधन पीछे रहा और अन्तिम दौर में कुछ सीटें मालूमी अन्तर से जीतकर बहुमत बनाया गया। कहा जाता है कि मामूली अन्तर वाली करीब एक दर्जन सीटों पर गिनती में गड़बड़ की गई। इस बात के आरोप वहाँ के प्रमुख विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने भी तब लगाए थे। बहरहाल यहाँ खींचतान कर भाजपा गठबंधन जीत गया और उसने अपनी सरकार बचा ली।
क्या यही फर्रुखाबादी खेल यूपी में खेलने की तैयारी हो चुकी है ? टीवी चैनलों की तरफ से यह भी कहा जा रहा है कि गलत आंकड़े पेश कर हम हमारी विश्वसनीयता को दांव पर क्यों लगाएंगे ? तो इसका सीधा सा जवाब यह है कि इतना कुछ रोज बखान करने और ध्रुवीकरण व भड़काऊ मुद्दों को दिन रात प्राथमिकता से दिखाने के बाद आपकी कोई विश्वसनीयता बची है क्या ? हालांकि कुछ चैनल व पत्रकार आज भी जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन सबको पता है कि पिछले सात आठ साल में चैनलों पर सरकार के खिलाफ जनता के हक़ में आवाज़ उठाने वाले कितने पत्रकारों को धक्के मार कर नौकरी से निकाल दिया गया है।
अब बात करते हैं कि यूपी में जमीनी सच्चाई क्या थी ? पहली तो यह है कि चार महीने पहले ही चुनाव योगी बनाम अखिलेश हो चुका था तथा अखिलेश यादव ने चुनावी माहौल को और मजबूत बनाने के लिए समय रहते जयन्त चौधरी व ओमप्रकाश राजभर सहित कुछ विभिन्न जातियों के हाॅल्ड वाली पार्टियों से गठबंधन बना लिया था। दूसरी बात यह है कि मुस्लिम जो परम्परागत तौर पर भाजपा के खिलाफ़ हैं और पश्चिम उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर इलाके के दंगों के बाद जाट-मुस्लिम में जो दरार पड़ी थी, उसे जयन्त चौधरी ने गांव गांव जाकर पूरी तरह से खत्म करवा दी थी। यानी एक बार फिर दोनों समुदाय जयन्त चौधरी की पार्टी आरएलडी के झण्डे नीचे एकजुट हो गए थे। तीसरी बात यह है कि किसान आन्दोलन ने इस एकजुटता को मजबूत किया और भाजपा के खिलाफ़ वोटर में जबरदस्त माहौल पैदा किया।
चौथी बात यह है कि मुस्लिम, यादव, जाट और ओबीसी की अन्य जातियों ने सपा गठबंधन के फेवर में एकजुट होकर चुनाव को एकतरफा होने जैसा माहौल बना दिया था। पांचवीं बात यह है कि ब्राह्मण वोटर योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा नजरअंदाज करने से नाराज थे और उनमें भी अच्छी खासी संख्या सपा गठबंधन की तरफ साफ जाती नज़र आ रही थी। छठी बात यह है कि जो लोग योगी आदित्यनाथ को हर हाल में हराना चाह रहे थे, वे भी मजबूत ऑप्शन को देखकर सपा गठबंधन की तरफ एकजुट हो गए थे। सातवीं बात यह है कि भाजपा नेताओं की लाख कोशिश के बावजूद सपा गठबंधन के नेताओं ने चुनाव में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण नहीं होने दिया, यह उनकी सबसे बड़ी रणनीति थी, जो सफल रही।
यही सब वजह है कि कमोबेश सभी राजनीतिक विश्लेषक सपा गठबंधन को पहले चरण के चुनाव से ही जीतता बता रहे हैं। रही कसर कम वोटिंग ने पूरी कर दी। सपा गठबंधन के वोटर में जबरदस्त उत्साह था और अधिकतर मजबूत जातियां इस गठबंधन के साथ थी, तो फिर यह तय है कि सपा गठबंधन के पक्ष में जमकर वोटिंग हुई है और जो वोट कम पोल हुआ है, वो भाजपा का घटा है, क्योंकि भाजपा के कोर वोटर में भी इस बार उत्साह नहीं था, ऐसा पहली बार किसी चुनाव में देखा गया है।
इस जमीनी सच्चाई के बाद भी एक्जिट पोल भाजपा को जीता रहे हैं, तो उसके दो कारण और भी हैं, एक यह है कि अगर मतगणना में कम अन्तर वाली सीटों पर गड़बड़ की जाए, तो जनता उखड़े नहीं और उसकी मानसिकता एक्जिट पोल से बन जाए कि भाजपा ही जीत रही थी, सपा गठबंधन बिना बात हार का ठीकरा चुनाव आयोग के माथे फोड़ रहा है। दूसरा कारण यह है कि अगर किसी योजनाबद्ध तरीके से भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव ज्यादा हुआ है और यह वोट बसपा, कांग्रेस व एमआईएम जैसी पार्टियों के खाते में गया है, तो फिर इसका लाभ भाजपा को मिलना तय है।
(08-03-2022)
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