मुख्यमंत्री गहलोत की रोज़ा इफ्तार पार्टी : भाईचारे का सन्देश, शक्ति प्रदर्शन, इज्ज़त अफजाई या रुसवाई ?

मुख्यमंत्री गहलोत की रोज़ा इफ्तार पार्टी : भाईचारे का सन्देश, शक्ति प्रदर्शन, इज्ज़त अफजाई या रुसवाई ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 23 अप्रैल को अपने सरकारी निवास 8-सिविल लाइन्स, जयपुर में एक रोज़ा इफ्तार पार्टी का आयोजन किया। बड़ी संख्या में लोग पूरे प्रदेश से शरीक हुए। रोजेदारों के अलावा हर जाति-समाज से सम्बन्धित पार्टी कार्यकर्ता, नेता, विधायक, मन्त्री, पत्रकार, समाजी व मजहबी रहनुमा और वर्तमान व पूर्व अधिकारी यानी हर तबके के लोग शरीक हुए। इन्तजाम भी हर बार की तरह बेहतरीन था।

 

सबसे पहले तो यह है कि हम ऐसी रोज़ा इफ्तार पार्टियों के फेवर में हैं, क्योंकि ऐसे शासकीय आयोजनों का लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है तथा वे एक दूसरे मजहबी पंथ एवं उसके तीज त्यौहारों का आदर सम्मान करना सीखते हैं। जिससे देश की लोकतांत्रिक व संवैधानिक व्यवस्था का ताना बाना मजबूत रहता है। शासकों की ओर से ऐसे आयोजन विविधता में एकता वाले हमारे देश की एकता व अखण्डता के लिए अति आवश्यक हैं। यह आयोजन गंगा जमुनी तहजीब को मजबूत करते हैं और साम्प्रदायिक ताकतों को कमजोर करते हैं।


अब आते हैं मुख्य मुद्दे की तरफ, पहला भाईचारे का सन्देश। यकीनन ऐसे आयोजन भाईचारे का सन्देश जनता के बीच फैलाते हैं। कमोबेश सभी राजनीतिक पार्टियां और यहाँ तक कि मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति भी ऐसे आयोजन करते हैं। यह जरूर है कि भाजपाई मुख्यमंत्रियों और मोदी सरकार आने के बाद राज्यपालों ने रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन करना छोड़ दिया है। यही हाल अब प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति का है। जिसकी वजह यह है कि भाजपाई डिक्शनरी में "मुसलमानों का आदर सम्मान" करने वाला जुमला ही नहीं लिखा हुआ है। हाँ, वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री थीं, तब वे हर साल मुख्यमंत्री निवास पर एक लाजवाब रोजा इफ्तार पार्टी आयोजित करती थीं। अटल बिहारी वाजपेयी भी प्रधानमंत्री निवास पर इफ्तार पार्टी आयोजित करते थे। लेकिन यह बीते जमाने की बात हो गई, अब तो सत्ता प्राप्ति का साधन ही मुस्लिम विरोध है, तो ऐसे आयोजन का भाजपा को कोई लाभ भी नहीं है। हाँ, देश को जरूर लाभ है, जो भाजपा पहुंचाना नहीं चाहती है, वो तो दिन रात गैंती फावड़ा लिए गंगा जमुनी तहजीब की जड़ें खोदती रहती है।


अब बात करें शक्ति प्रदर्शन के मुद्दे की, तो इस मामले में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत फ़ेल रहे। क्योंकि मुख्यमंत्री निवास में ढाई तीन हज़ार लोगों से ज्यादा का बन्दोबस्त नहीं हो सकता और इससे ज्यादा लोग आएं तो अव्यवस्था हो जाती है। इसलिए बेहतर होता कि यह आयोजन बड़े पैमाने पर और मुख्यमंत्री निवास के अलावा विधानसभा के सामने अमरूदों के बाग में किया जाता, जहाँ लाख-दो लाख लोगों की व्यवस्था आसानी से हो सकती थी तथा मुख्यमंत्री के लिए इतने लोग जमा करना और उनके खाने पीने की व्यवस्था करना कोई मुश्किल काम भी नहीं था। ऐसी बड़ी व ऐतिहासिक रोज़ा इफ्तार पार्टी का पूरे देश में एक सन्देश जाता।


इस बड़े आयोजन में सभी विधायकों, पार्टी पदाधिकारियों और जयपुर में सेवारत अधिकारियों को अनिवार्य रूप से शामिल होने का निर्देश दिया जाता। साथ ही हर समाज व पंथ के मुख्य मुख्य लोगों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता। कार्यक्रम में हर पंथ व समुदाय से सम्बन्धित एक एक व्यक्ति को पांच मिनट बोलने का मौका भी दिया जाता और भाषण का केन्द्र बिन्दु साम्प्रदायिक सौहार्द एवं भाईचारा ही रहता। पूरे कार्यक्रम में मुख्यमंत्री खुद मौजूद रहते। अगर अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों व पूर्व मुख्यमंत्रियों को भी इस विशाल इफ्तार पार्टी में आमंत्रित किया जाता, तो सोने पर सुहागा होता। व्यवस्थित अन्दाज़ में इसका टीवी चैनलों, फेसबुक व यूट्यूब पर लाइव प्रसारण करवाया जाता। अगर ऐसा होता तो देश व दुनिया में बहुत बड़ा सन्देश जाता और जाहिर है कि इससे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कद और बड़ा होता।


अब बात करें इज्ज़त अफजाई या रुसवाई के मुद्दे की। इन्सान किसी भी आयोजन में जाता है, तो वो इज्जत या सम्मान के लिए जरूर जाता है, रुसवाई यानी बेइज्ज़ती के लिए कोई किसी के यहाँ नहीं जाता है। यही बात मुख्यमंत्री की उक्त इफ्तार पार्टी के लिए भी लागू है। इस इफ्तार पार्टी में लोगों को इज्जत कम और रुसवाई ज्यादा मिली। इस इफ्तार पार्टी के निमन्त्रण कार्ड छापे गए, जिन्हें पूरे प्रदेश में भेजा गया। जाहिर सी बात है कि मुख्यमंत्री के आयोजन के कार्डों के वितरण में घालमेल व भाई भतीजावाद होना कोई बड़ी बात नहीं है, पार्टी के नेताओं व आयोजन से जुड़े कुछ अधिकारियों ने निमन्त्रण कार्ड को लेकर औछापन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लोग शाम तक एक अदद कार्ड के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए थे, जिनको सफलता मिली, वे बहुत गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। क्योंकि एन्ट्री कार्ड से थी। लू के थपेडों के बीच प्रदेश के कोने-कोने से रोजेदार चलकर जयपुर आए, यहाँ मुख्यमंत्री निवास पर एन्ट्री की लम्बी लाइन, जो इज्ज़त अफजाई की बजाए जलील करने के लिए काफी थी। किसी के पास कार्ड नहीं था और जयपुर में कार्ड का जुगाड़ होने के वादे पर चलकर आ गया और उसे कतार से अलग कर दिया गया, तो फिर उसमें क्या बीती ? वो तो वो ही जाने।

अब इज्जत व रुसवाई का अगला अध्याय मुख्यमंत्री निवास के अन्दर शुरू होता है। अन्दर पहुंचने वाला हर शख्स दिल में यह ख्वाहिश लिए दाखिल होता है कि मुख्यमंत्री जी के साथ फोटो खिंचवाने या हाथ मिलाने का मौका मिल गया तो उसे किसी भी हाल में जाया नहीं होने देना है, चाहे धक्के चार की जगह 34 लग जाएं। जाहिर सी बात है कि जब मुख्यमंत्री आयोजन में कुछ ही मिनट रूकेंगे, तो सबके नसीब में हाथ मिलाना या फोटो खिंचवाना तो मुमकिन नहीं होगा। हाँ, धक्के जरूर 34 से ज्यादा ही लग जाएंगे। यहाँ उन लोगों की तारीफ़ करना भी जरूरी है, जो हाथ मिलाने या फोटो खिंचवाने की बजाए दूर से एंगल बैठा कर मुख्यमंत्री के चेहरे को अपनी सेल्फी में कैद करने में सफल रहे। यह लोग वाकई बड़े सिस्टोमेटिक हैं और इनसे सीखने की भी जरूरत है कि कम धक्के खाकर इतनी बड़ी सफलता कैसे हासिल की जाए ? मुख्यमंत्री गहलोत इस आयोजन के दौरान अपने निवास में ही थे, अगर वे लोगों के बीच तीन चार घण्टे रहते, तो हाथ मिलाने या फोटो खिंचवाने वाले लोगों को ज्यादा मौका मिलता और वो भी बिना धक्के खाए। अगर उनके पास इतना वक्त नहीं था, तो फिर रोजेदारों को जलीलो ख्वार करने वाली ऐसी इफ्तार पार्टी आयोजित ही नहीं करनी चाहिए थी।

अब बात करें इफ्तार पार्टी के बाद मुख्यमंत्री ने अपने फेसबुक वाॅल पर जो खबर लगाई उसकी। सबसे पहले आप उस खबर को पढ लीजिए जो हूबहू निम्न है:-

"मुख्यमंत्री निवास पर पवित्र रमजान महीने के 21वें रोजे पर इफ्तार की। इस अवसर पर प्रदेशभर से आए रोजेदारों से मुलाकात की और उन्हें तहेदिल से रमजान की मुबारकबाद दी। दरगाह ख्वाजा गरीब नवाज के सैयद गुलाम किबरिया साहब ने दस्तारबंदी की। रोजा इफ्तार के बाद जयपुर शहर मुफ्ती कारी अब्दुल सत्तार साहब ने मगरिब की नमाज अदा कराई। अजमेर से दरगाह ख्वाजा गरीब नवाज की ओर से सैयद गुलाम किबरिया और मदरसा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष मौलाना फज्ले हक ने नमाज से पूर्व मुल्क और सूबे की खुशहाली, तरक्की और बेहबूदी के लिए दुआ करवाई। रोजा इफ्तार से पहले मगरिब की नमाज के लिए जनाब हाफिज वली मोहम्मद ने अजान दी। ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह से तशरीफ लाए जनाब गुलाम किबरीया, हाजी अब्दुल वाहिद अंगारा एवं कारी अब्दुल सत्तार का शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया। इस अवसर पर शिक्षा मंत्री डॉ बी डी कल्ला, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री श्री प्रताप सिंह खाचरियावास, जलदाय मंत्री श्री महेश जोशी, उद्योग मंत्री श्रीमती शकुंतला रावत, प्रमोद जैन भाया, राजस्व मंत्री श्री रामलाल जाट, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री श्रीमती जाहिदा खान, पूर्व शिक्षा मंत्री श्री गोविंद सिंह डोटासरा, पूर्व राज्यसभा सांसद श्री अश्क अली टाक, राजस्थान मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जी के व्यास, अल्पसंख्यक आयोग अध्यक्ष श्री रफीक खान, राजस्थान स्टेट हज कमेटी अध्यक्ष श्री अमीन कागजी, राज्य मंत्रिमण्डल के सदस्यगण, विधायकगण, मुख्य सचिव श्रीमती उषा शर्मा, पुलिस महानिदेशक श्री एम एल लाठर एवं प्रशासनिक अधिकारी सहित बड़ी संख्या में प्रदेशभर से आये रोजेदार उपस्थित थे।"


यह खबर जाहिर सी बात है कि मुख्यमंत्री के किसी सेक्रेटरी या प्रेस अटैची ने लिखी है और इस खबर की खास बात यह है कि लिखने वाले ने दिल खोलकर भेदभाव किया है। यह खबर फेसबुक वाॅल पर लिखी गई है, जहाँ न जगह की किल्लत होती है और ना ही स्याही कम पड़ती है। इसमें भेदभाव यह बरता गया कि कई वरिष्ठ नेता व सामाजिक कार्यकर्ता इस आयोजन में शरीक हुए, लेकिन भेदभाव की कलम लिए इस लेखक ने उनके नाम लिखना भी मुनासिब नहीं समझा। पूर्व मन्त्री व वरिष्ठ विधायक शिव विधानसभा क्षेत्र अमीन खान, पूर्व मन्त्री नसीम अख्तर, पूर्व मन्त्री दुर्रू मियां, पूर्व विधायक जाकिर गैसावत, पूर्व विधायक हाजी कय्यूम खान मसूदा, पूर्व विधायक अलाउद्दीन आज़ाद, राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के चेयरमैन जस्टिस भंवरू खां, वक्फ बोर्ड चेयरमैन डाॅक्टर खानू ख़ान बुधवाली, फतेहपुर विधायक हाकम अली ख़ान, नगर विधायक वाजिब अली, रामगढ़ विधायक सफिया खान, सवाई माधोपुर विधायक दानिश अबरार, मेवात विकास बोर्ड के चेयरमैन जुबैर खान, अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन डाॅक्टर निज़ाम खानजादा, अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम के पूर्व चेयरमैन एडवोकेट असरार अहमद, सीकर सभापति जीवण खां, झुन्झुनूं के पूर्व सभापति ख़ालिद हुसैन, राजस्थान बार काॅन्सिल के पूर्व चेयरमैन व वरिष्ठ एडवोकेट सय्यद शाहिद हसन, महिला आयोग की चेयरमैन रेहाना रियाज आदि भी शायद इस इफ्तार पार्टी में शामिल थे, हालांकि इन सभी की शिरकत की हम पुष्टि नहीं करते। लेकिन इनमें से अधिकतर वहाँ जरूर मौजूद रहे होंगे, परन्तु मुख्यमंत्री की फेसबुक वाॅल वाली खबर में किसी के नाम को जगह नहीं मिली। यह इन वरिष्ठ लोगों का अपमान नहीं तो और क्या है ?

अब बात करें मुख्यमंत्री की मुस्लिम हमदर्दी की, तो यह खुली किताब की तरह है कि मुख्यमंत्री गहलोत तिकड़म की राजनीति के मास्टर हैं और मुसलमानों के वोट लेकर सत्ता हासिल करना इनका मुख्य एजेंडा है। यह कहें तो गलत नहीं होगा कि अशोक गहलोत को विधायक व मुख्यमंत्री मुसलमानों ने बनाया है, क्योंकि उनकी खुद की सीट सरदारपुरा मुस्लिम बाहुल्य है और इस बार कांग्रेस ने विधानसभा की 96 सीटें मुस्लिम वोट एकतरफा मिलने के कारण जीती हैं। यानी गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने वाले मुसलमान हैं। इतना होने के बावजूद उनके दिल में मुसलमानों के प्रति कोई हमदर्दी नहीं है। जिसका सबूत यह है कि सरकार बने साढ़े तीन साल हो गए, इस दौरान सीएम गहलोत हर समाज के प्रतिनिधिमण्डल से मिले हैं और उनकी समस्याओं को सुनकर समाधान भी निकाले हैं, लेकिन एक समाज से नहीं मिले और वो है मुस्लिम समाज। यानी जिस गहलोत के पास मुस्लिम प्रतिनिधिमण्डल से मिलने के लिए साढ़े तीन साल में आधा घण्टा भी नहीं था, उसकी इफ्तार पार्टी में शरीक होना और फिर वहाँ इज्जत अफजाई का मौका तलाशना अपने आप में बेवकूफ़ी और खुद को धोखा देना था। यह बिना मन की इफ्तार पार्टी आयोजित करना सीएम गहलोत के लिए इसलिए जरूरी था, क्योंकि अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और उन्होंने पार्टी आलाकमान को सत्ता वापसी का पुख्ता आश्वासन दे रखा है तथा सत्ता वापसी मुसलमानों के बगैर मुमकिन नहीं है। डर इस बात का भी है कि मुसलमानों की नाराजगी ने 2013 के चुनाव में कांग्रेस को 21 सीटों पर पहुंचा कर गहलोत को सत्ता से बेदखल किया था, वैसी करारी हार 2023 में दोबारा नहीं हो जाए।
(26-04-2022)
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