14 जून-नवाब क़ायम ख़ान डे और ददरेवा का नवाब क़ायम ख़ान मेमोरियल शहीद स्मारक

14 जून-नवाब क़ायम ख़ान डे और ददरेवा का नवाब क़ायम ख़ान मेमोरियल शहीद स्मारक
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। 14 जून को हर साल कायमखानी क़ौम दुनिया में जहाँ जहाँ आबाद है, नवाब क़ायम ख़ान डे के तौर पर मनाती है। इस दिन कायमखानी क़ौम के बानी (संस्थापक) प्रथम पुरूष नवाब क़ायम ख़ान साहब शहीद हुए थे। उनकी जन्म स्थली ददरेवा (जिला चूरू) में नवाब क़ायम ख़ान मेमोरियल शहीद स्मारक (निशान ए क़ायम) बना हुआ है। 14 जून और ददरेवा का यह स्मारक कायमखानी क़ौम में आज बहुत मशहूर हो चुके हैं। लेकिन यह मशहूर कैसे हुए ? किन लोगों ने यह काम करने की शुरुआत की ? किन लोगों ने इन कामों को करने का सपना देखा ? किनके अथक प्रयासों व कड़ी मेहनत से आज यह काम क़ौम के सामने हैं, जिन पर पूरी कायमखानी क़ौम को फख्र है। उन लोगों को याद करना हमारे लिए बहुत जरूरी है, जिनमें से कुछ इस दुनिया से रुख़सत भी हो गए हैं।


बाबू हिदायत खां जी इस्माईलखानी चूरू : एक ऐसी शख्सियत का नाम है, जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी कौम के लिए एक तरह से वक्फ कर दी थी। 14 जून को नवाब क़ायम ख़ान डे मनाने की शुरुआत सबसे पहले इन्होंने ही की थी और ददरेवा में स्मारक बनाने का सपना भी इन्हीं का था। इन दोनों बातों को वे हर उस शख्स से शेयर करते थे, जिसकी क़ौम के मुद्दों में दिलचस्पी होती थी। सबसे पहले उन्होंने चूरू से जाकर भादरा (जिला हनुमानगढ) में नवाब कायम ख़ान डे मनाने की शुरुआत की। तारीख़ थी 14 जून 1984, जगह थी भादरा के कायमखानी बास का मदरसा। नवाब कायम ख़ान डे के इस प्रोग्राम को भादरा के भामाशाह मरहूम हाजी आलम अली खां जी जमालखानी की कयादत (नेतृत्व) में मनाया गया। इस प्रोग्राम में दो मशहूर शख्सियतें भी शरीक हुई थीं, एक उर्दू अदब के मशहूर शायर मरहूम सालिक अजीजी साहब झुन्झुनूं और दूसरे चूरू के मशहूर शायर मरहूम मन्सूर साहब। यहीं से नवाब कायम ख़ान डे मनाने की शुरुआत हुई। फिर धीरे-धीरे यह चर्चा पूरी कौम में होने लगी, लेकिन 2001 तक भादरा के अलावा एकाध जगह इस प्रोग्राम की शुरुआत हुई। भादरा में हर साल यह प्रोग्राम आयोजित होता रहा।


बाबू हिदायत खां जी इस्माईलखानी का ही सपना था कि कायमखानी क़ौम अपनी जन्म स्थली ददरेवा पहुंचे। यहाँ नवाब कायम ख़ान साहब की याद में एक स्मारक बनाया जाए। उन्होंने अपने इस सपने को काफी लोगों से शेयर किया, जिनमें प्रमुख थे भंवर खां जी पूर्व पार्षद भादरा। भंवर खां जी ने इस बात को मरहूम जी ख़ान साहब से शेयर किया। फिर हिदायत खां बाबू जी के सपने में रंग भरना शुरू हुआ। यह तीनों (हिदायत खां बाबू जी, जी ख़ान साहब और भंवर खां जी) सबसे पहले 2001 में ददरेवा पहुंचे, जहाँ एक भी घर कायमखानी का नहीं है। फिर इन्होंने यहाँ स्मारक बनाने की रूपरेखा बनाई और अपनी योजना पूर्व मन्त्री यूनुस खां जी से शेयर की, तब तक वे विधायक नहीं बने थे। साल आई 2003 की और महीना दिसम्बर का, यूनुस खां जी पहली बार डीडवाना से विधायक बनकर कैबिनेट मन्त्री बनाए गए। वसुंधरा राजे जी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। ददरेवा स्मारक बनाने का सपना तेजी से आगे बढा। उक्त तीनों कायमखानी सरदार जमीन देखने एक बार फिर ददरेवा गए और वर्तमान स्मारक वाली जमीन का चयन किया। फिर यह तीनों और साथ में मोहम्मद खां जी चित्तौड़गढ़ तत्कालीन मन्त्री यूनुस खां जी की मौजूदगी में साल 2004 में ददरेवा पहुंचे। साथ में पास पड़ौस के और लोग भी शरीक हुए। उस दिन को याद करते हुए भंवर खां जी पूर्व पार्षद ने बताया कि सबसे पहले मन्त्री यूनुस खां जी ने इस ज़मीन की मिट्टी को उठाकर चूमा और फिर स्मारक बनने का सपना साकार होना शुरू हुआ।


जी ख़ान साहब : इन्होंने अपनी अथक मेहनत और लगन से टीम भावना के साथ नवाब कायम ख़ान डे को क़ौम में मशहूर किया। ददरेवा स्मारक बनाने में समस्त कागजी कार्रवाई जी ख़ान साहब ने ही की, अगर जी ख़ान साहब नहीं होते तो शायद हिदायत खां बाबू जी का यह सपना साकार नहीं होता। शुरूआत में इसका विरोध भी कुछ कायमखानियों ने किया। कुछ नवाब कायम ख़ान डे को ईस्वी सन की बजाए हिजरी सन की तारीख़ को मनाने की बात करते थे, तो कुछ शहादत दिवस की बजाए यह दिन इस्लाम क़ुबूल करने की तारीख़ को मनाने की बात कहते थे, कुछ ददरेवा की बजाए हांसी (हरियाणा) में स्मारक बनाने की बात कहते थे, तो कुछ कायमखानी बाहुल्य किसी शहर कस्बे में यह स्मारक बनाने की बात कहते थे। कुछ लोग तो इन दोनों कामों के इतने कट्टर विरोधी बन गए थे कि वे बिना सिर पैर की भांति भांति की बातें किया करते थे। लेकिन अल्लाह का शुक्र है कि आज सभी नवाब कायम ख़ान डे भी मनाने लग गए और ददरेवा स्मारक को भी सम्मान के साथ याद करने लग गए।


यूनुस खां जी : पूर्व मन्त्री यूनुस खां जी का नवाब कायम ख़ान डे को स्थापित करने और ददरेवा का नवाब कायम ख़ान मेमोरियल शहीद स्मारक बनाने में विशेष योगदान रहा है। तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जी से इन्होंने इस स्मारक के लिए दो बीघा भूमि आवंटित करवाई, यहाँ सड़क बनवाई। फिर यूनुस खां जी के नेतृत्व में 14 जून 2008 को ददरेवा में विशाल नवाब कायम ख़ान डे मनाया गया। जिसमें मुख्य अतिथि तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जी थीं, जिन्होंने हजारों लोगों और कई मन्त्रियों, सांसदों व विधायकों की मौजूदगी में इस स्मारक की संगे बुनियाद का पत्थर रखा। आज यह आलीशान स्मारक क़ौम के सामने है।


भंवर खां जी भादरा : पूर्व पार्षद भंवर खां जी भादरा जिनके बारे में ऊपर बताया जा चुका है, जिनका नवाब कायम ख़ान डे को मशहूर करने और ददरेवा के स्मारक को बनवाने में विशेष योगदान रहा है। वहां लगी कायमखानी शहीद सैनिकों की पट्टिकाएं उन्हीं की देखरेख में बनी थी, जिनके लिए अनवार खां जी हसनसर का विशेष आर्थिक सहयोग रहा तथा शहीदों की लिस्ट कप्तान लियाकत खां जी धनूरी ने तैयार की। जो ददरेवा स्मारक पर लगी हुई है।


मोहम्मद खां जी चित्तौड़गढ़ : 14 जून नवाब कायम ख़ान डे को स्थापित करने और ददरेवा स्थित नवाब कायम ख़ान मेमोरियल शहीद स्मारक बनवाने में मोहम्मद खां जी हाथीखानी चित्तौड़गढ़ का योगदान भी बहुत ही सराहनीय है। नवाब कायम ख़ान डे की शुरुआत भादरा से हुई और इसे बड़े पैमाने पर एवं भव्यता के साथ मनाना भीलवाड़ा जिले में शुरू हुआ, जिसमें मोहम्मद खां जी का विशेष योगदान रहता है, क्योंकि वे मूल रूप से भीलवाड़ा जिले के मेघरास गांव के बाशिन्दे हैं। मोहम्मद खां जी ने चित्तौड़गढ़ से ददरेवा यानी करीब 650 किलोमीटर का सफर कई बार किया है। उन्होंने लगातार छह महीने ददरेवा में रह कर इस स्मारक के विभिन्न निर्माण कार्य करवाए हैं तथा एक विचित्र सच्चाई यह है कि चूरू जिले से बाहर के कायमखानियों में जितने सफर ददरेवा के मोहम्मद खां जी ने किए हैं, उतने किसी ने नहीं किए हैं। यहाँ की एक एक ईंट और पत्थर मोहम्मद खां जी की मौजूदगी में लगा है, तब जाकर आज हम फख्र से कहते हैं कि ददरेवा में नवाब कायम ख़ान मेमोरियल शहीद स्मारक बना हुआ है, जंगल की जमीन पर सांप बिच्छुओं और गोयरों के बीच लगातार छह महीने गुज़ारना इतनी आसान बात नहीं है, जो मोहम्मद खां जी ने चित्तौड़गढ़ से आकर यहाँ की है।


सद्दीक खां जी मलवाण : ददरेवा गांव में कोई कायमखानी आबाद नहीं है। पास का सबसे नजदीक गांव मोडावासी है, जहाँ कायमखानी आबाद हैं। जो ददरेवा से करीब आठ किलोमीटर दूर है। इसी गांव के बाशिन्दे हैं सद्दीक खां जी मलवाण। जो नवाब कायम ख़ान मेमोरियल शहीद स्मारक प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष भी हैं। इनकी सेवाएं भी अज़ीम हैं, पूरे स्मारक को खड़े होकर बनवाने और इसकी पूरी देखभाल करने में इनके जैसी कोई मिसाल नहीं है। हर बार के 14 जून के प्रोग्राम की पूरी तैयारी इन्हीं के नेतृत्व में इनकी टीम करती है।


इनके अलावा इतिहासकार मरहूम महबूब खां जी एलमाण चूरू, मरहूम उम्मेद खां जी पेश कदमी नूआं, मरहूम शौकत खां जी दिलावरखानी पूर्व अध्यक्ष राजस्थान कायमखानी महासभा, मुन्शी खां जी चांदखानी जिलाध्यक्ष राजस्थान कायमखानी महासभा चूरू, महमूद खां जी एलमाण चूरू, कप्तान जंगशेर खां जी मलवाण मोडावासी, बाबू खां जी जबवाण फिरांसकाबास का भी इस दिन को मनाने और ददरेवा स्मारक के लिए विशेष योगदान है। साथ ही इक़रा पत्रिका का भी नवाब कायम ख़ान डे और ददरेवा स्मारक के प्रचार-प्रसार में विशेष योगदान रहा है। इक़रा पत्रिका में शुरूआत से ही इन दोनों को विशेष रूप से प्रकाशित किया जा रहा है।


नवाब कायम ख़ान मेमोरियल शहीद स्मारक के निर्माण में अभी तक करीब ढाई करोड़ रूपए खर्च हो चुके हैं। जिनमें तत्कालीन चूरू सांसद राम सिंह जी कस्वां के एमपी कोटे से 10 लाख रूपए, तत्कालीन राज्यसभा सांसद कृष्णलाल जी वाल्मीकि के पांच लाख, तत्कालीन चूरू जिला प्रमुख कमला जी कस्वां के पांच लाख और चूरू जिला परिषद की तरफ से मनरेगा एवं अन्य योजनाओं में ग्राम पंचायत ददरेवा के जरिए करीब 40 लाख रूपए खर्च हो चुके हैं। तत्कालीन पीडब्ल्यूडी मन्त्री राजेन्द्र राठौड़ साहब विधायक चूरू ने हाईवे से स्मारक तक 75 लाख रूपए की सड़क बनवाई। शेष पैसा समाज के भामाशाहों ने खर्च किया है। ग्राम पंचायत ददरेवा के बजरंग लाल जी शर्मा और उनकी पत्नी सरपंच श्रीमती सुदेश देवी जी का भी इस स्मारक को बनाने में विशेष योगदान रहा है। इन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान यहाँ काफी विकास कार्य करवाए तथा इस जमीन के आवंटन से सम्बंधित ग्राम पंचायत का पत्र भी इन्होंने ही लिखकर सरकार को भेजा था। इनके अलावा ददरेवा की तत्कालीन सरपंच श्रीमती हाजरा कुरैशी जी और उनके पुत्र जाहिद कुरैशी जी का भी यहाँ के विकास कार्यों में विशेष योगदान रहा है। इन सबके साथ सबसे बड़ा योगदान इस स्मारक की दिन रात चौकीदारी करने वाले यानी हर चीज़ को सम्भाल कर रखने वाले दाऊद कुरैशी जी का है, जो ददरेवा गांव के रहने वाले हैं और शुरू से ही इस स्मारक की देखभाल कर रहे हैं।
(08-06-2022)
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