आर्थिक मोर्चे और रोजगार देने के वादे पर विफल हुई सरकारें
आर्थिक मोर्चे और रोजगार देने के वादे पर विफल हुई सरकारें
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। सबका साथ-सबका विकास और अच्छे दिन लाने के वादे के साथ 26 मई 2014 को पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार के मुखिया बने थे नरेन्द्र मोदी, उन्हें प्रधानमंत्री बने आठ साल से अधिक का समय हो गया है। लेकिन विकास व अच्छे दिन तो दूर की बात महंगाई व बेरोजगारी ने इस आठ साल में पहले वाले बुरे दिन भी जनता से छीन लिए हैं। अगर इन आठ साल में कुछ ज्यादा मिला है तो बढ़ती साम्प्रदायिकता और नफ़रती माहौल मिला है।
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देश में बढ़ती महंगाई और घटते रोजगार ने जनता की कमर तोड़ दी है, विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी बेरोजगारी के कारण हताशा की शिकार हो रही है, फिर भी केन्द्र व राज्य सरकारों के पास रोजगार बढ़ाने का कोई ठोस फार्मूला दूर दूर तक नज़र नहीं आ रहा है। सवाल यह है कि देश की यह हालत क्यों हुई ?
*********************************जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। सबका साथ-सबका विकास और अच्छे दिन लाने के वादे के साथ 26 मई 2014 को पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार के मुखिया बने थे नरेन्द्र मोदी, उन्हें प्रधानमंत्री बने आठ साल से अधिक का समय हो गया है। लेकिन विकास व अच्छे दिन तो दूर की बात महंगाई व बेरोजगारी ने इस आठ साल में पहले वाले बुरे दिन भी जनता से छीन लिए हैं। अगर इन आठ साल में कुछ ज्यादा मिला है तो बढ़ती साम्प्रदायिकता और नफ़रती माहौल मिला है।
सरकार आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह से विफल हो गई है, महंगाई और बेरोजगारी ने अपना विकराल रूप धारण कर जनता को खून के आंसू रूलाना शुरू कर दिया है। विश्व की सर्वाधिक युवा आबादी हमारे देश में है, जो एक अदद नौकरी के लिए दर दर ठोकरें खाकर हताशा की शिकार हो रही है। युवा नौकरी को लेकर एक तरह से नाउम्मीद होते जा रहे हैं। युवाओं की बड़ी संख्या डिप्रेशन में जा चुकी है। देश में काफी युवक युवतियां बेरोजगारी के कारण पिछले दो तीन साल में आत्महत्या तक कर चुके हैं। बेरोजगारी की वजह से युवा पीढ़ी जिसके कन्धों पर देश का भविष्य टिका हुआ है, वह नशे व अपराध की दलदल में फंस रही है। देश की इस बदहाली के कुछ आंकड़े भी नीचे लेख में लिखे गए हैं, जिन्हें गौर से पढिए और फिर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण व नफ़रत का शिकार होने की बजाए राजनेताओं और उच्चाधिकारियों से सवाल कीजिए कि देश की आपने यह हालत क्यों कर दी ?
रोटी रोजगार के मुद्दे पर देश की हालत बहुत बुरी होती जा रही है। इसके बावजूद सरकारों के पास महंगाई व रोजगार को लेकर बोलने को कुछ नहीं है, सिवाय लफ्फाजी के। केन्द्र सरकार व राज्य सरकारें इस मुद्दे पर एक जैसी हैं, महंगाई व रोजगार के मुद्दे पर या तो वे बोलती नहीं हैं, अगर बोलती हैं तो झूठे आंकड़ों के साथ खुद के हाथ से खुद की पीठ थपथपाती हैं, या फिर एक दूसरे के सिर यह ठीकरा फोड़ती हैं। सत्ता के कर्णधारों के पास रोटी रोजगार के सवालों का कोई जवाब नहीं है। सरकारों के पास रोजगार की कोई मुकम्मल पाॅलिसी नहीं है। ऐसा कोई खाका नहीं दिखता है, जिससे पता चले कि कहां पर कितना रोजगार दिया गया है ? कितनी मजदूरी दी जा रही है ?
मोदी सरकार आने के बाद तो बेरोजगारी की हालत बहुत बुरी हो गई है। आजादी के बाद देश के सत्ताधीशों ने देश की व्यवस्था लोक कल्याणकारी बनाई थी, लेकिन अब उसमें लोक कल्याण की कोई जगह नहीं दिख रही है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने लोगों से वादा किया था कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो हर वर्ष दो करोड़ नौकरियां दी जाएंगी, कालाधन वापस लाकर प्रत्येक भारतीय के खाते में 15-15 लाख रूपए डाले जाएंगे। सत्ता में आने के बाद 15 लाख रूपए तो "चुनावी जुमला" बन गया, लेकिन दो करोड़ नौकरियों पर कोई जवाब नहीं है। दो करोड़ के हिसाब से आठ साल में 16 करोड़ नौकरियां देनी थी, लेकिन कितनों को दी ? सवाल का स्पष्ट जवाब शायद ही कभी मिले। अगर 16 करोड़ की बजाए 8 करोड़ युवक युवतियों को भी रोजगार दे दिया जाता, तो आज देश का युवा वर्ग हताशा का शिकार नहीं होता।
वर्ष 2018 के आर्थिक सर्वे का आंकड़ा कहता है कि देश में करीब 7 करोड़ 50 लाख की औपचारिक क्षेत्र की नौकरियां हैं। इनमें से डेढ़ करोड़ सरकारी नौकरियां हैं, यानी 140 करोड़ आबादी वाले भारत में सरकारी नौकरियों की संख्या सिर्फ डेढ़ करोड़ ही है। यह सरकारी नौकरियां 2018 के बाद बढ़ने की बजाए घटी हैं। देश में जमकर निजीकरण हो रहा है। संविदा प्रथा व ठेका प्रथा जैसी नौकरी के नाम पर शोषणकारी बन्धुआ मजदूरी वाली नौकरियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। सेना में भी अग्निपथ जैसी योजना आ चुकी है। जो देश की सुरक्षा व्यवस्था व युवा पीढ़ी के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ है।
केन्द्रीय श्रम मंत्री ने संसद के पटल पर संविदा या ठेके की नौकरियों पर जवाब दिया है कि वर्ष 2019 में केंद्र सरकार में ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या करीब 13 लाख थी, जो वर्ष 2021 में बढ़कर 24 लाख हो गई। इसके दो मतलब निकलते हैं, पहला सरकार के पास स्थाई कर्मचारी बनाकर तनख्वाह देने के लिए पैसा नहीं है, दूसरा सरकार आरक्षण का अघोषित रूप से खात्मा करना चाहती है, ताकि आरक्षण के जरिए वंचित तबके के युवक युवतियां स्थाई नौकरी नहीं लग पाएं। यह ओबीसी, एससी, एसटी व ईडब्ल्यूएस तबके के साथ सरासर धोखा नहीं, तो फिर और क्या है ?
अगला आंकड़ा देखिए, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) के अनुसार वर्ष 2022 के मई महीने में देश में लगभग 404 मिलियन यानी 40 करोड़ 40 लाख लोगों के पास किसी न किसी प्रकार का रोजगार था। केवल एक महीने बाद जून में यह संख्या घटकर लगभग 39 करोड़ हो गई, यानी केवल एक महीने में करीब एक करोड़ 30 लाख लोग बेरोजगार हो गए। जून महीने में रोजगार गंवा चुके एक करोड़ 30 लाख लोगों में से केवल 30 लाख लोग ही अभी रोज़गार की तलाश में लगे हुए हैं। इसमें से हताश होकर एक करोड़ लोगों ने रोजगार की तलाश ही बंद कर दी है। इस तरह से जो रोजगार दर पिछले दो बरसों से 39 से 41 फीसदी के आस पास अटकी हुई थी, वो घटकर जून 2022 में 35.8 फीसदी हो गई है। यानी देश में काम करने लायक आबादी में मुश्किल से 36 प्रतिशत लोगों के पास किसी न किसी तरह का काम है या वह काम की तलाश में है।
सीएमआईई द्वारा जारी किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि देश की बेरोजगारी दर जून में बढ़कर 7.8 फीसदी हो गई है, जो मई महीने में 7.1 फीसदी थी, क्योंकि ग्रामीण बेरोजगारी दर बढ़कर 8.03 फीसदी हो गई है। मई में ग्रामीण भारत में लेबर पार्टिसिपेशन दर 41.3 फीसदी से गिरकर जून में 39.9 फीसदी हो गई है, 1.4 फीसदी अंक की यह गिरावट शहरों में लेबर पार्टिसिपेशन से ज्यादा है, शहरों में 0.4 फीसदी अंक की गिरावट हुई है, यहां यह 37.1 फीसदी से गिरकर 36.7 फीसदी हो गई है। लेबर पार्टिसिपेशन को आसान भाषा में यूं समझें कि इसका मतलब कितने लोग सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। लेबर पार्टिसिपेशन में गिरावट का मतलब है कि लोगों की नौकरी चली गई है या उन्होंने नौकरी छोड़ी दी है।
सीएमआईई का एक और आंकड़ा देखिए, जो हरियाणा से सम्बंधित है। हरियाणा जो कि राजधानी दिल्ली से सटा हुआ है और बरसों से एक तरह की रोजगार हब बना हुआ है। उस हरियाणा में देश की सर्वाधिक बेरोजगारी दर सामने आई है, 34.5 प्रतिशत। इसके बाद दूसरा नम्बर राजस्थान का है 28.8 प्रतिशत। तीसरा नम्बर बिहार का 21.1 प्रतिशत। आंकड़े बताते हैं कि कुछ राज्यों को छोड़कर बाकी की रोटी रोजगार देने के मामले में हालत बहुत खराब हो चुकी है। बिहार की हालत देखिए, जहाँ सरकार रोजगार सृजन के एक से बढ़कर एक बड़े बड़े दावे करती है, लेकिन इसके बावजूद बेरोजगारी का आंकड़ा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। बिहार की बेरोजगारी दर देश की बेरोजगारी दर से तीन गुणा के करीब है। हरियाणा की चार गुणा से अधिक और राजस्थान की बेरोजगारी दर देश की दर से चार गुणा के करीब है। यह आंकड़े बड़े डरावने हैं और धरातल की सच्चाई आंकड़ों से भी ज्यादा डरावनी है।
एक आंकड़ा रोजगार को लेकर 26 जून को दैनिक भास्कर अखबार में छपा। जिसमें बताया गया है कि नेशनल पैंशन स्कीम के आंकड़ों के मुताबिक केन्द्र सरकार ने वर्ष 2021 में 2020 के मुकाबले 27 प्रतिशत कम रेगुलर भर्तियां की हैं, यही हाल राज्यों का रहा है। राज्यों में रेगुलर भर्तियां 21 प्रतिशत कम की गई हैं। केन्द्र सरकार ने 2020 में एक लाख 19 हजार स्थाई नौकरियां दी थी, 2021 में यह संख्या घटकर 87 हजार 423 हो गई है। दूसरी तरफ वर्ष 2017 में ठेका प्रथा या संविदा प्रथा पर केन्द्र सरकार में काम करने वाले 11 लाख 11 हजार लोग थे, जो 2021 में बढ़कर 24 लाख 31 हजार हो गए। बन्धुआ मजदूरी वाली संविदा आधारित इन नौकरियों के मामले में यही हाल राज्य सरकारों का भी है। यानी केन्द्र व राज्य सरकारें लगातार स्थाई नौकरियां घटा रही हैं और ठेकाकर्मी या संविदाकर्मी नाम के एक तरह के बन्धुआ मजदूर पैदा कर रही हैं।
यह सब इसलिए हो रहा है कि देश आर्थिक मोर्चे पर विफल होता जा रहा है। खजाना खाली होता जा रहा है। देश का व्यापार घाटा बुरी तरह बढ़ रहा है। बीते जून महीने में हमारा व्यापार घाटा बढ़कर 25.63 अरब डॉलर हो गया। डाॅलर के मुकाबले रूपया लगातार गिर रहा है। आज रूपए में जो गिरावट है, ऐसी इतिहास में कभी नहीं रही। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जल्द ही एक डॉलर 80 रुपये का हो जाएगा। यही हाल रहा तो ऐसा भी मुमकिन है कि इस वर्ष के अंत तक डॉलर की कीमत 82 रुपए तक पहुंच जाएगी। ऐसी हालत में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव समेत कुछ विशेषज्ञों की यह सलाह गौर करने लायक है कि रुपए को संभालने की कोशिश में भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को इस तरह खाली नहीं करना चाहिए, जिस तरह वो कर रहा है। विशेष कर तब जबकि अगले छह से नौ महीनों में भारत को डॉलर में लिए गए 267 बिलियन डॉलर के अल्पकालिक ऋण को चुकाना भी है। सितंबर 2021 में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 642 बिलियन डॉलर थे। जो अब घटकर 593 बिलियन डॉलर बचे हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2021 में दुनिया के 76 करोड़ 80 लाख लोगों की थाली में भोजन नहीं था, यानी यह भुखमरी के शिकार थे। इनमें 22 करोड़ लोग यानी एक चौथाई से अधिक संख्या भारतीयों की थी। महंगाई व बेरोजगारी की बढ़ती विकराल स्थिति को देखकर देश की वर्तमान हालत का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि आज हमारे देश के आमजन की हालत कैसी होगी ? हमारे पड़ौसी देशों श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल आदि की हालत भी बहुत पतली हो चुकी है। श्रीलंका तो गलत नीतियों के कारण पूरी तरह से बरबाद हो गया है, उग्र भीड़ ने मई में प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे का घर भी फूंक दिया था, प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। आज वहां की जनता त्राहि त्राहि कर रही है। यही हाल पाकिस्तान का भी है, जहाँ कुछ महीनों पहले सरकार तो बदल गई, लेकिन महंगाई व बेरोजगारी का ग्राफ़ नहीं बदला।
हमारे देश में आठ दस साल पहले गैस सिलेंडर 400 रूपए के आस पास मिलता था, जो आज एक हजार से ऊपर हो गया है। खाने का तेल जो 80-90 रूपए लीटर मिलता था, जो आज 200 के करीब है। आटा जो 20-22 रूपए किलो मिलता था, जो आज 35 रूपए के आस पास है। ऊपर से बेरोजगारी अलग। ऐसी हालत में देश की जनता क्या धोए और क्या निचोड़े ? देश की इस दुर्दशा पर विपक्षी दल, बुद्धिजीवी और जन संगठन जमकर सरकार की आलोचना करते हैं, लेकिन जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार है वहां की हालत भी खराब है, लेकिन वहां की हालत को लेकर विपक्षी दल कभी सवाल खड़े नहीं करते हैं। विशेष बात यह है कि अन्दरखाने तो सत्ताधारी दलों के बहुत से नेता भी मानते हैं कि महंगाई व बेरोजगारी से जनता की कमर टूट चुकी है। लेकिन वे खुलेआम कहने से परहेज़ करते हैं। वरूण गांधी इस मामले में एक उदाहरण हैं, जो अपनी ही पार्टी की सरकार की खुलेआम आलोचना करते हैं।
पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गांधी ट्वीटर के जरिए सरकार को जमकर आड़े हाथ लेते हैं। उन्होंने गत दिनों कई ट्वीट किए। उन्होंने कहा कि घरेलू गैस सिलेंडर अब 1050 रुपए में मिलेगा, जब देश मे बेरोजगारी चरम पर है, तब भारतवासी पूरी दुनिया में सबसे महंगी गैस खरीद रहे हैं। यही नहीं वरुण गांधी ने कहा कि कनेक्शन काॅस्ट 1450 रुपए से बढ़ाकर 2200 रुपए और सिक्योरिटी राशि 2900 से बढ़ाकर 4400 कर दी गई है। यहाँ तक कि रेगुलेटर भी 100 रुपए महंगा हो गया है, गरीब की रसोई फिर धुएं से भरने लगी है। वे बेरोजगारी, खाली पड़े पदों और महंगाई को लेकर मुखरता के साथ बोल रहे हैं।
वरुण गांधी ने अपनी सरकार को महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर आड़े हाथों लेते हुए कहा कि 2018 से 2020 तक दो वर्षों के दौरान बेरोजगारी की वजह से देश में 25 हजार युवाओं ने आत्महत्या कर ली है। उन्होंने मांग की कि सरकार शीघ्रता से सरकारी नौकरियों के खाली पड़े सभी पदों को भरे, ताकि युवा इस तरह का कदम ना उठाएं। उन्होंने लिखा कि आज 19 साल का हर दूसरा युवा बेरोजगार है। अब सवाल यह है कि देश की यह हालत क्यों हुई और इसका जिम्मेदार कौन है ? जाहिर सी बात है कि देश की यह हालत सरकारों की गलत नीतियों के कारण हुई है तथा इस हालत के जिम्मेदार सत्ता के कर्णधार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मन्त्री और उच्चाधिकारी हैं।
(09-07-2022)
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सीएमआईई द्वारा जारी किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि देश की बेरोजगारी दर जून में बढ़कर 7.8 फीसदी हो गई है, जो मई महीने में 7.1 फीसदी थी, क्योंकि ग्रामीण बेरोजगारी दर बढ़कर 8.03 फीसदी हो गई है। मई में ग्रामीण भारत में लेबर पार्टिसिपेशन दर 41.3 फीसदी से गिरकर जून में 39.9 फीसदी हो गई है, 1.4 फीसदी अंक की यह गिरावट शहरों में लेबर पार्टिसिपेशन से ज्यादा है, शहरों में 0.4 फीसदी अंक की गिरावट हुई है, यहां यह 37.1 फीसदी से गिरकर 36.7 फीसदी हो गई है। लेबर पार्टिसिपेशन को आसान भाषा में यूं समझें कि इसका मतलब कितने लोग सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। लेबर पार्टिसिपेशन में गिरावट का मतलब है कि लोगों की नौकरी चली गई है या उन्होंने नौकरी छोड़ी दी है।
सीएमआईई का एक और आंकड़ा देखिए, जो हरियाणा से सम्बंधित है। हरियाणा जो कि राजधानी दिल्ली से सटा हुआ है और बरसों से एक तरह की रोजगार हब बना हुआ है। उस हरियाणा में देश की सर्वाधिक बेरोजगारी दर सामने आई है, 34.5 प्रतिशत। इसके बाद दूसरा नम्बर राजस्थान का है 28.8 प्रतिशत। तीसरा नम्बर बिहार का 21.1 प्रतिशत। आंकड़े बताते हैं कि कुछ राज्यों को छोड़कर बाकी की रोटी रोजगार देने के मामले में हालत बहुत खराब हो चुकी है। बिहार की हालत देखिए, जहाँ सरकार रोजगार सृजन के एक से बढ़कर एक बड़े बड़े दावे करती है, लेकिन इसके बावजूद बेरोजगारी का आंकड़ा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। बिहार की बेरोजगारी दर देश की बेरोजगारी दर से तीन गुणा के करीब है। हरियाणा की चार गुणा से अधिक और राजस्थान की बेरोजगारी दर देश की दर से चार गुणा के करीब है। यह आंकड़े बड़े डरावने हैं और धरातल की सच्चाई आंकड़ों से भी ज्यादा डरावनी है।
एक आंकड़ा रोजगार को लेकर 26 जून को दैनिक भास्कर अखबार में छपा। जिसमें बताया गया है कि नेशनल पैंशन स्कीम के आंकड़ों के मुताबिक केन्द्र सरकार ने वर्ष 2021 में 2020 के मुकाबले 27 प्रतिशत कम रेगुलर भर्तियां की हैं, यही हाल राज्यों का रहा है। राज्यों में रेगुलर भर्तियां 21 प्रतिशत कम की गई हैं। केन्द्र सरकार ने 2020 में एक लाख 19 हजार स्थाई नौकरियां दी थी, 2021 में यह संख्या घटकर 87 हजार 423 हो गई है। दूसरी तरफ वर्ष 2017 में ठेका प्रथा या संविदा प्रथा पर केन्द्र सरकार में काम करने वाले 11 लाख 11 हजार लोग थे, जो 2021 में बढ़कर 24 लाख 31 हजार हो गए। बन्धुआ मजदूरी वाली संविदा आधारित इन नौकरियों के मामले में यही हाल राज्य सरकारों का भी है। यानी केन्द्र व राज्य सरकारें लगातार स्थाई नौकरियां घटा रही हैं और ठेकाकर्मी या संविदाकर्मी नाम के एक तरह के बन्धुआ मजदूर पैदा कर रही हैं।
यह सब इसलिए हो रहा है कि देश आर्थिक मोर्चे पर विफल होता जा रहा है। खजाना खाली होता जा रहा है। देश का व्यापार घाटा बुरी तरह बढ़ रहा है। बीते जून महीने में हमारा व्यापार घाटा बढ़कर 25.63 अरब डॉलर हो गया। डाॅलर के मुकाबले रूपया लगातार गिर रहा है। आज रूपए में जो गिरावट है, ऐसी इतिहास में कभी नहीं रही। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जल्द ही एक डॉलर 80 रुपये का हो जाएगा। यही हाल रहा तो ऐसा भी मुमकिन है कि इस वर्ष के अंत तक डॉलर की कीमत 82 रुपए तक पहुंच जाएगी। ऐसी हालत में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव समेत कुछ विशेषज्ञों की यह सलाह गौर करने लायक है कि रुपए को संभालने की कोशिश में भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को इस तरह खाली नहीं करना चाहिए, जिस तरह वो कर रहा है। विशेष कर तब जबकि अगले छह से नौ महीनों में भारत को डॉलर में लिए गए 267 बिलियन डॉलर के अल्पकालिक ऋण को चुकाना भी है। सितंबर 2021 में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 642 बिलियन डॉलर थे। जो अब घटकर 593 बिलियन डॉलर बचे हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2021 में दुनिया के 76 करोड़ 80 लाख लोगों की थाली में भोजन नहीं था, यानी यह भुखमरी के शिकार थे। इनमें 22 करोड़ लोग यानी एक चौथाई से अधिक संख्या भारतीयों की थी। महंगाई व बेरोजगारी की बढ़ती विकराल स्थिति को देखकर देश की वर्तमान हालत का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि आज हमारे देश के आमजन की हालत कैसी होगी ? हमारे पड़ौसी देशों श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल आदि की हालत भी बहुत पतली हो चुकी है। श्रीलंका तो गलत नीतियों के कारण पूरी तरह से बरबाद हो गया है, उग्र भीड़ ने मई में प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे का घर भी फूंक दिया था, प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। आज वहां की जनता त्राहि त्राहि कर रही है। यही हाल पाकिस्तान का भी है, जहाँ कुछ महीनों पहले सरकार तो बदल गई, लेकिन महंगाई व बेरोजगारी का ग्राफ़ नहीं बदला।
हमारे देश में आठ दस साल पहले गैस सिलेंडर 400 रूपए के आस पास मिलता था, जो आज एक हजार से ऊपर हो गया है। खाने का तेल जो 80-90 रूपए लीटर मिलता था, जो आज 200 के करीब है। आटा जो 20-22 रूपए किलो मिलता था, जो आज 35 रूपए के आस पास है। ऊपर से बेरोजगारी अलग। ऐसी हालत में देश की जनता क्या धोए और क्या निचोड़े ? देश की इस दुर्दशा पर विपक्षी दल, बुद्धिजीवी और जन संगठन जमकर सरकार की आलोचना करते हैं, लेकिन जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार है वहां की हालत भी खराब है, लेकिन वहां की हालत को लेकर विपक्षी दल कभी सवाल खड़े नहीं करते हैं। विशेष बात यह है कि अन्दरखाने तो सत्ताधारी दलों के बहुत से नेता भी मानते हैं कि महंगाई व बेरोजगारी से जनता की कमर टूट चुकी है। लेकिन वे खुलेआम कहने से परहेज़ करते हैं। वरूण गांधी इस मामले में एक उदाहरण हैं, जो अपनी ही पार्टी की सरकार की खुलेआम आलोचना करते हैं।
पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गांधी ट्वीटर के जरिए सरकार को जमकर आड़े हाथ लेते हैं। उन्होंने गत दिनों कई ट्वीट किए। उन्होंने कहा कि घरेलू गैस सिलेंडर अब 1050 रुपए में मिलेगा, जब देश मे बेरोजगारी चरम पर है, तब भारतवासी पूरी दुनिया में सबसे महंगी गैस खरीद रहे हैं। यही नहीं वरुण गांधी ने कहा कि कनेक्शन काॅस्ट 1450 रुपए से बढ़ाकर 2200 रुपए और सिक्योरिटी राशि 2900 से बढ़ाकर 4400 कर दी गई है। यहाँ तक कि रेगुलेटर भी 100 रुपए महंगा हो गया है, गरीब की रसोई फिर धुएं से भरने लगी है। वे बेरोजगारी, खाली पड़े पदों और महंगाई को लेकर मुखरता के साथ बोल रहे हैं।
वरुण गांधी ने अपनी सरकार को महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर आड़े हाथों लेते हुए कहा कि 2018 से 2020 तक दो वर्षों के दौरान बेरोजगारी की वजह से देश में 25 हजार युवाओं ने आत्महत्या कर ली है। उन्होंने मांग की कि सरकार शीघ्रता से सरकारी नौकरियों के खाली पड़े सभी पदों को भरे, ताकि युवा इस तरह का कदम ना उठाएं। उन्होंने लिखा कि आज 19 साल का हर दूसरा युवा बेरोजगार है। अब सवाल यह है कि देश की यह हालत क्यों हुई और इसका जिम्मेदार कौन है ? जाहिर सी बात है कि देश की यह हालत सरकारों की गलत नीतियों के कारण हुई है तथा इस हालत के जिम्मेदार सत्ता के कर्णधार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मन्त्री और उच्चाधिकारी हैं।
(09-07-2022)
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