ईद ए गदीर

ईद ए गदीर
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जिसका मैं मौला उसका अली मौला : हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। तारीख़ 18, महीना जिलहिज्जा का, साल सन 10 हिजरी। हिजरी सन के जिलहिज्जा महीने में हर साल हज किया जाता है। इसे हज का महीना भी कहते हैं। हज के इस पवित्र महीने में पूरी दुनिया से लाखों मुसलमान हर साल मक्का की हरम शरीफ़ (खाना ए काबा) और मदीना की मस्जिद ए नबवी शरीफ़ में जाते हैं। सन 10 हिजरी में यानी आज से क़रीब 1433 साल पहले ख़ुदा (ईश्वर) के आखरी पैगम्बर (ईश्दूत) हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने बेशुमार साथियों के साथ आखरी हज किया था।


यह हज पैगम्बर मुहम्मद साहब का आखरी हज था, इसके कुछ महीने बाद (क़रीब पौने तीन महीने बाद) उनका विसाल (इन्तकाल) हो गया था। इस आखरी हज से फारिग होकर अपने हज़ारों साथियों के साथ जब पैगम्बर मुहम्मद साहब ने मक्का से मदीना के लिए वापसी की, तो रास्ते में गदीर ए खुम नामक एक जगह आई। जहां अल्लाह ने उनको वही (ईश्वाणी) के जरिए अपना आदेश दिया। दिन था 18 जिलहिज्जा। हज़रत मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने तमाम साथियों को काफला रोकने का हुक्म दिया। काफला रूकने के बाद ऊंटों के कजावों (पिलान/काठी) को रखकर मिम्बर (मंच) बनाया गया, जिस पर खड़े होकर पैगम्बर मुहम्मद साहब ने अपने साथियों को तारीख़ी ख़िताब (भाषण) किया। इस ख़िताब का जिक्र क‌ई तारीख़ी (ऐतिहासिक) किताबों में मौजूद है। 


इस लम्बे ख़िताब में पैगम्बर ए इस्लाम ने जो बातें कही उनका मफहूम (मतलब) यह है, उन्होंने कहा कि "ऐ लोगों आगाह हो जाओ मैं भी एक इन्सान हूं, क़रीब है कि अल्लाह का क़ासिद (मौत का फरिश्ता) मेरे पास आए और मैं उसकी दावत क़ुबूल कर लूं। लोगों आगाह हो जाओ मैं अपने बाद तुम में दो भारी चीजें छोड़ कर जा रहा हूं। उनमें पहली चीज़ अल्लाह की किताब (कुर‌आन) जिसमें हिदायत है, जिसमें नूर है, तुम अल्लाह की किताब को पकड़ो, अपना ताल्लुक इस किताब के साथ मजबूत करो। अल्लाह की किताब अल्लाह की रस्सी है, जो इसे पकड़ेगा वो हिदायत पर होगा, जो इसे छोड़ देगा वो गुमराह हो जाएगा। दूसरी भारी चीज़ मेरे अहले बैअत हैं। मैं मेरे अहले बैअत के मामले में तुम्हें अल्लाह से डराता हूं।" 

इस ख़िताब में पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मौला अली अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़कर कहा कि "जिसका मैं मौला (संरक्षक/आका) उसका अली मौला।" पैगम्बर साहब ने इस ख़िताब में यह भी कहा कि "ऐ अल्लाह उससे मुहब्बत रख जो अली से मुहब्बत रखे, उससे दुश्मनी रख जो अली से दुश्मनी रखे।" इसी दिन और इस तारीख़ी ख़िताब की याद में 18 जिलहिज्जा को ईद ए गदीर मनाई जाती है। शियाओं और सूफिज्म से ताल्लुक रखने वाले मुसलमानों में इस दिन को बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। जहां तक सुन्नी मुसलमानों की बात है तो जैसे जैसे सूफिज्म कमजोर हुआ है या सूफिज्म के नाम पर गैर इस्लामिक कामों में बढ़ोतरी हुई है, ईद ए गदीर मनाना कम हो गया है। यह एक तारीख़ी दिन है, जिसकी इस्लामिक हिस्ट्री में बहुत अहमियत है और कमोबेश तमाम कदीमी (पुरानी) इस्लामिक किताबें इस दिन का जिक्र करती हैं।
(18 जिलहिज्जा सन 1443 हिजरी, मुताबिक 18 जुलाई 2022 ईस्वी, लेखक एम फ़ारूक़ ख़ान)
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