आरएसएस राज का एक और तोहफा : अग्निवीर या संविदा आधारित फ़ौजी ?
आरएसएस राज का एक और तोहफा : अग्निवीर या संविदा आधारित फ़ौजी ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। गत दिनों केन्द्र सरकार ने भारतीय सेना के तीनों अंगों के लिए अग्निपथ योजना की घोषणा की। इस योजना के तहत अब अग्निवीर फ़ौज में भर्ती किए जाएंगे। यानी सीधे स्थाई सैनिकों की भर्ती करने की बजाए सरकार एक तरह से संविदा आधारित अस्थायी सैनिकों की भर्ती करेगी और इनका कार्यकाल चार साल का होगा तथा इन्हीं अग्निवीरों में से 25 प्रतिशत को स्थाई सैनिक बनाया जाएगा। सरकार की इस घोषणा से युवाओं में जबरदस्त रोष व्याप्त हुआ और जगह जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। आगजनी, पथराव और हिंसक प्रदर्शनों के चलते देश को सैकड़ों करोड़ रूपए का नुकसान हुआ है। लेकिन सरकार ने योजना वापस लेने की बजाए इसमें कुछ संशोधन कर राहत देने का दिखावा किया है।
आरएसएस राज में यह भारतीय युवाओं और देश की सुरक्षा के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ किया गया है। अब आप सोचेंगे कि राज तो भाजपा या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का है, फिर इसे आरएसएस राज क्यों कहा गया है ? दृश्य रूप से यह बात पूरी तरह से सत्य है कि राज भाजपा व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ही है। लेकिन सच्चाई यह है कि अदृश्य तौर पर देश में राज न नरेन्द्र मोदी का और ना ही भाजपा का। असल सच्चाई यह है कि राज पूरी तरह से आरएसएस का है और पर्दे के पीछे देश की सारी व्यवस्था इस समय आरएसएस ही संचालित कर रहा है।
केन्द्र सरकार से कौनसी योजना बनवानी है, किस योजना का नाम बदलना है, किस योजना को बन्द करना है, किस राज्य में किसको राज्यपाल नियुक्त करना है, किस भाजपा शासित राज्य में किसको मुख्यमंत्री बनाना है, किसको बदलना है और किस वक्त किस राज्य की विपक्षी सरकार को साम, दाम, दण्ड व भेद के फार्मूले से गिराकर आरएसएस नियन्त्रण वाली सरकार बनवानी है ? यह सब आरएसएस की मर्ज़ी व योजना से हो रहा है।
मई 2014 में आरएसएस की राजनीतिक शाखा भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला, चेहरा नरेन्द्र मोदी का था, लिहाजा उन्हें प्रधानमंत्री बनाया गया और देश की पूरी व्यवस्था पर धीरे-धीरे आरएसएस ने अपना नियन्त्रण कर लिया। आरएसएस राज को गत दिनों आठ साल पूरे हो गए हैं। इस आठ साल में देश को कुछ मिला है, तो वो बढती साम्प्रदायिकता, बेरोजगारी व महंगाई मिली है, जिससे आज जनता का हर वर्ग त्राहि त्राहि कर रहा है। पिछले आठ साल में आरएसएस राज में क्या मिला, जरा गौर से याद कीजिए ? हर चार पांच महीने बाद कोई भड़काऊ मुद्दा, जिससे हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण व नफ़रत को बढ़ावा मिले। इसके अलावा कुछ और मुद्दे भी मिले, जो पूरी तरह से आमजन के खिलाफ़ हैं।
पहला भूमि अधिग्रहण क़ानून का संशोधन, जिसे सरकार ने किसानों के दबाव में वापस लिया। दूसरा आनन-फानन में 08 नवम्बर 2016 को की गई नोटबन्दी, जिसने देश की अर्थ व्यवस्था को चौपट कर दिया। तीसरा जीएसटी, जिसने डूबती अर्थ व्यवस्था को अधरझूल में लटका दिया। चौथा बिना नफे नुकसान के आकलन के आनन-फानन में कोरोना लाॅकडाउन लगाना। पांचवां काले कृषि क़ानून बनाना और फिर किसानों के लम्बे आन्दोलन व विरोध के चलते इन्हें वापस लेना। इस कड़ी में अनुच्छेद 370, तीन तलाक़ और सीएए आदि को भी शामिल किया जा सकता है। अब अग्निपथ और अग्निवीर।
आरएसएस राज के कर कमलों से हुए इन तमाम कामों से सबसे ज्यादा प्रभावित कोई हुआ है, तो वो किसान, मजदूर, दस्तकार, थड़ी ठेले वाले, छोटे व्यापारी आदि हैं, यानी जनता का 95 प्रतिशत तबका, चाहे वो किसी भी जाति पंथ का हो। लेकिन फिर भी उक्त फैसलों और घोषणाओं पर असंख्य युवाओं ने सरकार की वाहवाही भी की थी। जरा याद कीजिए कि कुछ दिनों पहले दिल्ली, इलाहाबाद और देश के दूसरे कुछ शहरों में एक वर्ग विशेष को टारगेट बनाकर बुलडोज़र चलाया गया, नाम अतिक्रमण हटाने का दिया, लेकिन असल में नाम व शक़्ल देखकर सजा दी गई और सजा भी बुलडोज़र से घर को ढहा कर दी गई। बुलडोज़र चलने के उन तमाम घटनाक्रमों पर तब बहुत से वे युवा भी शायद सोशल मीडिया पर सरकार की वाहवाही करने में व्यस्त थे, जिन्होंने गत दिनों अग्निपथ योजना का विरोध करते हुए ट्रेनों के आग लगाई थी ?
हम और हम जैसे बहुत से लेखक व पत्रकार बरसों से लिख रहे हैं कि सरकार को जन हितैषी होना चाहिए, जनहित के काम बिना भेदभाव के प्राथमिकता से करने चाहिए, अगर कोई सरकार ऐसा नहीं करती है, तो जनता को शासकों का लोकतांत्रिक तरीके से कड़ा विरोध करना चाहिए। अगर कोई शासक या सरकार भड़काऊ मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है, तो इसका मतलब सीधा सा यह है कि वो जनहित के काम करना ही नहीं चाहती, या उसकी नीयत में खोट है।
अब बात करें अग्निवीर या संविदा आधारित फ़ौजी की। इसे संविदा आधारित फ़ौजी कहना थोड़ा अटपटा है, क्योंकि यह भर्ती संविदा आधारित नहीं है। लेकिन अस्थायी जरूर है। संविदा आधारित हमने इसलिए कहा है कि कमोबेश सभी राज्यों में शिक्षा विभाग, चिकित्सा विभाग आदि में संविदा आधारित अस्थायी कर्मचारी मामूली तनख्वाह में लगा रखे हैं। ऐसा केन्द्र सरकार ने भी कुछ विभागों में कर रखा है। इसके पीछे दो कारण हैं, एक सरकारों के पास स्थाई कर्मचारी लगाकर तनख्वाह देने के लिए पैसा नहीं है, दूसरा सरकार चलाने वालों की नीयत में खोट है। यह दोनों ही बातें अग्निपथ योजना पर भी लागू होती हैं। सरकार का खजाना खाली है और नीयत में भी खोट है, क्योंकि अग्निवीर कौन बनेगा ? किसान व मजदूर का बेटा और किसान व मजदूर के बेटे को स्थाई नौकरी मिले और उसके परिवार का भला हो, ऐसी सोच आरएसएस की नहीं है। यह अग्निवीर योजना लागू करने से साबित भी हो रहा है।
अब बात करें अग्निवीर योजना के नुकसान की। इससे सबसे बड़ा नुकसान देश की सुरक्षा का होगा, क्योंकि मजबूत व मुकम्मल ट्रेनिंग प्राप्त स्थाई सेना ही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी सुरक्षा की गारंटी होती है। दूसरा नुकसान यह है कि अगले 15-20 साल में समाज में हजारों की संख्या में प्रशिक्षण प्राप्त रिटायर्ड अग्निवीर होंगे, यानी समाज का सैन्यकरण हो जाएगा। यह अग्निवीर नौकरी मांगने या स्थाई करने का आन्दोलन करेंगे, यह आन्दोलन हिंसक भी हो सकते हैं। इसके अलावा इससे अपराधी गुटों व जातीय गुटों को मजबूती भी मिल सकती है। यानी यह योजना देश की बाहरी व आन्तरिक दोनों सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित होगी। अन्त में उन युवाओं से अपील जो अग्निपथ योजना का विरोध कर रहे हैं, आप विरोध करें, लेकिन विरोध शान्तिपूर्वक व लोकतांत्रिक तरीके से करें, क्योंकि हिंसक आन्दोलन स्वयं को और दूसरों को भी तबाह कर देता है।
(24-06-2022)
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