शौहदा ए करबला से मुहब्बत और बुग्ज ?

शौहदा ए करबला से मुहब्बत और बुग्ज ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। मुहर्रम का महीना शुरू होते ही हर साल वाकिया ए करबला और ताजियेदारी को लेकर गैर जरूरी बहस शुरू हो जाती है। सोशल मीडिया के इस दौर में यह बहस और भी ज्यादा होने लगी है। कुछ लोग वाकिया ए करबला के बयान और ताजियेदारी को लेकर शिर्क व बिदअत (गैर इस्लामिक) कह कर माहौल खराब करते हैं। यह लोग बिना सिर पैर की मनगढ़ंत बातें वाकिया ए करबला को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल करते रहते हैं। यह एक तरह से बुग्ज (बैर/दुश्मनी) का प्रदर्शन है। हमारा मानना है कि शौहदा ए करबला और वाकिया ए करबला को याद करने के मुद्दे पर किसी को कोई भी नुक्ताचीनी नहीं करनी चाहिए। चाहे कोई कैसे भी इसे याद करे।


सन 61 हिजरी में पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के खानदान पर जबरदस्त ज़ुल्मो ज्यादती की गई थी, इतिहास इसका गवाह है। जालिम बादशाह यजीद ने इराक के मैदान ए करबला में पैगम्बर साहब के लाडले नवासे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम समेत पूरे ख़ानदान को कत्ल करवा दिया था। सवाल यह नहीं है कि उन्हें कत्ल क्यों किया गया ? भूखे प्यासे कत्ल किया या नहीं ? तीर भालों से क़त्ल किया या खंजर व तलवारों से ? सवाल यह है कि पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि व सल्लम की वफ़ात के 50 साल बाद उनके पूरे ख़ानदान को कत्ल क्यों किया ? तब जबकि पैगम्बर साहब के हजारों सहाबा (साथी) धरती पर जिन्दा थे।

असल बात थी कि जालिम बादशाह यजीद और उनके साथी पैगम्बर साहब के पैगाम और उनके खानदान को खत्म करना चाहते थे। उनके दिलो दिमाग में पैगम्बर साहब और उनके खानदान के प्रति कूट कूट कर बुग्ज भरा हुआ था। इसी बुग्ज, नफ़रत व इक्तिदार (सत्ता) के लालच और हर किस्म की हरामखोरी करने के लिए पैगम्बर साहब के खानदान को खत्म किया गया। लेकिन करबला के तपते मैदान में पैगम्बर साहब के खानदान व उनके चहेतों ने जिस अन्दाज़ में अपनी कुरबानी पेश की, उससे कुछ बरसों में ही यजीद व उसके साथियों का खात्मा हो गया और पैगम्बर साहब का पैगाम और मजबूती से पूरी दुनिया में फैला। दुनिया की तारीख़ (इतिहास) में करबला जैसी जंग और शहादत का वाकिया दूसरा नहीं मिलता है। इसके बावजूद कुछ लोग जब शौहदा ए करबला व उनकी याद को लेकर बेहूदा बातें करते हैं, उससे इमाम हुसैन से मुहब्बत करने वालों का दिल रोता है। यह लोग बेहूदा बातें तो सोशल मीडिया पर वायरल कर सकते हैं, लेकिन इतना नहीं लिख सकते कि "मैं हुसैन से बेहद मुहब्बत करता हूं और ज़ालिम यजीद से सख़्त नफ़रत करता हूं।"

शर्म की बात है कि एक तरफ यजीद ने पैगम्बर साहब के खानदान को भूखे प्यासे तपते मैदान ए करबला में कत्ल कर दिया और दूसरी तरफ कुछ लोग आज उस वाकिये को याद करने पर सवाल खड़े कर उसे भुलाने की घिनौनी कोशिश कर रहे हैं। आप मुसलमान होकर भी यजीद के लश्कर में खड़ा होना चाहते हो, क्यों ? कहने को तो यजीद और उसके साथी भी मुसलमान थे, लेकिन आज तमाम मुसलमान 1400 साल बाद भी उन पर लानत भेज रहे हैं। मुसलमान होने के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से मुहब्बत करना जरूरी है और साथ में यजीद व उसके साथियों से नफ़रत करना भी जरूरी है।

यहाँ अफसोस इस बात का भी है कि हमारे मज़हबी रहनुमाओं ने पंजतन पाक, अहले बैत, शौहदा ए करबला और खुलफा ए राशिदीन के बारे में उस हक़ से अवाम को नहीं बताया जिस हक़ के वे हकदार हैं ? हदीस की किताब जामे तिरमजी के मुताबिक पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया "हसन और हुसैन जन्नती नौजवानों के सरदार हैं और इनकी वालिदा (फातमा) जन्नती औरतों की सरदार हैं।" एक और हदीस में मिलता है कि पैगम्बर साहब ने फरमाया "हसन और हुसैन जन्नती नौजवानों के सरदार हैं और इनके वालिद (अली) इनसे भी बेहतर हैं।" हदीस की किताब इब्ने माजा के मुताबिक पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया, "जिसने हसन और हुसैन से मुहब्बत की उसने मुझ से मुहब्बत की और जिसने इनसे बैर रखा उसने मुझ से बैर रखा।" 

पैगम्बर मुहम्मद साहब ने अपने आखरी हज की वापसी में 18 जिलहिज्जा सन 10 हिजरी में एक तारीख़ी खुतबा (ऐतिहासिक भाषण) भी दिया था। इसके कुछ महीने बाद (क़रीब पौने तीन महीने बाद) उनका विसाल (इन्तकाल) हो गया था। इस आखरी हज से फारिग होकर अपने हज़ारों साथियों के साथ जब पैगम्बर साहब ने मक्का से मदीना के लिए वापसी की, तो रास्ते में गदीर ए खुम नामक एक जगह आई। जहां हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने तमाम साथियों को काफला रोकने का हुक्म दिया। काफला रूकने के बाद ऊंटों के कजावों (पिलान/काठी) को रखकर मिम्बर (मंच) बनाया गया, जिस पर खड़े होकर पैगम्बर मुहम्मद साहब ने अपने साथियों को तारीख़ी ख़िताब किया। इस ख़िताब का जिक्र क‌ई तारीख़ी (ऐतिहासिक) किताबों और हदीस की किताबों में मौजूद है। 

इस लम्बे ख़िताब में पैगम्बर ए इस्लाम ने जो बातें कही उनका मफहूम (मतलब) यह है, उन्होंने कहा कि "ऐ लोगों आगाह हो जाओ मैं भी एक इन्सान हूं, क़रीब है कि अल्लाह का क़ासिद (मौत का फरिश्ता) मेरे पास आए और मैं उसकी दावत क़ुबूल कर लूं। लोगों आगाह हो जाओ मैं अपने बाद तुम में दो भारी चीजें छोड़ कर जा रहा हूं। उनमें पहली चीज़ अल्लाह की किताब (कुर‌आन) जिसमें हिदायत है, जिसमें नूर है, तुम अल्लाह की किताब को पकड़ो, अपना ताल्लुक इस किताब के साथ मजबूत करो। अल्लाह की किताब अल्लाह की रस्सी है, जो इसे पकड़ेगा वो हिदायत पर होगा, जो इसे छोड़ देगा वो गुमराह हो जाएगा। दूसरी भारी चीज़ मेरे अहले बैत (घर वाले/खानदान वाले) हैं। मैं मेरे अहले बैत के मामले में तुम्हें अल्लाह से डराता हूं।" 

इस ख़िताब में पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मौला अली अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़कर कहा कि "जिसका मैं मौला (संरक्षक/आका) उसका अली मौला।" पैगम्बर साहब ने इस ख़िताब में यह भी कहा कि "ऐ अल्लाह उससे मुहब्बत रख जो अली से मुहब्बत रखे, उससे दुश्मनी रख जो अली से दुश्मनी रखे।" इसी दिन और इस तारीख़ी ख़िताब की याद में 18 जिलहिज्जा को ईद ए गदीर मनाई जाती है। लेकिन इतना स्पष्ट आदेश सुनने के बाद भी पैगम्बर साहब की वफ़ात के करीब 24 साल बाद उनके खानदान के साथ कैसा सुलूक होना शुरू हुआ ? तीसरे खलीफा हज़रत उस्मान रजिअल्लाहु तआला अन्हु की शहादत के बाद मौला अली अलैहिस्सलाम को खलीफा बनाया गया, सत्ता के लालची व गुमराह लोगों ने उनके खिलाफ़ बगावत की, उनसे जंगें लड़ी और फिर एक साज़िश के तहत उनका कत्ल कर दिया गया।

फिर इमाम हसन अलैहिस्सलाम को कत्ल किया और फिर 10 मुहर्रम सन 61 हिजरी को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को पूरे खानदान के साथ करबला के तपते मैदान में शहीद कर दिया। इसलिए शौहदा ए करबला की शहादत और वाकिया ए करबला को भुलाने की कोशिश करना अपने आपको जालिम यजीद के लश्कर में खड़ा करने जैसा है। याद रखें हुसैनियत हमेशा जिन्दा रहेगी और यजीदियत हमेशा जलीलो ख्वार होगी। इसलिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बेइन्तिहा मुहब्बत करें, उनके खानदान से मुहब्बत करें और तमाम शौहदा ए करबला से मुहब्बत करें। याद रखें जुल्म, नाइन्साफी, तानाशाही और सत्ता के दुरूपयोग के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने की नसीहत जितनी वाकिया ए करबला में मिलती है, उतनी कहीं नहीं मिलती है।

(08 अगस्त 2022, मुताबिक 09 मुहर्रम सन 1444 हिजरी)
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