जालोर में दलित छात्र की हत्या ?

जालोर में दलित छात्र की हत्या ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। गत दिनों एक तरफ पूरा देश आजादी की 75 वीं वर्षगांठ को अमृत महोत्सव के तौर पर मना रहा था। दूसरी तरफ 76 वें स्वतंत्रता दिवस के ठीक दो दिन पहले 13 अगस्त को राजस्थान के जालोर जिले के सुराणा गांव में एक मासूम दलित छात्र की हत्या हो हो जाती है। इंद्र कुमार मेघवाल नामक कक्षा तीन के इस आठ वर्षीय छात्र को स्कूल के हैड मास्टर ने बड़ी बेरहमी से पीटा और कुछ दिनों अस्पताल में ज़िन्दगी व मौत की जंग लड़ते हुए यह मासूम हार गया।


बताया जा रहा है कि इस मासूम ने हैड मास्टर की मटकी से पानी पी लिया था, जिससे उसने गुस्से में उसकी बेरहमी से पिटाई कर दी। यह भी बताया जा रहा है कि मटकी वाली बात सही नहीं है, बच्चों के आपस में झगड़ने पर हैड मास्टर ने पिटाई कर दी। सवाल यह नहीं है कि पिटाई का कारण क्या था ? सवाल यहां तीन हैं पहला हिंसक व नफरती मानसिकता का, दूसरा इस दर्दनाक पिटाई का और तीसरा इस मुद्दे पर जिस अंदाज में आवाज़ उठनी चाहिए थी, वो क्यों नहीं उठी ?

यह जग जाहिर है कि सदियों से हमारे देश में शूद्र (दलित, आदिवासी और ओबीसी) बताकर देश के बहुसंख्यक समुदाय पर भिन्न भिन्न प्रकार के एक से बढ़कर एक अत्याचार हुए हैं। इन अत्याचारों को करने वाले अपने आपको ऊंची जाति का मानते हैं, उनकी मानसिकता में नफ़रत व भेदभाव का भूसा भरा हुआ है। वही मानसिकता आज भी दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के साथ अन्याय व भेदभाव करती है तथा इसी मानसिकता ने इस मासूम दलित छात्र की जान ली है। यही मानसिकता देश में सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों और समानता की बात करने वालों के भी खिलाफ है और उन्हें टारगेट करती है। 

अब दूसरे सवाल पर बात करते हैं, अगर यह हत्या नफरती मानसिकता के चलते नहीं हुई है, तो फिर हिंसक प्रवृत्ति के चलते हुई है। बड़ी दर्दनाक बात है कि अपने आपको अध्यापक कहने वाले को इतना गुस्सा आया कि उसने एक मासूम की जान ही ले ली। ऐसे दरिन्दे को अध्यापक कहते हुए भी शर्म आती है। अब तीसरा सवाल कि इस मुद्दे पर उस तरह आवाज बुलंद नहीं की गई, जैसे अन्य मामलों में की जाती है, आखिर क्यों ?

वो इसलिए कि यह बच्चा दलित था और उसकी जान लेने वाला तथाकथित ऊंची जाति का था। इसलिए इस मुद्दे पर ज्यादा आवाज़ बुलंद नहीं हुई ख़ासकर आर‌एस‌एस भाजपा के संगठनों की। अगर मान लीजिए कि यहां हत्या करने वाला अध्यापक मुसलमान होता, तो क्या होता ? देशभर में आर‌एस‌एस भाजपा इस मुद्दे को लेकर जबरदस्त नफ़रत परोसने की कोशिश करता।

इस मुद्दे पर दलित संगठनों ने जरूर अपनी आवाज़ बेबाकी से बुलंद की, लेकिन उनमें पूरी तरह से बिखराव नजर आया और उनकी आवाज़ को ज्यादा तवज्जोह नहीं मिली। अगर तमाम दलित संगठन और उनके नेता एक मंच पर आकर इस बात को उठाते तो यकीनन भाजपा व कांग्रेस की चूलें हिल जाती। वे अपनी मांगों को मनवा सकते थे। इसके लिए  भाजपा, कांग्रेस व अन्य पार्टियों के एससी एसटी नेताओं और दलित बुद्धिजीवियों को लामबंद होने की आवश्यकता थी।

सभी एससी एसटी विधायक व सांसद और दलित बुद्धिजीवी तमाम मतभेद भुलाकर जयपुर या दिल्ली में अनिश्चितकालीन धरना लगाते, जो अपने स्वयं के लाभ के लिए कभी कांग्रेस के चरणों में बैठते हैं, तो कभी भाजपा के आगे नतमस्तक होते हैं, तो कभी किसी और पार्टी का सियासी मोहरा बनते हैं। अगर ऐसा कुछ बड़ा संगठित आन्दोलन नहीं होगा, तो पहले भी हैवानों ने पता नहीं कितने इन्द्र कुमार मेघवालों को मौत के घाट उतारा है। फिर किसी दिन किसी न‌ए इन्द्र कुमार मेघवाल की प्रताड़ना की खबर आएगी और.....?

इस पूरे प्रकरण में एक और मुद्दा भी है, सोशल मीडिया या बयानबाज़ी में कुछ लोगों ने हत्यारे हैड मास्टर की जाति को भी निशाना बनाया। हमारे ख्याल में यह बहुत ग़लत है, क्योंकि हर जाति में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं। किसी अपराधी की सजा उसकी जाति या परिवार को प्रताड़ित व अपमानित करके नहीं देनी चाहिए। साथ ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कुछ और राजनेता इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं, वो भी ग़लत है, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों।
(23/08/2022)
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