वक्फ बोर्ड और वक्फ कमेटियों पर उठते सवाल
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। देश में रेलवे और डिफेंस के बाद सबसे अधिक भूमि किसी संस्थान के पास है, तो वो वक्फ बोर्ड के पास है। लाखों बीघा वक्फ जायदाद है, जिसकी हिफाज़त और प्रबंधन के लिए हर राज्य में वक्फ बोर्ड बना हुआ है। वक्फ बोर्ड हर जायदाद की हिफाज़त के लिए वक्फ कमेटी बनाता है। यह कमेटियां अपनी आमदनी का सात फीसदी हिस्सा हर साल वक्फ बोर्ड को अंशदान के तौर पर भेजती हैं। वक्फ बोर्ड का गठन वक्फ एक्ट 1995 संशोधन 2013 के मुताबिक राज्य सरकार करती हैं। वक्फ बोर्ड में चेयरमैन वही बनता है जिसे राज्य सरकार चाहे, यानी सत्ताधारी दल का नेता वक्फ बोर्ड का चेयरमैन बनता है। ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, लेकिन राज्य सरकार वक्फ बोर्ड का गठन एक्ट के अनुसार भी मनमर्ज़ी से करती है।

अगली बात यह है कि पूरे देश में वक्फ जायदाद का बहुत बुरा हाल है, वक्फ जायदाद अतिक्रमण और खुर्द बुर्द की शिकार हैं। यह तब है जब वक्फ बोर्ड के सभी पदाधिकारी मुस्लिम होते हैं और इन जायदादों का फायदा भी मुसलमानों के लिए किए जाने का प्रावधान है। वक्फ जायदादों का यह बुरा हाल वक्फ बोर्ड के पदाधिकारियों, वक्फ कमेटियों के जिम्मेदारान और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से होता है, यह किसी से ढकी छुपी बात नहीं है।

अब बात राजस्थान की करें, जहां वक्फ बोर्ड में चेयरमैन सहित कुल नौ मेम्बर हैं। देश के अन्य भागों की तरह राजस्थान में भी वक्फ जायदाद का बुरा हाल है। हर शहर कस्बे में वक्फ जायदाद अतिक्रमण और खुर्द बुर्द की शिकार हैं। वक्फ बोर्ड चेयरमैन और मेम्बर वक्फ जायदाद के विकास और अतिक्रमण हटाने की बड़ी बड़ी बातें करते हैं, लेकिन धरातल की सच्चाई इनकी बातों से बिल्कुल उलट है। एक सितंबर को राजस्थान वक्फ बोर्ड की मीटिंग हुई, जिसमें 150 वक्फ कमेटियां बनाने या बदलने की बात कही जा रही है। इस दिन मुस्लिम मुसाफिरखाना जयपुर की तौलियत कमेटी यानी स्थाई कमेटी को लेकर एवं वक्फ जायदाद की हिफाज़त की मांग को लेकर बोर्ड ऑफिस के सामने कुछ लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किया और अपना मांग पत्र चेयरमैन व सदस्यों को दिया।

सवाल यह है कि वक्फ बोर्ड ने 150 कमेटियां एक ही बैठक में वो भी छह सात घंटे की, में कैसे बना दी ? अगर औसतन एक कमेटी में 11 लोग भी हैं, तो 1600 से ऊपर लोग हो ग‌ए, इन सभी पर चर्चा और सहमति बनाना एक मीटिंग में सम्भव नहीं है। एक मीटिंग में तभी सम्भव है, जब सारा खेल पहले से तय हो या सभी लोग अपने अपने इलाके व कमेटियों का बंटवारा कर लें। यह कमेटियां बनते ही आरोप प्रत्यारोप शुरू हो ग‌ए। जो एक आम बात है।

सवाल यह है कि वक्फ बोर्ड अपने काम में पारदर्शिता क्यों नहीं बरत रहा है ? वक्फ बोर्ड में कमेटी बनाने, किरायेदारी तय करने, किसी कमेटी को हटाने या कार्यकाल बढ़ाने के मुद्दे पर जो चर्चाएं चाय चौपालों पर होती हैं, वो बहुत ही निम्न स्तर की होती हैं, अगर इनमें कोई सच्चाई है तो यह बहुत ही शर्मनाक बात है। वक्फ बोर्ड को या तो हर कमेटी की मुद्दत तय करनी चाहिए, जैसे दो साल या तीन साल। इसके बाद वहां न‌ई कमेटी बना देनी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक कमेटी किसी चहेते या सेवादार की है, जो बरसों से चल रही है और दूसरी कमेटी अच्छा काम करते हुए भी राजनीतिक दबाव या किसी और वजह से हटा दी जाती है।

ऐसे ही मुतवल्ली और जांच का मामला है। किसी भी वक्फ कमेटी में मुतवल्ली (बिना कमेटी के सिर्फ एक संरक्षक) नहीं होना चाहिए। हर जायदाद की कमेटी बननी चाहिए। जितने भी मुतवल्ली हैं उन्हें हटाया जना चाहिए। वक्फ कमेटी के हिसाब किताब की जांच ईमानदारी से करवानी चाहिए और सभी कमेटियों की करवानी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि सेवादार कमेटियों की हर हेराफेरी जायज है और गैर सेवादार ईमानदार कमेटियों के पीछे चाबुक लेकर पड़ जाओ। साथ ही बोर्ड अगर ईमानदार है तो कम से कम पिछले 20 साल की सम्पूर्ण बोर्ड व कमेटियों की जांच एसीबी से करवाने की हिम्मत करे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि दाल में काला नहीं है बल्कि पूरी दाल ही काली है।
09/09/2022)
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