"जुर्म 151 का और सज़ा 302 की ?"

"जुर्म 151 का और सज़ा 302 की ?"
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गहलोत राज में एक उर्दू टीचर की शहादत का बेसब्री व बेशर्मी से इन्तज़ार करते सुलतानुल वक्त और दलालुल वक्त ??
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान में गांधी के अनुयायी अशोक गहलोत का शासन है, जो खुद को गांधीवादी और लोकतन्त्रवादी मानते हैं। गांधीवाद और लोकतंत्र की रक्षा के लिए वे हर मंच से अपने विचारों का बखान करते हैं। जो अच्छी बात है, लेकिन अमली तौर पर उनके शासन में न गांधीवाद है और ना ही लोकतंत्र। हां, गांधीवाद व लोकतंत्र का स्वांग जरूर है। आपको लग रहा होगा कि उक्त जुमले बहुत कड़वे हैं, लेकिन मुद्दा ही ऐसा है, जो कड़वे जुमलों को कलमबंद करने पर मजबूर कर रहा है। हो सकता है कि आगे इससे भी कड़वे जुमले इस लेख में पढ़ने को मिलें, इसलिए दिल थामकर इस पूरे लेख को पढ़िए और फिर खुद की अंतरात्मा से पूछिए कि जुमले कड़वे हैं या सच्चाई की दर्दनाक दास्तां हैं।


मुद्दा यह है कि राजस्थान में एक उर्दू शिक्षक ने गुनाह दफा 151 का किया है और उसे सज़ा दफा 302 में दी जा रही है और हैरानी इस बात की है कि इस सज़ा पर सब ख़ामोश तमाशबीन बने बैठे हैं। यह उर्दू शिक्षक अमीन कायमखानी हैं, जो राजस्थान उर्दू शिक्षक संघ के अध्यक्ष भी हैं। जिनको सरकार ने निलम्बित कर जयपुर से क़रीब 600 किलोमीटर दूर बांसवाड़ा ट्रांसफर कर दिया है। 

उल्लेखनीय यह है कि 5 सितंबर को शिक्षक दिवस पर जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम में राज्य स्तरीय सम्मेलन में शिक्षा मंत्री डाॅक्टर बीडी कल्ला के भाषण के दौरान वहां उपस्थित अमीन कायमखानी ने मुख्यमंत्री द्वारा उर्दू तालीम के सम्बन्ध में की गई बजट घोषणाओं का क्रियान्वयन नहीं होने का मुद्दा ज्यों ही उठाया तो वहां मौजूदा कुछ कांग्रेसी नेताओं ने अमीन कायमखानी के साथ दुर्व्यवहार करते हुए उनकी टांगाटोली कर हाॅल से धकेलते हुए उन्हें बाहर निकाल दिया और उसी दिन सरकार ने उनको सस्पेंड कर बांसवाड़ा भेजने का तानाशाही फरमान जारी कर दिया।

बात यहीं खत्म नहीं हुई। उर्दू तालीम व मदरसा तालीम के लिए बरसों से जद्दोजहद करने वाले इस योद्धा अमीन कायमखानी को बांसवाड़ा भेजने की "काला पानी" सजा के बाद गहलोत सरकार ने उन्हें 16 सीसीए का नोटिस भी थमा दिया। खबर है कि यह सब शिक्षा मन्त्री बीडी कल्ला के कर कमलों और कांग्रेस के कुछ मुस्लिम नेताओं के इशारे पर हुआ है और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को इस प्रकरण की पूरी जानकारी है।

अमीन कायमखानी के साथ हुए इस अन्याय पर हफ्ते भर पूरे प्रदेश में जबरदस्त रोष नज़र आया। विरोध प्रदर्शन और शिक्षा मन्त्री का पुतला दहन के साथ सरकार को ज्ञापन दिए गए। लेकिन यह रोष ठंडा पड़ गया, क्योंकि इस रोष के साथ न तो कोई राजनेता मैदान में आया और ना ही कोई सामाजिक व कर्मचारी संगठन।

राजस्थान में 9 मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें से दो मन्त्री हैं। इन विधायकों में से सिर्फ नगर विधायक वाजिब अली ने अमीन कायमखानी के समर्थन में मुख्यमंत्री को पत्र लिखा और ट्वीट किया। उन्होंने ट्वीट में कहा कि "शिक्षा मंत्री श्री बीडी कल्ला जी से निवेदन करता हूँ कि राजस्थान उर्दू शिक्षक संघ के अध्यक्ष अमीन क़ायमखानी का निलम्बन रद्द किया जाए, उनके द्वारा उठाई गई सभी माँगे जायज़ हैं, शिक्षा विभाग इन्हें जल्द पूरा करके उर्दू के साथ हो रहे भेदभाव को समाप्त करे ! जय हिंद।" इनके अलावा बाकी किसी ने अपना मुंह नहीं खोला।

कैबिनेट मंत्री पोकरण विधायक सालेह मोहम्मद और शिक्षा राज्य मंत्री कामां विधायक जाहिदा ख़ान की जिम्मेदारी ज्यादा बनती थी, सरकार में होने के नाते, लेकिन वे भी चुप। सालेह मोहम्मद के एक नजदीकी ने तो मंत्री महोदय की मानहानि का एक मुकदमा अमीन कायमखानी के खिलाफ पहले से जैसलमेर जिले में दर्ज करवा रखा है। आदर्श नगर विधायक और राज्य अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन रफीक खान की भी जिम्मेदारी आयोग चेयरमैन व अल्पसंख्यक शिक्षक का मामला होने के नाते ज्यादा बनती थी, लेकिन उन्होंने भी इस प्रकरण पर ख़ामोशी का लिबादा ओढ़ लिया।

इसी तरह हज कमेटी चेयरमैन व किशनपोल विधायक अमीन कागजी, वक्फ विकास परिषद चेयरमैन व फतेहपुर विधायक हाकम अली खां, मुख्यमंत्री के सलाहकार सवाई माधोपुर विधायक दानिश अबरार और रामगढ़ विधायक सफिया ख़ान ने भी इस मुद्दे पर खामोशी इख्तियार कर रखी है। पूर्व मंत्री शिव विधायक अमीन खां और वक्फ बोर्ड चेयरमैन डॉक्टर खानू खान बुधवाली ने भी इस मुद्दे पर मुंह खोलना उचित नहीं समझा। कांग्रेस के बड़े नेता जो विधायक व मंत्री रहे हैं, वे भी इस मुद्दे पर ख़ामोश हैं।

अमीन कायमखानी के साथ हुई इस ज्यादती पर सत्ता पक्ष के ही नहीं बल्कि विपक्ष के नेता भी एक तरह से ख़ामोश हैं। भाजपा नेता पूर्व मंत्री यूनुस खां जिन्हें गहलोत का नजदीकी समझा जाता है, उनकी जिम्मेदारी बनती थी कि वे इस मुद्दे को उठाते और मुख्यमंत्री से मिलकर अमीन कायमखानी को बहाल करवाते, लेकिन उन्हें भी इसके लिए कोई फ़ुरसत नहीं मिली। इसी तरह रालोपा, बीटीपी, बसपा, सीपीएम, सीपीआई, आप आदि विपक्षी दलों के नेता भी इस मुद्दे पर ख़ामोश से ही रहे। एमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी गत दिनों राजस्थान आए और दो दिन के दौरे में कुछ छोटी बड़ी सभाएं भी की, उनसे उम्मीद थी कि वे इस मुद्दे पर गहलोत सरकार को फटकार लगाएंगे, लेकिन उन्होंने भी कुछ नहीं बोला।

अब बारी सामाजिक संगठनों की। राजस्थान में दर्जनों छोटे बड़े सामाजिक संगठन हैं, क‌ई मुस्लिम इदारे व तन्जीमें हैं, असंख्य मुस्लिम रहनुमा भी हैं, लेकिन अमीन कायमखानी को न्याय दिलाने के लिए कोई सड़क पर नहीं उतरा। हर शहर कस्बे में जामा मस्जिद है, जहां इमाम, सदर, सेक्रेटरी वगैरह हैं, इनके अलावा शहर काजी अलग हैं, इन सबका अपने अपने इलाके में वजन है और हुकूमत इनकी बात को सुनती भी है, अगर यह अपना मुंह खोलने की हिम्मत करें तो, लेकिन अमीन कायमखानी के लिए इन्होंने भी कोई आवाज़ बुलंद कर अवाम को लामबंद नहीं किया। हैरानी तो यह है कि इनमें से 50 आदमी इकट्ठे होकर शिक्षा मन्त्री बीडी कल्ला से मिलने की दो महीने में हिम्मत नहीं जुटा पाए। फिर कैसे रहनुमा ?

राजस्थान में अल्पसंख्यक अधिकारी कर्मचारी महासंघ, उर्दू शिक्षक संघ, मदरसा पैराटीचर संघ और रकमा, जैसे कुछ संगठन भी हैं, जिनमें अधिकतर मुस्लिम कर्मचारी जुड़े हुए हैं और कई कर्मचारी नेता भी हैं। लेकिन उन्होंने भी खामोशी में भलाई समझी। पिछले 15 साल में अमीन कायमखानी की जद्दोजहद से सैकड़ों लोग उर्दू शिक्षक और मदरसा पैराटीचर लगे, लेकिन इन्होंने भी अमीन कायमखानी के साथ हुए अत्याचार पर न बोलना उचित समझा।

अब सवाल यह है कि यह क्यों नहीं बोल रहे हैं ? क्यों नहीं मैदान में उतरे ? सबके हित राज से जुड़े हुए हैं, इसलिए कोई राज के खिलाफ मुंह नहीं खोलना चाहता। इनमें से कोई सुलतानुल वक्त (शासन प्रशासन का कर्णधार) है, तो कोई सुलतानुल वक्त का चम्मचा है, तो कोई सुलतानुल वक्त का गुलाम है, तो कोई दलालुल वक्त (वर्तमान व्यवस्था का दलाल) है। इसलिए कैसे मुंह खोलें ? किसी ने बड़ी मुश्किल से एक अदद राजनीतिक नियुक्ति लेकर चोरी चकारी का जुगाड़ किया है, तो किसी को अगला टिकट पुख्ता करना है, कोई थाने तहसील स्तर का दलाल है, तो कोई ट्रांसफर पोस्टिंग के धंधे में उतरा हुआ है, कोई छोटा मोटा व्यापार करता है, इसलिए सरकार से डर कर चलना उसकी मजबूरी है।

आप मत बोलिए, ऐसे ही ख़ामोश रहिए। क्या होगा ? ज्यादा से ज्यादा अमीन कायमखानी की नौकरी चली जाएगी। सरकार ने जो निरंकुशता दिखाई है, उससे लगता कि सुलतानुल वक्त और दलालुल वक्त बड़ी बेसब्री व बेशर्मी से अमीन कायमखानी की बर्खास्तगी का इंतज़ार कर रहे हैं। लेकिन अमीन कायमखानी की नौकरी की यह शहादत ऐसा माहौल पैदा कर देगी कि फिर उर्दू तालीम के लिए कोई आवाज़ नहीं उठाएगा।

जरा सोचिए अमीन कायमखानी कौन है ? आपकी नज़र में एक बदतमीज, फुहड़ और किसी तुर्रम खां से नहीं दबने वाला, सरकार को खरी खोटी सुनाने वाला और अनुशासनहीन व्यक्ति हो सकता है। लेकिन अमीन कायमखानी जैसे पूरे प्रदेश में कितने लोग हैं, जो सत्ताधीशों की आंख में आंख डालकर उर्दू तालीम के लिए बात करे, मदरसा तालीम के लिए बात करे और उर्दू की वेकैंसी व किताबों की बात करे ? शायद कोई दूसरा नहीं।

यह अमीन कायमखानी ही है, जो अपनी स्कूल ड्यूटी के बाद गांव से आए किसी कर्मचारी को अपनी बाइक पर बैठा कर शिक्षा संकुल और सचिवालय के गलियारों में ले जाता, अधिकारियों के यहां धक्के खाता है, पीड़ितों के काम करवाता है, उनको चाय खाना भी अपनी जेब से खिलाता है और फिर उनको बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर छोड़कर रात 10 बजे बाद अपने घर पहुंचता है। रोजाना जयपुर शहर में 70-80 किलोमीटर बाइक चलाकर सरकारी दफ्तरों में धक्के खाकर पीड़ितों के काम आता है और कभी किसी का एहसान भी नहीं लेता है। कहां मिलेंगे ऐसे बेबाक, खुद्दार और हक़ के लिए जद्दोजहद करने वाले लोग ?

अमीन कायमखानी का क्या गुनाह था ? क्या मुख्यमंत्री की उर्दू तालीम से सम्बंधित बजट घोषणाओं के क्रियान्वयन की मांग शिक्षा मन्त्री के भाषण के दौरान उठाना गुनाह है ? अगर इसे अनुशासनहीनता भी मान लें तो इसकी इतनी बड़ी सज़ा ? लेकिन मुर्दा क़ौम के मुद्दों पर जद्दोजहद करना भी एक बड़ा गुनाह है और उसकी यही सज़ा होती है। और अगर उस कौम में ज़मीर फरोश रहनुमाओं और कुरदोगुलुओं की भीड़ हो, तो फिर कहना ही क्या। फिर तो सुलतानुल वक्त जैसे चलाएगा, दलालुल वक्त वैसे ही चलेंगे।
(09/11/2022)
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