राजस्थान विधानसभा चुनाव-2023 : कांग्रेस और भाजपा के जूतम पैजार से किस करवट बैठेगा सियासी ऊंट ?
राजस्थान विधानसभा चुनाव-2023 : कांग्रेस और भाजपा के जूतम पैजार से किस करवट बैठेगा सियासी ऊंट ?
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जिस तरह गहलोत के बिना कांग्रेस अधूरी है, वैसे ही वसुंधरा के बिना भाजपा का भी कुछ नहीं बंटेगा
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समाजवादी विचारधारा की पार्टियों का विलय कर देशभर में भाजपा को चुनौती देने से भी बदलेगा समीकरण
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। एक साल बाद यानी नवम्बर-दिसम्बर 2023 में देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में विधानसभा चुनाव होंगे। 1993 से लगातार यहां यह ट्रेंड रहा है कि एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस। हर चुनाव में छोटे दलों ने समीकरण बनाने व बिगाड़ने का प्रयास किया है, लेकिन उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली है। अब अगले चुनाव में प्रदेश का सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा, इसकी चर्चा सियासी गलियारों में तेज हो गई है।
अगले चुनाव में कांग्रेस जहां सरकार को रिपीट करने का दावा कर रही है, वहीं भाजपा का दावा है कि वो कांग्रेस को 2013 से भी बुरी तरह हराकर सरकार बनाएगी, तब कांग्रेस को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में 200 में से मात्र 21 सीटें मिली थीं और कांग्रेस की ऐसी बुरी हार 1977 में इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में भी नहीं हुई थी, जिसे कांग्रेस का सबसे बुरा दौर समझा जाता है। इसके अलावा कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां गुटबाजी और जूतम पैजार की शिकार भी हैं। ऐसे में दोनों ही पार्टियों के दावों में ज्यादा दम नहीं लग रहा है, जब तक गुटबाजी शान्त नहीं होगी तब तक दोनों पार्टियों के सामने हार के खतरे मंडराते रहेंगे।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट के बीच सियासी जंग बहुत ही निम्न स्तर की हो चुकी है, इससे सभी अच्छी तरह से वाकिफ हैं। इसी प्रकार भाजपा में वसुंधरा राजे को लेकर करो और मरो की स्थित पैदा हो चुकी है। वसुंधरा राजे हर हाल में पार्टी की बागडोर अपने हाथ में लेना चाहती हैं और भाजपा में मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे सभी बड़े नेता वसुंधरा राजे का बोरिया बिस्तर राजस्थान से समेटना चाहते हैं।
इसमें भी कोई दोराय नहीं है कि दोनों पार्टियों में गहलोत और वसुंधरा के कद का कोई दूसरा नेता नहीं है। जिस तरह गहलोत के बिना कांग्रेस अधूरी है, उसी तरह वसुंधरा के बिना भाजपा का कुछ बंटने वाला नहीं है। यानी गहलोत और वसुंधरा को घर बैठाकर जीत का सपना देखना दोनों ही पार्टियों के नेतृत्व के लिए बुरा सबक साबित हो सकता है, ऐसी चर्चा सियासी गलियारों में चल रही है।
राजस्थान की सियासत में छोटी पार्टियां भी सक्रिय हैं और वे हर चुनाव में बड़े बड़े दावे करके उतरती भी हैं। लेकिन कोई विशेष परिणाम नहीं आता है, बसपा को जरूर आधा दर्जन विधायक मिलते हैं, लेकिन वे तब जब भाजपा हारती है और चुनाव जीतते ही वे सभी कांग्रेस में शामिल होकर सत्ता का मज़ा लेने लग हैं। हनुमान बेनीवाल की पार्टी और बीटीपी के भी इस बार कुछ विधायक हैं और यह दोनों भी मैदान में पूरी ताक़त से उतरेंगे। इसके अलावा आम आदमी पार्टी और ओवैसी की एमआईएम तथा वेलफेयर पार्टी व एसडीपीआई भी मैदान में उतरने का दावा कर रही हैं।
इनके अलावा राजस्थान में समाजवादी पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टियों और जनता दल सेक्युलर जैसी आधा दर्जन पार्टियों का राजस्थान लोकतांत्रिक मोर्चा गठबंधन बरसों से बना हुआ है तथा हर बार यह मोर्चा कुछ सीटों पर चुनाव भी लड़ता है। गत चुनाव में इस गठबंधन के सीपीएम के सिम्बल पर दो विधायक जीते हैं। समाजवादी और मार्क्सवादी विचारधारा वाले इस गठबंधन को दिल्ली से इस बार बड़ी उम्मीद है।
दिल्ली में दोनों विचारधाराओं का बड़ा गठबंधन बनने की चर्चा भी सियासी गलियारों में चल रही है। बिहार में जिस तरह से समाजवादियों और मार्क्सवादियों ने मिलकर लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की मजबूत रणनीति से भाजपा को सत्ता से बेदखल किया है, तब से देश में एक विचित्र खुशी की लहर है और अब तो चर्चा यह भी हो रही है कि लालू के राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड दोनों पार्टियों का शीघ्र ही विलय हो रहा है।
इस विलय के बाद बनने वाली नई पार्टी में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, जयन्त चौधरी की आरएलडी, ओमप्रकाश चौटाला की इनेलो, नवीन पटनायक के बीजू जनता दल और पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के जनता दल सेक्युलर आदि का विलय करके समाजवादी विचारधारा वाले समस्त दलों की एक बड़ी पार्टी बनाई जाएगी, जिसका सांगठनिक नेतृत्व लालू प्रसाद यादव करेंगे और इस नई पार्टी के प्रधानमंत्री पद का चेहरा नीतीश कुमार होंगे। इस बड़ी व नई पार्टी का गठन 2023 की शुरुआत में होने की चर्चा है। जाहिर सी बात है कि फिर यह नई व बड़ी पार्टी राजस्थान का विधानसभा चुनाव भी लड़ेगी और फिर भाजपा व कांग्रेस से दुखी जनता इस पार्टी को कोई विशेष सफलता भी दिला सकती है।
सियासी गलियारों की उच्च चौपालों में चर्चा यह भी है कि इस नई पार्टी का राजस्थान में नेतृत्व भाजपा व कांग्रेस से अलग होकर कोई बड़ा नेता कर सकता है। जिसके लिए चार नाम चर्चा में हैं पहला वसुंधरा राजे, दूसरा सचिन पायलट, तीसरा मन्त्री बृजेन्द्र ओला और चौथा पूर्व मंत्री हरीश चौधरी का। अब यह चर्चा कितनी सफल होती है यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि दिल्ली की सत्ता हासिल करने को लेकर पक रही सियासी खिचड़ी राजस्थान में भी नया समीकरण 1977 और 1989 की तरह बनाएगी।
(24/10/2022)
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