गुजरात विधानसभा चुनाव

गुजरात विधानसभा चुनाव
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क्या कांग्रेस यह बताने का कष्ट करेगी कि वो मिश्रा कमिशन और अल्पसंख्यक आरक्षण पर खामोश क्यों है ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। तमाम मुद्दों पर अपनी राय रखने वाली कांग्रेस पार्टी एक मुद्दे पर पूरी तरह से खामोश है और वो मुद्दा है अल्पसंख्यक आरक्षण का। केन्द्र सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आनन फानन में जनवरी 2019 में सामान्य वर्ग के पिछड़ों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करने के लिए संविधान में संशोधन किया और फिर आर्थिक आधार के इस ईडब्ल्यूएस आरक्षण को लागू कर दिया। इस पर कई सवाल उठे, जो आज भी उठ रहे हैं। लेकिन 7 नवम्बर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने इस आरक्षण पर मुहर लगा दी है।
एकाध पार्टी को छोड़कर कमोबेश सभी पार्टियां इस आरक्षण के समर्थन में हैं, कुछ दिखावे के लिए सिर्फ किन्तु परन्तु कर रही हैं, लेकिन खुलकर वे भी विरोध में नहीं हैं। देश की दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस भी इस आरक्षण के समर्थन में है। लेकिन कांग्रेस सहित बाकी विपक्षी पार्टियां अल्पसंख्यक आरक्षण के मुद्दे पर पूरी तरह से ख़ामोश हैं। वजह साफ है कि अल्पसंख्यक आरक्षण के दायरे में मुसलमान भी आते हैं और उनके विकास का एजेंडा इन पार्टियों की डिक्शनरी में नहीं है।

गुजरात में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, वहां बड़ा वोट बैंक मुसलमानों का भी है, जो अधिकतर कांग्रेस को मिलता है। इस बार उसमें से अच्छा खासा आम आदमी पार्टी को भी मिलता लग रहा है। लेकिन मुसलमानों के किसी भी मुद्दे पर कांग्रेस व आप नेता मुंह खोलने की हिम्मत नहीं कर रहे हैं। वजह साफ है, वे दिखाना नहीं चाहते कि हम मुसलमानों के रत्तीभर भी हमदर्द हैं। यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे बुरा अध्याय है।

अल्पसंख्यक आरक्षण की सिफारिश जस्टिस मिश्रा कमिशन ने की थी और कांग्रेस की इस पर खामोशी से बहुत बड़ा सवाल खड़ा होता है, क्योंकि कांग्रेस 2013 तक खुलकर अल्पसंख्यक आरक्षण के समर्थन में थी और यह कमिशन भी कांग्रेस गठबंधन की यूपीए सरकार ने ही बनाया था। कांग्रेस के मौजूदा रवैये से मुसलमानों में कड़ी नाराज़गी है। 

उल्लेखनीय यह भी है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए प्रथम सरकार में समाजवादियों और मार्क्सवादियों के दबाव से जस्टिस सच्चर कमेटी और जस्टिस मिश्रा कमिशन का गठन हुआ था। मिश्रा कमिशन ने मुसलमानों सहित अल्पसंख्यकों को 15 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की थी। हालांकि कांग्रेस ने अल्पसंख्यक आरक्षण का मुद्दा अपने 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र में शामिल भी किया था। लेकिन कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने और मिश्रा कमिशन की रिपोर्ट को संसद में रखने के लिए कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

2012 में यूपी विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले दिन केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने आनन फानन में साढ़े चार प्रतिशत अल्पसंख्यक की घोषणा की। इसके अगले दिन समाजवादी पार्टी ने यूपी में सरकार बनने पर 18 प्रतिशत अल्पसंख्यक आरक्षण देने की घोषणा कर दी। समाजवादी पार्टी की सरकार बनी, लेकिन अल्पसंख्यक आरक्षण के वादे पर कुछ नहीं हुआ और अब समाजवादी पार्टी भी इस मुद्दे को भूल गई है। 2019 के लोकसभा चुनाव में तो यह मुद्दा कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणा पत्र से भी हटा दिया, जो 2004 से 2014 तक लगातार चल रहा था।

कांग्रेस के इस रवैये और खामोशी से अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुसलमानों में जबरदस्त नाराज़गी है और वे यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि कांग्रेस को यह बताने का कष्ट करना चाहिए कि वो मिश्रा कमिशन की रिपोर्ट और अल्पसंख्यक आरक्षण पर अपनी क्या राय रखती है ? तथा वो इस मुद्दे पर खामोश क्यों है ? इन सवालों को आम अल्पसंख्यक ही नहीं कांग्रेसी अल्पसंख्यक भी खड़े कर रहे हैं, लेकिन वे बेचारे बेबस हैं, क्योंकि पार्टी के अन्दर उनकी कोई सुनने वाला ही नहीं है और पार्टी के उच्च नेताओं की नीतियों ने उन्हें सिर्फ जिन्दाबाद व मुर्दाबाद के नारों तक महदूद कर दिया है।
(09/11/2022)
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