बाबरी मस्जिद विध्वंस का दोषी कौन ?
बाबरी मस्जिद विध्वंस का दोषी कौन ?
--------------------------------------------------
जितना दोष भाजपा व आरएसएस का है, उससे ज्यादा दोष कांग्रेस का भी है !
*******************************
जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। पूरे देश में हर साल 6 दिसम्बर को सभी मुसलमान और सेक्यूलर लोग "काला दिवस" मनाते हैं। सच में यह आजाद भारत का काला दिन है। काला दिन इसलिए क्योंकि इस दिन 1992 में करीब चार सौ साल पुरानी ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद का दिन के उजाले में विध्वंस कर दिया गया था। विध्वंस करने वाले आरएसएस से सम्बंधित लोग थे। आरएसएस यानी भारतीय जनता पार्टी को जन्म देने वाला संगठन। बाबरी मस्जिद का विध्वंस सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुरक्षा के लिए दिए गए शपथ पत्र के बावजूद हुआ। तब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी और प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे तथा उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और मुख्यमंत्री कल्याण सिंह थे।
यूपी की तत्कालीन भाजपा सरकार और केन्द्र की कांग्रेस सरकार दोनों की इस विध्वंस में मिलीभगत थी। वो इसलिए कि दोनों ने ही मस्जिद को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। हालांकि लम्बी सुनवाई के बाद 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने यहां राम मन्दिर बनाने की अनुमति दे दी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 5 अगस्त 2020 को इसका शिलान्यास भी कर दिया। लेकिन मुस्लिम समुदाय और सेक्यूलर लोगों का गुस्सा बरकार है, इसीलिए इस बार भी 6 दिसम्बर को काला दिवस मना कर गुस्से का इजहार किया गया।
काला दिवस मनाने वाले बहुत से भारतवासी ऐसे हैं, जो बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए कांग्रेस व भाजपा दोनों को बराबर का दोषी मानते हैं और एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की भी है, जो भाजपा व आरएसएस से ज्यादा दोषी कांग्रेस को मानते हैं। हो सकता है आप हमारे इस विचार से सहमत नहीं हों, लेकिन इतिहास की सच्चाई को कोई छुपा नहीं सकता, वो हमेशा 6 दिसम्बर के नजदीक चिल्ला चिल्ला कर कहेगी कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए जितना आरएसएस व भाजपा दोषी है, उससे ज्यादा कांग्रेस भी दोषी है। वो इसलिए कि केन्द्र सरकार कांग्रेस की थी और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मस्जिद की सुरक्षा के लिए शपथ पत्र भी दिया था। सभी केन्द्रीय एजेंसियां कांग्रेस सरकार के नियंत्रण में थी। खतरे की हर खबर सरकार को मालूम थी। फिर भी कांग्रेस सरकार ने मस्जिद को नहीं बचाया। कांग्रेस की केन्द्र सरकार चाहती तो दिसम्बर 1992 की शुरुआत में ही यूपी में राष्ट्रपति शासन लगा देती, जब हजारों लोग मस्जिद को विध्वंस करने के इरादे से अयोध्या पहुंच रहे थे और मस्जिद की सुरक्षा सेना के हवाले कर देती। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि कांग्रेस खुद पर्दे के पीछे से मस्जिद विध्वंस करवाना चाहती थी।
अब ऐतिहासिक तथ्यों की बात करें, 1949 में बाबरी मस्जिद के अन्दर रात के अन्धेरे में मूर्तियां रखी गई। यहां विवाद पहले से चल रहा था, लेकिन मूर्तियां रखने के बाद इस विवाद ने बड़ा रूप धारण कर लिया। तब देश के प्रधानमन्त्री थे पण्डित जवाहरलाल नेहरू और यूपी के मुख्यमंत्री थे गोविन्द बल्लभ पन्त। नेहरू और पन्त कौन थे ? दोनों ही कांग्रेस के बड़े नेता थे। फिर आया 1982 का वर्ष, जब बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाने के आन्दोलन ने जोर पकड़ा। तब प्रधानमन्त्री थीं इन्दिरा गांधी और यूपी जहां अयोध्या में बाबरी मस्जिद थी, वहां के मुख्यमंत्री भी कांग्रेस के थे। जब ताले खुले तब भी केन्द्र व यूपी में कांग्रेस की सरकार थी। प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे और मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह।
अब आया शिलान्यास का समय, 1989 में अयोध्या में मन्दिर निर्माण का शिलान्यास हुआ। तब भी केन्द्र व यूपी में कांग्रेस की सरकार थी। प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी और यूपी के मुख्यमंत्री थे नारायण दत्त तिवारी। खुद प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अयोध्या पहुंच कर शिलान्यास किया था। फिर इसके करीब तीन साल बाद आया वो मनहूस दिन 6 दिसम्बर 1992, जिस दिन बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ और भारतीय संविधान व सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाई गई। देश को साम्प्रदायिक दंगों की आग झौंक दिया गया। तब भी केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी और प्रधानमन्त्री थे पी वी नरसिम्हा राव।
मूर्तियां रखी कांग्रेस के राज में। बाबरी मस्जिद के ताले खुले कांग्रेस के राज में। शिलान्यास हुआ कांग्रेस के राज में और विध्वंस भी हुआ कांग्रेस के राज में। कांग्रेस की नीयत साफ होती, तो इन दर्दनाक घटनाओं को रोक सकती थी। लेकिन उसने इन्हें रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। हां, कुछ लोग जरूर कह सकते हैं कि कांग्रेस सरकार ने बाबरी मस्जिद को बचाने का प्रयास किया था, लेकिन वो इसे बचाने में सफल नहीं हो पाई। यह सरासर झूठ है। हकीकत तो यह है कि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने बाबरी मस्जिद को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। विध्वंस के दिन राष्ट्रपति डाॅक्टर शंकरदयाल शर्मा फूट फूट कर रोये थे, वो मस्जिद को बचाना चाहते थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने उनकी नहीं चलने दी।
कांग्रेस की केन्द्र सरकार चाहती, तो अयोध्या को समय रहते सेना के हवाले कर सकती थी और मस्जिद को बचा सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और यह जानबूझकर नहीं किया। यह ऐतिहासिक सच्चाई है। जिसे छुपाया नहीं जा सकता। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद देश में कई जगह साम्प्रदायिक फसाद हुए थे। जिसमें सैकड़ों बेगुनाह लोग मारे गए थे। सबसे ज्यादा मौतें मुम्बई में हुईं थीं। जो महाराष्ट्र की राजधानी है और वहां भी तब कांग्रेस की सरकार थी। महाराष्ट्र में दंगों की जांच के लिए श्रीकृष्णा जांच आयोग गठित किया गया था। जिसने दोषियों के नाम और साजिश को उजागर किया था। लेकिन लगातार 15 साल तक महाराष्ट्र में सरकार चलाने के बावजूद कांग्रेस ने श्रीकृष्णा जांच आयोग की रिपोर्ट की धूल भी नहीं झाड़ी, क्यों ? यह है कांग्रेस और भाजपा का अन्तर। यह है कांग्रेस का चाल, चरित्र व चेहरा।
(06/12/2022)
--------------------------------------
➡️अगर आपको हमारा यह लेख/खबर पसंद आया हो, तो प्लीज इसे शेयर/फॉरवर्ड कीजिए और साथ ही हमारे अखबार की आर्थिक मदद भी कीजिए।
अकाउंट डिटेल्स:- इकरा पत्रिका
A/c no. 613900 55000 00252
IKRA PATRIKA
IFSC:- PUNB 0613900
PNB, MUSLIM SR. SEC. SCHOOL, MOTI DUNGARI ROAD, JAIPUR.
-------------------------------------------
➡️इकरा पत्रिका को सहयोग राशि आप Paytm, Phone Pay और Google Pay से भी भेज सकते हैं। फोन नम्बर 9414361522 पर (अकाउंट Farooq Ali Khan)
--------------------------------------------
©️ Copyright :- इस सम्पूर्ण लेख/खबर को या इसके किसी पैराग्राफ़ को हुबहू या तोड़ मरोड़ कर प्रकाशित करना मना है। अलबत्ता आप चाहें तो लेखक और हमारे अखबार के नाम के साथ इस सम्पूर्ण लेख/खबर को सोशल मीडिया पर शेयर जरूर कर सकते हैं।
---------------------------------------------
-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।
09602992087, 09414361522
©️ Copyright Thar News & Ikra Patrika.
All Rights Reserved.


Comments
Post a Comment