आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस व भाजपा की नीतियां एक जैसी हैं !
आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस व भाजपा की नीतियां एक जैसी हैं !
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। हमारा देश एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है और एक स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि उस राष्ट्र के सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए सरकार कोई खास प्रयास करे। यानी पिछड़ों और प्रताड़ित लोगों के लिए सीटें आरक्षित करे। इसीलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में आरक्षण की व्यवस्था कायम की। यह आरक्षण सामाजिक रूप से पिछड़े एवं अछूत समझे जाने वाले लोगों के लिए तय किया गया। जिसमें दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। जिसे एससी, एसटी और ओबीसी के नाम की श्रेणियों में बांटा गया है, हालांकि ओबीसी आरक्षण आजादी के चार दशक बाद वी पी सिंह की जनता दल सरकार ने दिया था। वर्तमान भाजपा सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े हुए सामान्य वर्ग के लोगों को भी ईडब्ल्यूएस श्रेणी बनाकर 10 प्रतिशत आरक्षण दे दिया है, यानी वर्तमान में देश की 95 प्रतिशत से अधिक आबादी आरक्षण के दायरे में है।
आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर कई वर्षों से सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इन सवालों को खड़े करने वालों में अधिकतर वे लोग हैं, जिन्हें किसी भी श्रेणी में आरक्षण नहीं मिला था या यूं कहें कि उन्हें उच्च वर्ग या सवर्ण वर्ग या सामान्य वर्ग से सम्बंधित व्यक्ति समझा जाता है। लेकिन अब इस वर्ग को भी 10 प्रतिशत आरक्षण मिल चुका है। यह भी एक सच्चाई है कि आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान सवर्ण वर्ग से सम्बंधित राजनेताओं का ही रहा है। चाहे वो दबाव में रहा हो या उनकी न्यायप्रिय सोच के चलते रहा हो।
संविधान सभा ने आरक्षण की स्वीकृति संविधान में दी थी तथा संविधान सभा के अधिकतर सदस्य सवर्ण वर्ग से सम्बंधित थे, हालांकि आरक्षण की व्यवस्था को लागू करवाने में संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन बाबा साहेब डाॅक्टर भीम राव अम्बेडकर का भी बड़ा योगदान था और उनके इस योगदान को नजरअंदाज करना अपने आपको धोखा देना और इतिहास के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। परन्तु भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के उन कर्णधारों के योगदान को नजरअंदाज करना भी एक तरह से इतिहास और इन महापुरुषों के साथ अन्याय है, जो सवर्ण वर्ग से सम्बंधित थे, लेकिन उन्होंने देश में मानवीय एवं न्यायपूर्ण व्यवस्था कायम करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था को लागू किया था।
इन महापुरुषों में महात्मा गाँधी, पण्डित जवाहरलाल नेहरू, डाॅक्टर राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, लाल बहादुर शास्त्री, काका कालेलकर, डाॅक्टर राम मनोहर लोहिया, मौलाना हसरत मौहानी, मोरारजी देसाई, चन्द्र शेखर, वी पी सिंह, मधु लिमये आदि कई नाम हैं, जो सवर्ण वर्ग से सम्बंधित थे तथा उन्होंने देश में आरक्षण व्यवस्था की स्थापना करवाई थी। यह भी सच है कि आरक्षण की व्यवस्था की स्थापना में कांग्रेस के शुरुआती शासन एवं नेताओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन साठ के दशक के बाद कांग्रेस नेतृत्व एवं उसके शासन में आरक्षण की व्यवस्था को कमजोर करने व समाप्त करने की कोशिशें शुरू हुईं तथा कांग्रेस ओबीसी को आरक्षण देने के लिए तैयार नहीं थी।
कांग्रेस में आरक्षण विरोधी राजनेताओं का बोलबाला हो गया था। जिसका नुकसान आरक्षित वर्ग आज तक भुगत रहा है। देश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार केन्द्र में 1977 में जनता पार्टी के नाम पर बनी और इस सरकार ने ओबीसी आरक्षण के लिए मण्डल कमिशन का गठन किया, लेकिन जनता पार्टी की सरकार जाने के बाद 1980 में जब वापस इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार आई तो उसने तथा फिर राजीव गांधी सरकार ने 1989 तक मण्डल कमिशन की रिपोर्ट को लागू ही नहीं किया। इससे यह साबित होता है कि इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी ओबीसी आरक्षण के खिलाफ थे, जबकि इन दोनों मां बेटे की सरकारें पूर्ण बहुमत की थी और वो चाहते तो ओबीसी आरक्षण लागू कर सकते थे।
ओबीसी आरक्षण लागू करने का वादा 1989 के आम चुनाव में जनता दल ने किया था तथा चुनाव बाद बनी वी पी सिंह सरकार ने मण्डल कमिशन की रिपोर्ट को लागू करते हुए ओबीसी जातियों को आरक्षण दिया। यह सरकार भाजपा के समर्थन से बनी हुई सरकार थी। भाजपा ने ओबीसी आरक्षण देने एवं मण्डल कमिशन की रिपोर्ट को लागू करने का जमकर विरोध किया। लेकिन प्रधानमन्त्री वी पी सिंह और अन्य समाजवादी नेताओं ने भाजपा की एक न सुनी और मण्डल कमिशन की रिपोर्ट को लागू कर ओबीसी को आरक्षण दे दिया। नाराज भाजपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और चन्द महीनों पहले बनी वी पी सिंह सरकार गिर गई। इससे यह साबित होता है कि भाजपा भी कांग्रेस की तरह ओबीसी आरक्षण की विरोधी है और आरक्षण के सन्दर्भ में दोनों की नीतियों में कोई बड़ा अन्तर नहीं है।
एससी और एसटी को शिक्षण संस्थानों, नौकरियों और विधायिका में भी आरक्षण मिला हुआ है, जबकि ओबीसी को विधायिका में आरक्षण नहीं मिला हुआ है। एससी और एसटी का बैक लाॅक (बची हुई भर्तियां) देशभर में बड़ी संख्या में हैं, लेकिन उसको भरने में सरकारों की नीयत में पूरी तरह खोट है, खासतौर पर भाजपा व कांग्रेस की सरकारों में। इसी तरह एससी, एसटी और ओबीसी को निजी क्षेत्रों में आरक्षण देने और आबादी के हिसाब से आरक्षण में बढोतरी करने के मामले में भी इन दोनों पार्टियों की नीतियां एक जैसी हैं।
ओबीसी को विधायिका में आरक्षण देने और जातिगत जनगणना कराने के लिए तो यह पार्टियां मुंह तक नहीं खोलती हैं। दोनों पार्टियों की सोच जातिगत जनगणना और आरक्षण के विरोध में है। दिखावे के तौर पर आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को कायम रखने और इसके साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं करने की बात दोनों पार्टियों के बड़े नेता बाबुलन्द आवाज में कहते रहते हैं। साथ ही कांग्रेस व भाजपा के नेता एक दूसरे पर आरक्षण विरोधी होने का आरोप भी लगाते रहते हैं।
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के बड़े नेता कई बार इस बात को दोहरा चुके हैं कि हम आरक्षण को न खत्म करेंगे और ना ही किसी को करने देंगे। लेकिन संघ परिवार कई बार आरक्षण की समीक्षा करने की बात कह चुका। साथ ही भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी यह साफ शब्दों में कह चुके हैं कि हम आरक्षण को ऐसी स्थिति में पहुंचा देंगे, जहाँ उसका होना न होना कोई मायने नहीं रखेगा। यानी आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह से अप्रभावी कर उसे पैरालाइसिस कर दिया जाएगा। ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर भी कांग्रेस व भाजपा दोनों एक हैं और इसके जरिए आरक्षण की पूर्व की व्यवस्था को या खत्म कर दिया जाएगा या फिर न होने जैसी बना दी जाएगी।
अब सवाल भाजपा और कांग्रेस दोनों से यह है कि अगर आप आरक्षण का समर्थन करते हैं, तो क्या एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण आबादी के अनुपात में बढाएंगे ? क्या आप इन तीनों वर्गों को निजी क्षेत्रों में आरक्षण देंगे ? क्या आप जातिगत जनगणना कराएंगे ? क्या आप शीघ्रता से बैक लाॅक भरवाएंगे ? क्या ओबीसी को विधायिका में आरक्षण दिलवाएंगे ? अगर नहीं, तो फिर आरक्षित वर्गों के नाम पर आपको घड़ियाली आंसू भी नहीं बहाने चाहिएं।(22/11/2022)
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