"राजस्थान में मुख्यमंत्री की कुर्सी के झगड़े का किस्सा पायलट नहीं है बल्कि गहलोत और वसुंधरा का भ्रष्टाचार है"
1998 से 2023 तक के इन 24 बरसों में 10 बरस भाजपा से वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री रही हैं और शेष कार्यकाल तीन बार करके वर्तमान कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का रहा है। इन 24 बरसों में खनन, नगरीय विकास, पीडब्ल्यूडी, परिवहन, शिक्षा, पंचायती राज, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, जलदाय, ऊर्जा, उद्योग आदि महकमों से जमकर माल बनाया गया है। इस लूट में भाजपा और कांग्रेस दोनों के बहुत से नेता और अधिकारी शामिल रहे हैं तथा बहुत से आज साझेदार बने हुए हैं। इन सभी को संरक्षण अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे का मिला हुआ है यानी लूट का माल व्यवस्थित व्यवस्था से ऊपर से ऊपर तक पहुंचता है।
इन 24 बरसों में सरकारी नौकरी के लिए जो भी प्रतियोगी परीक्षाएं हुई हैं, उनमें भी अधिकतर के पेपर लीक हुए हैं, कुछ का पर्दाफाश हो गया और कुछ का नहीं हुआ। पेपर लीक गिरोह की कारस्तानी को गौर से समझा जाए तो ऐसा लग रहा है कि राजस्थान में सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं तथा परीक्षा, इंटरव्यू और नियुक्ति में पूरी तरह से भ्रष्टाचार व भाई भतीजावाद ने अपना जाल बिछा रखा है। हम दावे के साथ कह रहे हैं कि अगर हाईकोर्ट की निगरानी में राजस्थान के पेपर लीक प्रकरण और विभिन्न विभागों के कर्मकाण्डों की जांच पड़ताल की जाए तो तार ऊपर से ऊपर तक जुड़े हुए मिलेंगे तथा 24 बरस के बड़े बड़े कर्णधार और सफेदपोश पूरी तरह से बेनकाब हो जाएंगे।
बस इसी बेनकाबी के डर से मुख्यमंत्री नहीं बदला जा रहा है तथा एक नियोजित कार्यक्रम के तहत प्रदेश की सत्ता अशोक गहलोत से वसुंधरा राजे और वसुंधरा राजे से अशोक गहलोत के बीच हस्तांतरित होती रहती है। यह किसी से छिपा हुआ नहीं है कि 2018 में अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने में वसुंधरा राजे ने पर्दे के पीछे पूरा सहयोग किया ताकि सचिन पायलट जैसा युवा मुख्यमंत्री बनकर उनके राज के राज की परतें नहीं खोल दे। फिर 2020 में फिर अशोक गहलोत की गिरती हुई सरकार को वसुंधरा राजे ने बचाया और आज भी बचा रही हैं।
खबर है कि अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के निकटतम राजदार एक दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं तथा राज की ऊंच-नीच एक दूसरे के आका तक पहुंचाते रहते हैं और कोई काम हो तो वो भी करवाते रहते हैं। यहां तक कि बड़े स्तर के ट्रांसफर पोस्टिंग और नियुक्ति भी। अब एक बार फिर मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा सियासत के उच्च गलियारों में चल रही है, जिसके लिए अशोक गहलोत कतई तैयार नहीं हैं, चाहे चुनावी वर्ष में सरकार ही क्यों न चली जाए। ऐसी स्थिति में कांग्रेस नेतृत्व भी फूंक फूंक कर कदम रख रहा है। अब देखना यह है कि चुनाव बाद जो भी मुख्यमंत्री बनेगा, वो ढ़ाई दशक के राज के राज से पर्दा उठाएगा या नहीं ?


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