न्यूज़ीलैंड की पीएम जैसिंडा अर्डर्न के इस्तीफे से क्या हमारे राजनेता भी सबक सीखेंगे ?

न्यूज़ीलैंड की पीएम जैसिंडा अर्डर्न के इस्तीफे से क्या हमारे राजनेता भी सबक सीखेंगे ?

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। न्यूजीलैंड की युवा प्रधानमंत्री ने 19 जनवरी को इस्तीफे की घोषणा की तो यह खबर पूरे विश्व में चर्चित होने लगी। वो इसलिए कि न तो उनका अपने देश में कोई बड़ा विरोध हो रहा है और ना ही कोई राजनीतिक संकट है, उल्टा उनकी प्रसिद्धि अपने देश में पीक (शिखर) पर है। फिर भी उन्होंने इस्तीफा दे दिया, क्यों ?


उन्होंने अपने इस्तीफे की घोषणा के साथ कहा कि "मेरे पास न्यूजीलैंड के विकास में योगदान देने के लिए अब कुछ नहीं बचा है, अब पद पर रही तो देश का नुक़सान होगा, मैं जितना कर सकती थी किया, अब यह जिम्मेदारी कोई और सम्भाले।" यह बात अपने आप में बहुत बड़ी है, क्योंकि उन्होंने अपने छह साल के कार्यकाल में न्यूजीलैंड के लिए हर क्षेत्र में बहुत कुछ किया है और जनता उनके काम से खुश भी है। यह उनका दूसरा कार्यकाल है। इस वक्त उनकी उम्र करीब 42 साल है और वे 2017 में 37 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनीं थीं। वे तब विश्व की सबसे छोटी उम्र की राष्ट्र प्रमुख बनी थीं।

उन्होंने विकास, समानता, मानवाधिकार और साम्प्रदायिक सद्भाव के मुद्दों पर पूरी तत्परता और बेबाकी से काम किया। उनका वो रूप भी 2019 में दुनिया ने देखा जब न्यूज़ीलैंड की एक मस्जिद में नमाज़ के दौरान आतंकी हमला हुआ और उसमें क‌ई बेगुनाह लोग मारे गए एवं घायल हो गए। जैसिंडा अर्डर्न ने आतंकी व साम्प्रदायिक विचारधारा को कड़ी फटकार लगाई तथा वे मस्जिद में पहुंची, डरे सहमे मुसलमानों को उन्होंने गले लगाया। तब उनकी पूरे विश्व में प्रशंसा की गई।

इतनी प्रसिद्धि पाने और बेहतरीन काम करने के बावजूद उन्होंने इस्तीफे की घोषणा क्यों की ? सत्ता किसी को बुरी नहीं लगती, सत्ता के लिए लोग झूठ, फरेब, हिंसा, नफ़रत यानी हर हथकंडे का इस्तेमाल कर लेते हैं, ऐसे में युवा जैसिंडा को सत्ता अच्छी क्यों नहीं लग रही है ? यकीनन उन्हें भी सत्ता अच्छी लगती है, लेकिन सत्ता से पहले उन्हें अपनी जनता व देश अच्छा लगता है। उन्होंने सिर्फ इसलिए सत्ता छोड़ी है ताकि कोई नया प्रधानमंत्री उनसे भी ज्यादा अच्छा न्यूजीलैंड का शासन चलाए तथा जनता को और भी बहुत कुछ दे जो वो किसी कारण नहीं दे पाई। क्या ऐसी सोच हमारे राजनेताओं में पैदा होगी ? क्या उम्र के आख़री पड़ाव में पहुंच चुके हमारे राजनेता न्यूजीलैंड की पीएम जैसिंडा अर्डर्न से कोई सबक सीखेंगे ? जो दशकों से सत्ता के चिपके हुए हैं।

हमारे देश में असंख्य राजनेता ऐसे मिल जाएंगे, जिन्होंने जीवन के 70 या इससे ऊपर बसंत देख लिए हैं, लेकिन अब भी वे मंत्री, सांसद, विधायक आदि बने हुए हैं और कुर्सी छोड़ना भी नहीं चाहते, कुर्सी भी एक शर्त पर छोड़ेंगे जब उनकी पार्टी टिकट उनके बेटे बेटी को दे, यानी यह लोग न सिर्फ आजीवन सत्ता में बने रहना चाहते हैं बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता भी अपने परिवार में ही रखना चाहते हैं। जिसकी वजह यह है कि हमारे यहां अधिकतर राजनेताओं का मकसद जनता की भलाई करना नहीं है, बल्कि राज के जरिए माल बनाना है और इस लूट खसोट में कमोबेश सभी राजनीतिक दलों के नेता शामिल हैं।

सरपंच और पार्षद से लेकर मंत्री और मुख्यमंत्री तक हजारों राजनेता ऐसे हैं, जो 70 या इससे भी ऊपर के हो गए हैं। इनमें बहुतों पर भ्रष्टाचार और अपराधिक गतिविधियों में शामिल रहने के आरोप भी लगे हुए हैं, इनमें काफी मुकदमेबाजी में भी उलझे हुए हैं, लेकिन मजाल है कोई पद से इस्तीफा दे दे। सरपंच और पार्षद के चुनाव में तो सत्ता का खेल यहां तक होता है कि जब कोई सीट एससी एसटी के लिए आरक्षित हो जाती है तो बहुत से पूर्व सरपंच व पूर्व पार्षद आरक्षित वर्ग के किसी ग़रीब को डमी उम्मीदवार बनाकर चुनाव जीता देते हैं और फिर पूरे पांच साल उसके नाम पर राज के मजे लेते हैं।

हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आदि जो बरसों से सत्ता में हैं। जिनका विरोध भी खूब है। ऐसे और भी मुख्यमंत्री, मंत्री आदि हैं, क्या यह लोग जैसिंडा अर्डर्न से कोई सबक सीखेंगे ? केन्द्र व राज्यों के मंत्रिमंडल में ऐसे कई नेता हैं जो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से ज्यादा अच्छा काम कर रहे हैं और काबिल भी हैं, क्या ऐसे नेताओं के लिए यह लोग जगह ख़ाली करेंगे ? नहीं, क्योंकि ऐसा हमारे यहां न तो कोई सियासी रिवाज़ है और ना ही जैसिंडा अर्डर्न की तरह हमारे नेताओं का दिल बड़ा है।
(24/01/2023)
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