ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ और उनका मिशन
ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ और उनका मिशन
तब देश की राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक व्यवस्था पर कुछ तबकों का खानदानी कब्जा था। दलितों, आदिवासियों और पिछड़े तबकों को किसी किस्म का कोई अधिकार नहीं था। वे सिर्फ ऊंचे तबके यानी उच्च वर्ग के लोगों की सेवा करते थे और उन्हीं के रहमो करम पर अपनी जिन्दगी गुजारते थे। इन्सान, इन्सान में इतना फर्क समझा जाता था कि निचले तबके के एक इन्सान की परछाई भी अगर ऊंचे तबके के इन्सान पर पड़ जाती तो वो अपने आपको अपवित्र मानने लग जाता और इस मुद्दे पर निचले तबके वाले इन्सान को सजा दी जाती थी। कहने का मतलब यह है कि हमारे मुल्क में इन्सानियत पूरी तरह धार्मिक आडम्बरों और कर्मकाण्डों के शोषण से त्राहि-त्राहि कर रही थी। ऐसे माहौल के बीच हमारे मुल्क में ख्वाजा साहब तशरीफ लाए थे।
ख्वाजा गरीब नवाज एक बेहतरीन इस्लामिक स्कॉलर और सूफी सन्त थे। उन्होंने ईश्वर के आखरी पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पवित्र जिन्दगी को पूरी तरह से अपनी जिन्दगी में उतार रखा था। उन्होंने आखरी पैगम्बर के एक-एक हुक्म को इन्सानों तक फैलाने के लिए अपनी पूरी जिन्दगी इन्सानियत के नाम समर्पित कर दी थी। ख्वाजा साहब हमारे मुल्क के रहने वाले नहीं थे, यहां की भाषा भी नहीं जानते थे। फिर भी उन्होंने इन्सानियत का पैगाम फैलाने के लिए इस मुल्क को अपना मुल्क बना लिया। ख्वाजा साहब इन्सानियत के मसीहा बनकर हमारे मुल्क में आए। वे एक मिशन लेकर यहां आए थे और वो मिशन था अमन, भाईचारा, समाजी बराबरी और एक खुशहाल व शान्त समाज का निर्माण करना।
ख्वाजा साहब ने यहां रोती-बिलखती इन्सानियत के आंसू पौंछे। शोषण व भेदभाव के शिकार लोगों को धार्मिक आडम्बर और कर्मकाण्डों से निजात दिलवाकर सम्मानजनक जीवन प्रदान किया। उन्होंने शोषित-पीड़ित इन्सानों को गले लगाया और यही वजह थी कि लाखों भारतीय उनके मिशन से जुड़ गए। ख्वाजा साहब ने अपने मिशन को कामयाब करने के लिए कभी भी किसी भी किस्म का हिंसक रास्ता इख़्तियार नहीं किया।
उन्होंने अमन व भाईचारे वाले इस्लाम के असली पैगाम को फैलाकर लोगों का दिल जीता। ख्वाजा साहब जब अजमेर आए थे तो यहां मशहूर और प्रतापी शासक पृथ्वीराज चौहान का शासन था। ख्वाजा साहब ने उनसे किसी किस्म की अपनी तरफ से कोई जंग नहीं की। पृथ्वीराज चौहान ने ख्वाजा साहब की रूहानी ताकत और मिशन के आगे एक तरह से अपने आपको सरेन्डर कर दिया था। उन्होंने ख्वाजा साहब के सम्मान में अजमेर खाली कर दिया और दिल्ली में अपनी शासन व्यवस्था कायम कर ली। इस वाकिये से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि इन्सानियत के मसीहा ख्वाजा साहब का मिशन और पवित्र जीवन कितना महान था कि बड़े से बड़े राजा ने भी उन्हें अपना रूहानी पेशवा मान लिया था।
इसीलिए आज पूरी दुनिया ख्वाजा साहब को सुल्तानुल हिन्द यानी हिन्दुस्तान का सुलतान (भारतीय उप महाद्वीप का सुलतान) कहती है। जो लोग कहते हैं कि इस्लाम तलवार के जोर पर फैला है, उनसे मेरी दरखास्त है कि वो ख्वाजा साहब जैसे सूफी सन्तों का जीवन पढ़ें, तो पता चलेगा कि इस्लाम मुस्लिम बादशाहों और शासनकर्ताओं के जरिए नहीं बल्कि ख्वाजा साहब जैसे महान सूफी सन्तों (बुजुर्गान ए दीन) की इन्सानी खिदमत व रूहानी जिन्दगी से फैला है। यही वजह है कि आज लोग मुस्लिम बादशाहों की कब्र पर इतनी तादाद में नहीं जाते हैं, जितनी तादाद में ख्वाजा साहब की चौखट पर आते हैं।

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