कबीर की तरह जिए फकीरी अंदाज के साथी शरद यादव


कबीर की तरह जिए फकीरी अंदाज के साथी शरद यादव

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अर्जुन देथा


इस वक्त साथी शरद यादव का जाना देश के लिए बहुत बड़ी क्षति है। आज जहां देश में विपक्षी एकता की और जन पक्षीय मुहिम की सबसे ज्यादा जरूरत है साथी शरद यादव बड़ी भूमिका निभा सकते थे। देश के सभी विपक्षी दलों में उनके अच्छे रिश्ते और व्यावहारिक राजनीतिक संबंध थे।


मेरा उनके साथ संबंध लगभग 50 बरस का होने आ गया, आधी जिंदगी तक घनिष्ठ राजनीतिक साथी की तरह संबंध रहा। एक समय ऐसा भी था कि कुछ वर्षों के लिए वे जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और मैं राजस्थान प्रदेश का अध्यक्ष था। रिश्ता इतना लंबा है कि मेरे सामने इस समय यह चुनौती है कि क्या लिखूं और क्या नहीं लिखूं। बहुत सारी  यात्राओं में और चुनावी सभाओं में, पार्टी सम्मेलनों में और कार्यकर्ता शिविरों में मैं उनके साथ रहा। उनकी सबसे बड़ी खूबी थी एकदम सादगी पूर्ण रहते थे। सटीक मुद्दे की बात करना और कभी कभी कड़वा बोल जाना भी उनकी खासियत थी। उनके छात्र जीवन के संघर्षों के कई किस्से वे फुर्सत के क्षणों में सुनाया करते थे। उनके दोनों पैर पुलिस की पिटाई से काफी चोट ग्रस्त थे और उनमें प्राय दर्द रहता था।

उनसे मेरी पहली मुलाकात 1975 में दिल्ली में हुई। तब एक रैली में गए हुए थे और फिर मुझे एक-दो दिन दिल्ली में रुकना पड़ा। वे बहुत कम उम्र में ही 1974 में जबलपुर का लोकसभा उपचुनाव जीत कर आए थे। कांग्रेस के दिग्गज नेता सेठ गोविंद दास के निधन के कारण उपचुनाव हुआ था। 1971 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की भारी जीत और बाद में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत की विजय के परिणाम स्वरूप बांग्लादेश के निर्माण के आलोक में इंदिरा गांधी का जलवा चरम पर था।

जबलपुर में सेठ गोविंद दास के परिवार का जबरदस्त प्रभुत्व था कोई उनके खिलाफ चुनाव लड़ने को तैयार नहीं था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण सर्वोदय आंदोलन से मोह भंग के बाद पुनः राजनीतिक आंदोलनों के जरिए सक्रिय हुए थे, 1971 में कांग्रेस के खिलाफ बना चौ गुटा (सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ, संगठन कांग्रेस, बी एल डी स्वतंत्र पार्टी) लोकसभा चुनावों में पराजय के बाद भी साथ थे और सभी लोग जयप्रकाश जी को मार्गदर्शक के रुप में स्वीकार करते थे। जयप्रकाश जी ने जबलपुर लोकसभा उपचुनाव लड़ने के लिए सबको प्रेरित किया, लेकिन कोई भी सेठ गोविंद दास के परिवार के खिलाफ लड़ने को तैयार नहीं था।

एक लड़ाकू संघर्षशील छात्र नेता के रूप में शरद जी के काफी चर्चे थे और वे उस समय जेल में बंद थे। जयप्रकाश नारायण जी ने चुनाव लड़ने के लिए उनके पास संदेश भिजवाया, उन दिनों कोई संसाधनों का प्रबंध ना होने और जेल में बंद होने के कारण उन्होंने इनकार कर दिया। बाद में जयप्रकाश नारायण जी ने दादा धर्माधिकारी को उनके पास भेजा कि वह चुनाव जरूर लड़े, फिर भी शरद यादव जी तैयार नहीं हो रहे थे।

उनके विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को वे काफी सम्मान देते थे। खुद शरद यादव जी बताते थे कि दादा धर्माधिकारी ने उन प्रोफेसर को बुलाकर कहा कि इस लड़के को चुनाव के लिए तैयार करो। वह प्रोफ़ेसर शरद यादव जी से जेल में जाकर मिले, उनसे भी शरद जी ने कहा कि मेरे पास जमानत के पैसे जमा कराने को नहीं हैं तो चुनाव कैसे लड़ पाऊंगा और बहुत किरकिरी हो जाएगी। प्रोफ़ेसर ने उनसे कहा कि तू तो निपट फकीर आदमी है तेरी क्या किरकिरी हो जाएगी ? चुनाव हम लड़ाएंगे जमानत सहित खर्चे का बंदोबस्त भी हम करेंगे, तुम तो नॉमिनेशन पर साइन करो और उन्होंने नॉमिनेशन पर शरद यादव जी के हस्ताक्षर करवा लिए। इस प्रकार उन्हें उम्मीदवार बनाया गया।

यह उपचुनाव उनके साथियों ने प्रबंधित किया और जीता भी। उस समय शरद यादव संसद में सबसे कम उम्र के सदस्य के रूप में प्रविष्ट हुए। 1977 का लोकसभा आम चुनाव भी वे जबलपुर से जीते। 1980 से 86 किसी सदन के सदस्य नहीं थे लेकिन लगातार जन आंदोलनों में सक्रिय थे खास तौर पर मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करवाने में उनकी अग्रणी भूमिका थी। मंडल आंदोलन के पक्ष में उनकी मुहिम और प्रयास कभी भुलाया नहीं जा सकते।

वीपी सिंह जी के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार द्वारा ओबीसी आरक्षण लागू कर दिए जाने के बाद देशभर में फैलाए गए और चलाए गए मंडल विरोधी आंदोलन के दिनों में भी वह मंडल के पक्ष में देश भर की यात्रा पर निकले। उनकी यात्रा और सभाओं पर कई जगह पर आरक्षण विरोधी लोगों ने हमले किए लेकिन शरद यादव विचलित नहीं हुए, बल्कि लगातार सक्रिय होते गए। शरद यादव जी किसानों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के अधिकारों के लिए लगातार संघर्षशील रहे।

कई बार दिल्ली प्रवास के दौरान मुझे शाम को घर का खाना खाने के लिए बुला लेते थे, तब कई प्रकार की चर्चाएं हुआ करती थीं और बहुत अनौपचारिक तरीके से अपने सारे अनुभवों को बताया करते थे। उनके घर में खानपान एकदम सादगी पूर्ण होता था, अधिकतम दो सब्जी मूंग की दाल और कढ़ी वे आमतौर पर बनवाया करते थे। रेखा जी के साथ उनका विवाह बहुत सादगी पूर्ण तरीके से हुआ था। साथी रघु ठाकुर जी और केसी त्यागी जी वगैरह ने बहुत थोड़े से लोगों का सह भोज दिल्ली में आयोजित किया था।

आज बिहार की महा गठबंधन सरकार जाति आधारित जनगणना करवा रही है, शरद यादव जी इसके मुख्य पैरोकार थे उन्होंने संसद में जाति आधारित जनगणना करवाने के लिए लगातार मांग उठाई और सरकार पर दबाव भी बनाया यूपीए सरकार के समय मनमोहन सिंह जी और प्रणब मुखर्जी जी को इसके लिए सहमत भी कर लिया था, लेकिन 2011 की जनगणना करवाते समय प्रोफॉर्मा में जाति का कॉलम जोड़ने को लेकर विवाद हुआ और ग्रह मंत्री के नाते चिदंबरम ने वीटो करके यह होने नहीं दिया।

बाद में सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण कराने पर सहमति बनी और उस गणना के आंकड़े भी बाद में सार्वजनिक नहीं किए गए। उस घटना के बाद भारतीय जनता पार्टी केंद्र की सत्ता पर काबिज हो गई और लगातार संवैधानिक आरक्षण को निष्प्रभावी बनाने के प्रयास तेज हो गए और अब आरक्षण को भीतर ही भीतर खत्म करने की साजिश बन चुकी है। भारत सरकार यूपीएससी को दरकिनार करके अनरिजर्व्ड नाम की कैटेगरी बनाकर सीधे तौर पर जॉइंट सेक्रेटरी के पद पर आईएएस की नियुक्तियां कर रही है और दूसरी तरफ तेज गति से सभी सरकारी उपक्रमों को बेचकर आरक्षण की संभावनाएं समाप्त कर रही है। ऐसे समय में शरद यादव जैसे सामाजिक न्याय के योद्धा का असामयिक निधन देश की और खास तौर पर वंचित समुदायों की बहुत बड़ी क्षति हुई है।

शरद यादव जी स्पष्ट और कभी कभी कठोर शब्दों में बात कह देने के अभ्यस्त थे। हौसला इतना मजबूत था कि बड़ी सी बड़ी ताकत से टकराने में कभी हिचके नहीं। साफगोई और सच्चाई का यह आलम था कि हवाला कांड सामने आने पर खुद ने चला कर कहा की 300000 रुपए मुझे भी मिले थे, उन्होंने अपने पदों से इस्तीफा देकर खुलासा कर दिया कि गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल के साथ एक जैन नाम का व्यक्ति मेरे पास आया और 300000 रूपए दिए। मैंने यह बात अपनी डायरी में दर्ज कर ली और उसी दिन जिन तीन उम्मीदवारों को प्रत्येक को एक एक लाख रुपए भिजवा दिए और अपनी डायरी में इसका भी इंद्राज कर दिया। उन्होंने यह डायरी अदालत में भी पेश कर दी। बाद में वे इस प्रकरण में बरी हो गए। लेकिन अपनी सच्चाई सिद्ध करने के लिए काफी समय तक बिना पद के रहे।

जीवन के थोड़े से समय को छोड़कर वे लगातार संसद सदस्य रहे और मंत्री पदों पर भी रहे लेकिन उन्होंने कोई निजी संपत्ति एकत्र नहीं की। शरद यादव जी अपने जीवन में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, मधु लिमए और चौधरी चरण सिंह से प्रभावित रहे। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने 1971 में चुनी गई लोकसभा का कार्यकाल 1 वर्ष बढाकर 6 वर्ष का कर दिया, मधु लिमए उस समय मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जेल में बंद थे। उन्होंने बढ़ाई गई संसद की अवधि को लोकतंत्र के लिए कलंक बताया और संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। मधु लिमए जी ने सभी विपक्षी सांसदों का आह्वान किया कि वह अपने अपने लोकसभा सदस्यता से त्यागपत्र दें, लेकिन उनका अनुसरण करने वाले शरद यादव अकेले लोकसभा सदस्य थे।

कबीर का एक पद प्राय दोहराया करते थे जो कि इस प्रकार था--कबीरा हम पैदा भए जग हंसे हम रोए, ऐसी करनी कर चलो हम हंसे जग रोए। उन्होंने इन्ही पंक्तियों का अनुसरण करते हुए अपना जीवन व्यतीत किया और इस दुनिया से चले गए। शरद यादव कभी नहीं भुलाए जा सकते। फकीरी जीवन जीने वाले और कबीरी आचरण वाले शरद यादव को क्रांतिकारी सलाम।

उनसे मेरा आखिरी मिलना कभी नहीं भूल पाऊंगा। सी ए ए, एन आर सी विरोधी जयपुर की रैली में मंच पर ही मिले, वह बात करना चाहते थे लेकिन मंच पर केवल दुआ सलाम हुई उसके तुरंत बाद उन्हें कहीं अन्य कार्यक्रम में जाना था। मैं भाषण देकर जब अपनी सीट पर जा रहा था, उन्होंने हाथ से ही इशारा कर कहा मिलना, लेकिन अफसोस वह मुलाकात कभी नहीं हुई। 1999 में जब से वे एनडीए का हिस्सा बने तब से हमारे राजनीतिक रास्ते अलग हो गए थे और मिलना भी कम हुआ लेकिन आखरी मिलना उनके और मेरे चाहने के बावजूद अधूरा ही रहा।
(लेखक जनता दल सेक्युलर के राजस्थान प्रदेशाध्यक्ष और डॉक्टर राममनोहर लोहिया विचार संस्थान के अध्यक्ष हैं)
(24/01/2023)
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