हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के खानदान का एक अज़ीम मसीहा, "इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम"

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के खानदान का एक अज़ीम मसीहा, "इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम"

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एक अज़ीम शख्सियत के धनी : मशहूर साइंटिस्ट, दार्शनिक और सूफी संत
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम दुनिया की एक अज़ीम शख्सियत का नाम है। खुदा के आखरी पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और उनके पहले खलीफा हज़रत अबू बकर रजिअल्लाहु अन्हु की औलाद में से हैं। वे पहले इमाम मौला अली अलैहिस्सलाम और खातून ए जन्नत बीबी फातमा के पोते इमाम जैनुल आबिद्दीन अलैहिस्सलाम के पोते हैं। वे सय्यदुश्शौहदा ए करबला इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पड़पोते हैं। उनके दादा और चौथे इमाम हज़रत जैनुल आबिद्दीन अलैहिस्सलाम ने करबला की जंग को अपनी आंखों से देखा था, जहाँ जालिमों ने उनके पूरे खानदान को तपते करबला के मैदान में शहीद कर दिया था। इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम के वालिद इमाम मुहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम हैं, जो पांचवें इमाम हैं।


इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम दुनिया के मशहूर साइंटिस्ट, दार्शनिक (फिलॉस्फर), चिन्तक (मुफक्किर/थिंकर), उस्ताद और सूफी संत (वली) थे। उनके शागिर्दों में बड़ी बड़ी इल्मी हस्तियां थी, जिन्होंने उनकी जूतियां सीधी करके इल्म हासिल किया था। उनका जन्म 17 रबीउल अव्वल 83 हिजरी (20 अप्रैल 702 ईस्वी) को जुमेरात (गुरूवार) के दिन मदीना शरीफ़ (सऊदी अरब) में हुआ था। उनका 15 शव्वाल 148 हिजरी (18 दिसम्बर 765 ईस्वी) को विसाल (इन्तकाल) हुआ था। उन्हें मदीना शरीफ़ के कब्रिस्तान जन्नतुल बकी में दफन किया गया। उनके वालिद इमाम मुहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम एक महान वैज्ञानिक, टीचर और सूफी संत थे, वे मदीना शरीफ़ में पढ़ाया करते थे। इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम की माँ का नाम बीबी उम्मे फरवा बिन्ते अल कासिम था। उनके वालिद इमाम मुहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम पहले इमाम और चौथे खलीफा मौला अली अलैहिस्सलाम के पड़पोते थे और उनकी वालदा बीबी उम्मे फरवा बिन्ते अल कासिम पहले खलीफा हज़रत अबू बकर रजिअल्लाहु अन्हु की पड़पोती थी।


इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम अपने तालीमी इदारे (शिक्षण संस्थान/मदरसे) में हर उलूम (सभी विषयों) की तालीम देते थे। कुरआन, हदीस, फिकह (धर्म शास्त्र), मैथ्स, फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलोजी, जियोलोजी, ज्योग्राफी, एस्ट्रोनाॅमी आदि की तालीम वे अपने शागिर्दों को देते थे। वे अपने इदारे में मेडिकल साइंस की तालीम भी देते थे। दूर दूर से विद्यार्थी उनके शिक्षण संस्थान में शिक्षा लेने के लिए आते थे। उनके हजारों शागिर्द थे, बताया जाता है कि उनमें से करीब 400 बहुत ही मशहूर शागिर्द हुए हैं, जिन्होंने विभिन्न प्रकार का इल्म उनसे सीखा था तथा उन्होंने उस इल्म को दुनिया में फैलाया। बताया जाता है कि इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम के यह 400 शागिर्द ऐसा नहीं करते, तो आज दुनिया ऐसी नहीं होती, यानी विभिन्न क्षेत्रों में तरक्की से बहुत दूर होती।


इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम के मशहूर शागिर्दों (शिष्यों) की सूची में हज़रत इमाम अबू हनीफा रहमतुल्लाह अलैह भी शामिल हैं, जो अहले सुन्नत (सुन्नी मुसलमानों) के मशहूर आलीम हैं। इन्होंने कुरआन, हदीस, सूफीज्म, फिकह, मैथ्स, फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलोजी, जियोलोजी, ज्योग्राफी, एस्ट्रोनाॅमी आदि की तालीम इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम से सीखी थी। इसी तरह हज़रत मालिक इब्ने अनस रहमतुल्लाह अलैह, इमाम शाफई रहमतुल्लाह अलैह, इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैह, उमर बिन दीनार, हसन बिन सालेह, उमर बिन अब्दुल अजीज, हज़रत बायजीद बस्तामी आदि भी इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम के स्टूडेंट रहे हैं। वे जाबिर इब्ने हय्यान (गेबर) के भी गुरू रहे हैं, जिन्हें इतिहास आधुनिक केमेस्ट्री का पिता (फादर ऑफ केमेस्ट्री) कहता है।


इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने इदारे में पढ़ाते हुए साइंस की बहुत सी शाखाओं की बुनियाद रखी थी। उन्होंने अपने शागिर्दों को साइंस से सम्बन्धित जो बातें सिखाई उनमें बहुत सी ऐसी थी, जो इससे पहले किसी ने भी नहीं सिखाई थी। उन्‍होंने अपने एक शागिर्द को बताया कि "जो पत्थर तुम सामने गतिहीन देख रहे हो, उसके अन्दर बहुत तेज़ गतियां हो रही हैं।" उसके बाद कहा कि "यह पत्थर बहुत पहले द्रव अवस्था (पिघला हुआ) में था। आज भी अगर इस पत्थर को बहुत अधिक गर्म किया जाए तो यह वापस द्रव अवस्था में आ जाएगा।"

इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम ने महान विद्वान व दार्शनिक अरस्तू की चार मूल तत्वों की थ्योरी से इनकार किया तथा कहा कि "मुझे आश्चर्य है कि अरस्तू ने कहा कि विश्व में केवल चार तत्व हैं, मिट्टी, पानी, आग और हवा। मिट्टी स्वयं तत्व नहीं है बल्कि इसमें बहुत सारे तत्व हैं।" इसी तरह उन्होंने पानी, आग और हवा को भी तत्व नहीं माना। हवा को भी तत्वों का मिश्रण माना और बताया कि "इनमें से हर तत्व सांस के लिए ज़रूरी है। मेडिकल साइंस में उन्होंने बताया कि मिट्टी में पाए जाने वाले सभी तत्व मानव शरीर में भी होते हैं। इनमें चार तत्व अधिक मात्रा में, आठ कम मात्रा में और आठ अन्य सूक्ष्म मात्रा में होते हैं।"

ऑप्टिक्स का बुनियादी सिद्धांत है कि प्रकाश जब किसी वस्तु से परिवर्तित होकर आँख तक पहुँचता है, तो वह वस्तु दिखाई देती है। यह थ्योरी इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम की ही बताई हुई है। एक बार अपने लेक्चर में उन्होंने बताया कि "शक्तिशाली प्रकाश भारी वस्तुओं को भी हिला सकता है।" लेजर किरणों के आविष्कार के बाद इस कथन की पुष्टि हुई। इनका एक अन्य चमत्कारिक सिद्धांत है कि हर पदार्थ का एक विपरीत पदार्थ भी ब्रह्माण्ड में मौजूद है। यह आज के मैटर-एंटी मैटर थ्योरी की झलक थी। एक थ्योरी उन्होंने यह भी बताई कि "पृथ्वी अपने अक्ष के परित (चारों ओर) चक्कर लगाती है।" जिसकी पुष्टि बीसवीं शताब्दी में हो पाई। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि "ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्थिर नहीं है। सब कुछ गतिमान है।" ब्रह्माण्ड के बारे में एक रोचक थ्योरी इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम ने यह भी बताई कि "ब्रह्माण्ड हमेशा एक जैसी अवस्था में नहीं होता है। एक समयांतराल में यह फैलता है और दूसरे समयांतराल में यह सिकुड़ता है।"

इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम के पास खुदाई इल्म था, वे इल्म का खज़ाना थे। उन्होंने यह इल्म अपने दादा इमाम जैनुल आबिद्दीन अलैहिस्सलाम और अपने वालिद इमाम मुहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम से हासिल किया था। उनसे खुदा ने कई करामात (चमत्कार) भी ज़ाहिर करवाई। वे जरूरतमंद की मदद करते, भूखों को खाना खिलाते और बिना किसी भेदभाव के हर विद्यार्थी को शिक्षा देते थे। उनके इस व्यवहार व विद्वता से दूर दूर से लोग उनके पास आते थे। उनकी लोकप्रियता दूसरे मुल्कों तक फैल गई थी। उनकी इस लोकप्रियता से वहाँ के शासक मंसूर के दिल में डर बैठ गया कि कहीं इनकी लोकप्रियता से मेरा राज नहीं चला जाए। इस डर से उसने इल्म के खज़ाने, महान दार्शनिक और इस सूफी संत इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम को ज़हर देकर शहीद कर दिया।

ख़ास बात यह भी है कि उनके द्वारा बताई और सिखाई गई साइंस की बातों पर आज का आधुनिक विज्ञान भी मुहर लगा रहा है। जो बातें उन्होंने आठवीं सदी ईस्वी में बताई थी, उनको विभिन्न साइंटिस्ट ने पिछली दो सदियों में अपनी रिसर्च से साबित भी कर दिया है। एक खास बात और है कि मजहब ए इस्लाम के जितने भी फिरके हैं, सुन्नी, शिया, सूफी, बरेलवी, देवबन्दी, वहाबी, अहले हदीस वगैरह इन सभी के आलिमों की कड़ियां इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम से जुड़ती हैं तथा यह सभी फिरके उनका एहतराम करते हैं। यानी इन फिरकों में इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम को लेकर कोई विरोधाभास नहीं है।

हिजरी कैलेंडर की 22 रज्जबुल मुरज्जब को हर साल खासतौर पर इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम को याद किया जाता है। इस दिन खीर, पूड़ी, टिकिया, हलवा वगैरह बनाकर उनकी नियाज/फातिहा लगवाई जाती है। हालांकि यह तारीख़ न उनकी पैदाइश की है और ना ही शहादत की। लेकिन फिर भी सदियों से यह मनाई जाती है, इस तारीख़ को बोलचाल की भाषा में "कूण्डे" भी कहा जाता है। यह एक रिवायत है और इस रिवायत के पीछे दो बातें सुनने को मिलती हैं, एक इस तारीख़ को उनके जरिए खुदा ने एक चमत्कार दिखाया था और दूसरी कि इस तारीख़ को इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने अज़ीम तालीमी इदारे की बुनियाद रखी थी। बहरहाल बहस इस बात की नहीं है कि यह दिन क्यों मनाया जाता है ? बल्कि बात यह है कि इस दिन उनको मानने वाले उन्हें खासतौर पर याद करते हैं और यह सदियों से चली आ रही एक रिवायत है और जो क़ौम अपनी जायज़ रिवायतों और पुरखों को छोड़ देती है वो कटी पतंग बन जाती है।

मुसलमानों के बारे में एक बात आम है कि वे पढते लिखते नहीं या दूसरी कौमों के मुकाबले पढाई में बहुत पीछे हैं। साइंस, टेक्नोलॉज़ी और विद्वता से वे कोसों दूर हैं। याद रखिए बेहतर तालीम वही हासिल कर सकता है, जो अपने गुरू, किताब व कलम वगैरह की कद्र करे। लेकिन इतिहास में यह वाकिये भरे पड़े हैं कि मुसलमानों ने अपने ही हाथों से अपने बीच पैदा हुए बड़े बड़े साइंटिस्ट, दार्शनिक, बुद्धिजीवियों और गुरूओं का बेदर्दी से क़त्ल किया है। इतिहास के इस दर्दनाक अध्याय में दुनिया के महान साइंटिस्ट, दार्शनिक और गुरू इमाम जाफ़र अल सादिक़ अलैहिस्सलाम का ज़हर देकर क़त्ल किया जाना भी शामिल है। इस महान हस्ती के साथ आज सबसे बड़ा अन्याय यह भी हो रहा है कि उनके इल्म से दुनिया में साइंस व टेक्नोलॉज़ी की रोशनी आई, लेकिन उन्हें याद करने की बजाए मुसलमानों की एक बड़ी तादाद पूरी ताक़त इस बात में लगाती है कि "कूण्डे" मनाना जायज़ हैं या नाजायज़ ? ऐसी बातें सोशल मीडिया पर पढ़कर बहुत तकलीफ़ होती है, जिन लोगों ने पूरी दुनिया को रोशन रास्ता दिखाया, उनके बारे में उनकी नई पीढ़ी किस बहस में उलझी हुई है ? एक मशहूर शेअर के साथ इस लेख को खत्म कर रहा हूँ।

"ख़ुदा ने आज तक उस क़ौम की हालत नहीं बदली।
न हो ख़याल जिसको अपनी हालत के बदलने का।।"

(22 रज्जबुल मुरज्जब 1444 हिजरी)
(14 फरवरी 2023 ईस्वी)

(लेखक एवं सम्पादक)
एम फ़ारूक़ ख़ान सम्पादक इक़रा पत्रिका जयपुर।
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