गहलोत सरकार की योजनाएं सराहनीय या आफत ?

गहलोत सरकार की योजनाएं सराहनीय या आफत ?

----------------------------------
राइट टू हैल्थ क़ानून और 19 न‌ए जिलों के सन्दर्भ में
**********************
जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने आपको गांधी का अनुयायी कहते हैं और उन्होंने अपने 15 साल के कार्यकाल में क‌ई जनहित की योजनाएं शुरू की हैं और इनके लिए क़ानून बनाए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सब जनता के हित में हैं, लेकिन इनका क्रियान्वयन जनता के लिए आफ़त बन जाता है, क्योंकि इन योजनाओं को पूरी तरह से राजनीतिक चश्मे से तैयार किया जाता है और फिर लागू करने में ढिलाई बरती जाती है।


ताज़ा मामले उनकी दो योजनाओं को लेकर हैं, जिनसे जनता पीड़ित है। पहला राइट टू हैल्थ क़ानून। कहा जा रहा है कि ऐसा कानून बनाने वाला राजस्थान देश का पहला राज्य है। इस क़ानून से मरीज़ को शीघ्रता से, आसानी से और निशुल्क इलाज किसी भी सरकारी और प्राइवेट हॉस्पिटल में मिलेगा। लेकिन इस कानून के विरोध में प्रदेश के सभी डॉक्टर्स हड़ताल पर चले गए हैं, मरीज़ दर दर की ठोकरें खाकर तड़प रहे हैं, बिना इलाज मरने को मजबूर हैं। लेकिन सरकार कोई सख्ती नहीं दिखा रही है। क्या सरकार यह सोच रही है कि जनता और चिकित्सा कर्मी आपस में लड़ मरें ? जनता मजबूर होकर कानून हाथ में ले ले और यह सोचे कि गहलोत की योजना तो सही है डॉक्टर ही खराब हैं, ताकि वोट पक्के हो जाएं ?

सरकार को हड़ताली डाक्टरों पर पहले दिन से ही सख्ती दिखानी चाहिए थी, जो डाॅक्टर इलाज नहीं कर रहे हैं उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी, प्राइवेट हॉस्पिटल संचालक हड़ताल करके मरीजों को मरने के लिए छोड़ रहे हैं, उनके अस्पतालों को दी गई रियायती भूमि वापस लेने की कार्रवाई शुरू करनी चाहिए थी। डॉक्टरों को भी यह सोचना चाहिए कि आपका पेशा कोई व्यापार नहीं है, सेवा का है। अगर आपका दिल और सोच सेवाभावी नहीं है तो क्यों आए इस प्रोफेशन में ? और भी बहुत काम धंधे है, उन क्षेत्रों में जाते और माल बनाते। आपको मालूम होना चाहिए कि एक इन्सान जितनी दुआएं डॉक्टर को देता है और जितनी तारीफ़ डॉक्टर की करता है उतनी किसी की नहीं करता है।

और डॉक्टर साहब सुनिए, सभी डॉक्टर भी एक जैसे नहीं हैं, बहुत से डॉक्टर सेवाभावी सोच के हैं दिन रात मरीजों की सेवा करते हैं, लेकिन बेचारे यूनियनबाजी के लपेटे में आए हुए हैं, आपके साथ हड़ताल पर जाने को मजबूर हैं। चर्चा तो यहां तक है कि आन्दोलन के संचालक पूरी तरह से राजनीतिक हो चुके हैं, क्योंकि छह महीने बाद चुनाव हैं। आपको यह भी सोचना चाहिए कि आपको डाॅक्टर बनाने के लिए सरकार का कितना पैसा खर्च हुआ है ? और यह पैसा जनता का दिया हुआ टैक्स है, जिससे आप डाॅक्टर बने हो। और डॉक्टर साहब आपको यह भी पता है कि हड़ताल की आड़ में मरीजों को लुटा भी जा रहा है, चोरी छुपे क‌ई गुणा महंगा इलाज किया जा रहा है।

दूसरा ताजा मामला न‌ए जिले बनाने का है। 17 मार्च को बजट बहस के जवाब में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक साथ 19 न‌ए जिले बनाने की घोषणा कर दी, ऐसा करने वाला भी राजस्थान पहला राज्य बन गया। जनहित की दृष्टि से यह कार्य बहुत ही सराहनीय है कि जनता को जिला मुख्यालय अब नजदीक मिलेगा। लेकिन यह घोषणा पूरी तरह से राजनीतिक है, किसी विधायक को खुश करने के लिए, किसी विधायक या नेता को नीचा दिखाने के लिए। इतने जिले एक साथ बनाए जाएंगे ऐसा तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। हां, छह सात जिले बनाने बहुत जरूरी थे और इनकी मांग भी बरसों से हो रही है।

कुछ जिले तो ऐसे बनाए हैं जिनकी मांग ही नहीं की गई थी और दूदू एक ऐसे कस्बे को जिला बना दिया, जो एक ग्राम पंचायत है। ऐसा भी शायद देश में पहली बार हुआ होगा ? सुजानगढ़, जसवंतगढ़ और लाडनूं (सुजला) क्षेत्र को जिला बनाने की मांग बरसों से चल रही है और इसे जिला बनाना जरूरी भी था, लेकिन नहीं बनाया गया, क्यों मुख्यमंत्री जी ? क्या इसलिए कि सुजला जिला बनाने से आपका सियासी गेम पूरा नहीं हो रहा था ? इसी तरह जयपुर और जोधपुर जिले ही खत्म कर दिए तथा दोनों शहरों के दो दो जिले बना दिए, शहरों को विभाजित कर जिले बनाने की यह मांग आज तक किसी ने नहीं की थी।

मुख्यमंत्री की इस घोषणा से प्रदेश में बवाल मचा हुआ है। बहुत से कस्बे अपने को जिला बनाने की मांग कर रहे हैं, दूसरे जिलों में शामिल नहीं करने की घोषणा कर रहे हैं। गहलोत सरकार की इस योजना का कांग्रेस के नेता, कार्यकर्ता और यहां तक कि मंत्री व विधायक भी विरोध कर रहे हैं। और ज्यों ही प्रदेश का बंटवारा मुकम्मल तौर पर 50 जिलों में होकर जनता के सामने आएगा, विरोध तेज होगा, लोग अपने इलाके को दूसरे जिले में देने का विरोध करेंगे। जिसके राजनीतिक नफे नुकसान होंगे तथा इसी राजनीतिक नफे नुकसान को मद्देनजर रखकर ही तो प्लान तैयार किया गया है।

मुख्यमंत्री ने जिलों के नाम पर जो सियासी खेल खेला है, इसका एक बड़ा प्रभाव प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों पर भी पड़ेगा। क्योंकि मुख्यमंत्री के इस फैसले ने एक झटके में प्रदेश का भूगोल पूरी तरह से बदल दिया है। प्रदेश के नदी-नाले, तालाब, बांध, किले-बावड़ी, सेंचुरी, अंतरराष्ट्रीय और अंतरराज्यीय सीमा ज्ञान आदि का जनरल नॉलेज अब पूरी तरह से बदल गया है। भूगोल का इतना बड़ा बदलाव विद्यार्थियों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं रहेगा।
(25/03/2023)
----------------------------------
➡️अगर आपको हमारा यह लेख/खबर पसंद आया हो, तो प्लीज इसे शेयर/फॉरवर्ड कीजिए और साथ ही हमारे अखबार की आर्थिक मदद भी कीजिए।
अकाउंट डिटेल्स:- इकरा पत्रिका
IKRA PATRIKA
IFSC:- PUNB 0613900
PNB, MUSLIM SR. SEC. SCHOOL, MOTI DUNGARI ROAD, JAIPUR.
-------------------------------------------
➡️इकरा पत्रिका को सहयोग राशि आप Paytm, Phone Pay और Google Pay से भी भेज सकते हैं। फोन नम्बर 9414361522 पर (अकाउंट Farooq Ali Khan)
--------------------------------------------
©️ Copyright :- इस सम्पूर्ण लेख/खबर को या इसके किसी पैराग्राफ़ को हुबहू या तोड़ मरोड़ कर प्रकाशित करना मना है। अलबत्ता आप चाहें तो लेखक और हमारे अखबार के नाम के साथ इस सम्पूर्ण लेख/खबर को सोशल मीडिया पर शेयर जरूर कर सकते हैं।
---------------------------------------------
-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।

©️ Copyright Thar News & Ikra Patrika.
All Rights Reserved.

Comments

Popular posts from this blog

झुंझुनूं में रीटा चौधरी को कांग्रेस जिलाध्यक्ष बनाने पर जबरदस्त रोष

चित्तौड़गढ़ अन्जुमन स्कूल में किया मुस्लिम शिक्षकों का सम्मान

कुरैशी समाज की नो दहेज, नो गार्डन, नो डिनर मुहिम के तहत सादगी से हुई शादी