जाट महाकुंभ के सन्दर्भ में... कमेरे वर्ग के लिए समाजवाद ही एकमात्र रास्ता है
जाट महाकुंभ के सन्दर्भ में...
पहला पिछड़ा वर्ग आयोग 1953 में गठित किया गया उसकी रिपोर्ट 1955 में आ गई, जिसे कांग्रेस की सरकार ने स्वीकार नहीं किया, हालांकि आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर समर्पित गांधीवादी थे। साठ के दशक में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने नारा दिया कि "संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ", तब देश का पिछड़ा वर्ग संगठित और आंदोलित हुआ तथा राष्ट्रीय फलक पर चर्चा का विषय बनी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने संसद के अंदर और संसद के बाहर पिछड़ों के संघर्ष में अपनी सारी ताकत झोंक दी थी।
इस मुद्दे का असर उस समय की सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस के भीतर भी एक उद्वेलन के रूप में सामने आने लगा। पिछड़ा वर्ग अपने साथ होने वाले अन्याय को पहचानने लगा। 1977 की जनता पार्टी के गठन के समय ही उस में विलीन होने वाली सोशलिस्ट पार्टी ने और भारतीय लोक दल ने पूर्व में यह शर्त रखी थी कि पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए एक आयोग का गठन किया जाएगा तथा उसकी रिपोर्ट के अनुसार आरक्षण दिया जाएगा। इसी पूर्व शर्त के दबाव के कारण उस सरकार को द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में गठन करना पड़ा।
मंडल आयोग की रिपोर्ट 1980 में आ गई थी, लेकिन तब तक पुनः केंद्र में कांग्रेस की सरकार बन गई थी, 10 वर्ष तक कांग्रेस की दो सरकारों (इन्दिरा गांधी सरकार और राजीव गांधी सरकार) ने पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को लागू नहीं होने दिया। 1988 में गठित जनता दल में समाजवादियों का और लोकदल का अच्छा बोलबाला था, इसलिए केन्द्र में सरकार बनने के बाद 1990 में केंद्रीय सेवाओं में पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण लागू किया गया। उसके विरुद्ध हुए खूनी आंदोलनों व अदालती अड़ंगों आदि का जिक्र करके में इस लेख को ज्यादा लंबा नहीं करना चाहता हूं, क्योंकि उसकी काफी कुछ जानकारियां अब नई पीढ़ी को भी हैं।
लगभग 2 वर्ष पहले राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने बिहार विधानसभा में जाति आधारित जनगणना कराने और आबादी के अनुपात में आरक्षण का प्रस्ताव रखा था। तब बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा के सहयोग से राज्य सरकार चल रही थी। बिहार विधानसभा में उस पर चर्चा के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव से आग्रह किया कि वह अपना प्रस्ताव वापस ले लें ताकि सरकार की तरफ से एक प्रस्ताव लाकर विधानसभा में पारित करके केंद्र को भेजा जाए। इस प्रकार सर्वसम्मति से इस बाबत विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया गया। इसके साथ ही एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल दिल्ली गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करके बिहार विधानसभा के सर्व सम्मत प्रस्ताव के अनुरूप देश में जाति आधारित जनगणना कराने का आग्रह किया, जिसको केंद्र की भाजपा सरकार ने इंकार कर दिया।
उस सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल की ओर से मीडिया से बात करते हुए तेजस्वी यादव ने दिल्ली में ही स्पष्ट कर दिया था कि अगर केंद्र सरकार इस प्रस्ताव को अस्वीकार भी करती है तो भी हम बिहार में जाति आधारित जनगणना कराएंगे और बाद में बिहार में जाति आधारित जनगणना का काम प्रारंभ कर दिया गया जो कि मई में समाप्त हो जाएगा। अब तो नीतीश कुमार स्वयं राष्ट्रीय जनता दल, वामदलों ,कांग्रेस इत्यादि के साझे वाले महागठबंधन में शामिल हो चुके हैं। मैंने जुलाई 2021 में ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को एक पत्र लिखकर आग्रह किया था कि बिहार की तर्ज पर राजस्थान विधानसभा भी जाति आधारित जनगणना कराने के पक्ष में प्रस्ताव पारित करके केंद्र को भेजे।
12 अक्टूबर 2021 को जयपुर के कुमार आनंद भवन में हमने एक सम्मेलन आयोजित कर के प्रस्ताव पारित किया और पुनः समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल, जनता दल सेक्युलर, सीपीआई और सीपीआईएमएल इन 5 दलों की ओर से मुख्यमंत्री से आग्रह किया गया। सीपीआईएम अपनी राज्यस्तरीय मीटिंग होने के कारण उस संयुक्त सम्मेलन में उपस्थित नहीं हो पाई, लेकिन बाद में उन्होंने राजस्थान लोकतांत्रिक मोर्चे में शरीक दलों के साथ मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ाया तथा हम लोगों ने उदयपुर संभाग की विभिन्न तहसीलों-जिलो में धरने प्रदर्शनों का आयोजन करके और जून 2022 में उदयपुर में हजारों लोगों के जुलूस एवं सभा के बाद वहां के संभागीय आयुक्त के जरिए पुनः मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को ज्ञापन प्रेषित किए। लेकिन केंद्र और राज्य सरकार दोनों ने इसको कोई तवज्जो नहीं दी।
जाति आधारित जनगणना कराने के पक्षधर सभी लोगों को केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की गहलोत सरकार से यह जानने का अधिकार है कि यह दोनों सरकारें इस मुद्दे पर लगातार उपेक्षा की नजर से व्यवहार क्यों कर रही हैं ? यह सवाल जाट महाकुंभ में उपस्थित भाजपा और कांग्रेस के नेताओं से अवश्य पूछा जाना चाहिए था और उनसे जवाब लेना चाहिए था कि आपका इस बाबत उपेक्षा पूर्ण नजरिया क्यों है ? भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया से यह भी पूछा जाना चाहिए था कि केंद्र सरकार यूपीएससी की अवहेलना करके जॉइंट सेक्रेटरी पद के आईएएस बिना लिखित परीक्षा के, बिना आरक्षण देते हुए, लगभग 400 पद चोर दरवाजे से क्यों भर्ती किए ? आरक्षण की हत्या के लिए जिम्मेदार केंद्र सरकार कोई कोई जवाब क्यों नहीं दे रही है ? रेल संचालन, हवाई अड्डे, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, रक्षा उत्पादन संस्थानों इत्यादि महत्वपूर्ण जगह जहां दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को आरक्षण के जरिए कुछ पद मिलते हैं, उन सभी का भाजपा की केंद्र सरकार निजीकरण क्यों कर रही है ? जब सरकारी संस्थाएं ही नहीं रहेंगी तो आरक्षण तो अपने आप ही खत्म हो जाएगा। जाट महाकुंभ में शरीक हुए कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से भी यह सवाल पूछा जाना चाहिए था कि गहलोत सरकार जाति आधारित जनगणना कराने और आबादी के अनुपात में आरक्षण बढ़ाने को लेकर खामोश क्यों है ?
जाट महाकुंभ में जाट समाज से मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग भी की गई। देश में संविधान का राज है, लोकतंत्र ने सभी बालिग नागरिकों को मताधिकार का हक दिया है। साथ ही चुनाव लड़ने का भी अधिकार दिया है, इसलिए कोई भी व्यक्ति या समाज किसी भी पद के लिए दावेदारी करता है तो यह उचित ही है, इसमें किसी को कतई एतराज नहीं होना चाहिए। लेकिन जाट समाज सहित इस देश के संपूर्ण कमेरे वर्ग को यह समझ लेना चाहिए कि उनको सत्ता के शिखर पर पहुंचाने का रास्ता भी इस देश में हरे और लाल झंडे वाले समाजवादियों और वामपंथियों के जरिए ही हासिल किया जा सकता है।
याद कीजिए आजादी के बाद में और संविधान लागू होने के बाद में इस देश के किसान वर्ग में से पहले चौधरी चरण सिंह जी और बाद में एचडी देवेगौड़ा जी को प्रधानमंत्री बनाया गया, यह काम समाजवादियों और वामदलों के द्वारा किया गया था। यह भी याद करना जरूरी है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी ने उस समय क्या किया था ? दोनों मौकों पर भारतीय जनता पार्टी खिलाफ थी और कांग्रेस ने समर्थन देकर सदन में समर्थन देने से मुकर जाने का काम किया था। 1979 में चौधरी चरण सिंह जी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने वाले मधुलिमये और राजनारायण दोनों नेता समाजवादी ही थे। तब जनता पार्टी के भीतर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरुद्ध दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाने वाले यही दोनों समाजवादी नेता थे। उस समय समाजवादियों और वामदलों ने चौधरी चरण सिंह का साथ दिया था, जबकि जनसंघ ने मोरारजी देसाई का साथ दिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी ने चौधरी चरण सिंह जी को समर्थन का वादा किया था, लेकिन लोकसभा में बहुमत सिद्ध करने के पहले ही कांग्रेस अपने वादे से मुकर गई और समर्थन वापस ले लिया था, परिणाम स्वरूप चौधरी चरण सिंह जी की सरकार गिर गई थी।
इससे पूर्व 1967 में 17 विधायकों के साथ चौधरी चरण सिंह जी ने जब कांग्रेस को अलविदा कह कर छोड़ दिया तो डॉक्टर राम मनोहर लोहिया जी उनका स्वागत करने वाले पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने सोशलिस्ट पार्टी व अन्य गैर कांग्रेसी दलों को साथ लेकर उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े राज्य का चरण सिंह जी को मुख्यमंत्री बनवाया। यह जानकारी रखना भी आवश्यक है कि कमेरे वर्ग को सत्ता के उच्च पदों पर बैठाने वाले समाजवादी ही थे, जिन्होंने हरियाणा में चौधरी देवीलाल जी को, बिहार कर्पूरी ठाकुर जी को, उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव जी को, कर्नाटक में एचडी देवेगौड़ा जी और जेएच पटेल जी को, यूपी में मुलायम सिंह जी यादव को, बिहार में लालू प्रसाद जी यादव इत्यादि को मुख्यमंत्री बनवाया, यह उसी समाजवादी आंदोलन की देन है कि यह लोग अपने राज्यों के मुख्यमंत्री बने। राजनीतिक पाठकों को 1982 की वह घटना भी याद करनी चाहिए, जब हरियाणा के राज्यपाल जीडी तपास्य ने बहुमत के आधार पर चौधरी देवीलाल को मुख्यमंत्री बनाने का न्यौता दिया, लेकिन कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के इशारे पर उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं दिलवाई और दल बदल के सहारे कांग्रेस की सरकार बनवा दी।
1996 में एचडी देवेगौड़ा जी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पहले कांग्रेस ने समर्थन दिया, उन्हें प्रधानमंत्री बनवा दिया और 9 महीने बाद ही उनको हटवा भी दिया। यह काम भी कांग्रेस ने ही किया था। एचडी देवगौड़ा जी कांग्रेस के समर्थन वापसी के बाद इस्तीफा देने जा ही रहे थे, लेकिन वामपंथी साथी दलों ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि हमें लोकसभा में अपनी बात रखनी चाहिए और पराजित होने पर इस्तीफा देना चाहिए। देवेगौड़ा जी ने यह बात स्वीकार की और लोकसभा में डिबेट के बाद वह सरकार गिर गई थी।
असल में इस देश में पिछड़ों के अधिकार की लड़ाई 1960 के दशक में डॉक्टर लोहिया के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी ने लड़ी थी। उन्होंने ही गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया और इस पर संघर्ष खड़ा किया, 1967 के लोकसभा चुनाव में बिन विचार के दलों को भी सहमति के आधार पर कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए तैयार किया। उन्होंने साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर मिलकर काम करने के लिए भी विपक्ष को तैयार किया था। 1967 के आम चुनाव में देश के नौ बड़े राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था। लोकसभा में भी कांग्रेस बहुत मामूली बढ़त के साथ सत्ता में रह पाई थी।

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