मुसलमानों के मौजूदा हालात के लिए सबसे ज्यादा मुस्लिम लीडरशिप जिम्मेदार
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चौधरी अकबर क़ासमी
जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। मुस्लिम लीडरशिप की सबसे ज़्यादा क़ाबिल ए तारीफ़ बात यह है कि उसको राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों के लिए कभी लड़ते हुए नहीं देखा गया है, क्योंकि जन आंदोलन से जन क्रान्ति पैदा होती है और जन क्रान्ति से आवाज़ों में गूंज पैदा होती है, गली गली शोर उठता है, जिस से नींदों में ख़लल पड़ता है और मुसलमानों को जन क्रांति की इसलिए भी ज़रूरत नहीं है कि यह दुआ वाली क़ौम है, यह क़ौम जब हाथ उठाती है तो इंसानों की तक़दीर तो क्या ज़मीन व आसमां के फ़ैसले भी तब्दील हो जाते हैं और फिर मज़लूमों का साथी ख़ुदा होता है जो ज़ालिमों को हलाक कर देता है।
मुस्लिम लीडरशिप का पिछले 75 वर्षों से बड़ा अलमिया यह भी रहा है कि वह क़ौम को यह बताने में रूचि नहीं रखते कि यह क़ौम मज़लूम है या ग़ाफ़िल ? क्योंकि अगर क़ौम को ग़ाफ़िल कहा जाए तो फिर कई सवाल खड़े हो जाते हैं, जो ख़ुद मुस्लिम लीडरशिप पर भारी पड़ जाते हैं, जिनमें से एक सवाल यह भी है कि ग़ाफ़िल क़ौमों की उस वक्त तक ख़ुदा मदद नहीं करता है जब तक वे अपने आप में तब्दीली लाने के लिए तैयार ना हों और यह क़ुरआन शरीफ़ का फ़ैसला है।
मौजूदा दौर की जिन बेशुमार समस्याओं के लिए हमारी लीडरशिप को जलसों का आयोजन करते हुए देखा जा सकता है, यह तमाम कोशिशें मिल्लत का सरमाया और वक्त बरबाद करने से ज़्यादा कोई हैसियत नहीं रखती, क्योंकि इन जलसे जुलूसों का क़ौम की समस्याओं के समाधान से कोई रिश्ता नहीं है। यहां तक कि मुस्लिम विरोधी नीतियों के लिए साम्प्रदायिक शक्तियों को ज़िम्मेदार ठहराने का अधिकार भी हमें हासिल नहीं है, क्योंकि वह जो कुछ कर रहे हैं ख़ुले रूप से अपने चुनावी मेनिफेस्टो पर अमल कर रहे हैं, उनका कोई भी क़ौल व फ़अल ढका हुआ या छिपा हुआ नहीं है। अब अगर आप उनसे सहमत नहीं हैं तो फिर आपको अधिकार है कि आप उनको शिकस्त देकर उनकी नीतियों को लागू होने से रोकें, लेकिन मुस्लिम लीडरशिप ऐसा करना नहीं चाहती, क्योंकि वह अपनी ग़फ़लतों और ग़लतियों को मज़लूमियत का लिबादा पहना कर अपनी क़ौम को मज़लूमियत के तसव्वुर में ज़िंदा रखना चाहती है। आख़िर ऐसा क्यों है ?
मैं कहना चाहूंगा कि फिर से क़ुदरत मुस्लिम लीडरशिप को एक मौक़ा दे रही है और वो मौक़ा 2024 के लोकसभा चुनाव का है, जिसके तहत एक मज़बूत महागठबंधन के कयाम को अमल में लाया जा सकता है और यक़ीनी तौर पर 2024 में सत्ता परिवर्तन की रूप रेखा को मुकम्मल बनाया जा सकता है। काश, मुस्लिम लीडरशिप बेदार हो और महागठबंधन के फार्मूले को अमल में लाने के लिए प्रयासरत बने। (लेखक सांझी विरासत मंच के राष्ट्रीय संयोजक हैं)
(09/03/2023)
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