चूरू का सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा ?
चूरू का सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। इस वर्ष के अन्त में राजस्थान विधानसभा के चुनाव हैं। जिसके लिए सभी सीटों पर सियासी दांवपेंच और दावेदारी तेज हो गई है। इस बार कुछ सीटें सबसे हॉट रहने वाली हैं, क्योंकि यहां के नेता मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में हैं। इन्हीं सीटों में से एक है चूरू। जो राजधानी जयपुर से करीब 200 किलोमीटर उत्तर में है। इस सीट से वर्तमान में राजेंद्र राठौड़ विधायक हैं।
राजेन्द्र राठौड़ भाजपा की सभी सरकारों में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं और कुछ दिनों पहले भाजपा ने उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी बना दिया है। उनका मुकाबला हमेशा कांग्रेस के उम्मीदवार से होता है और चुनाव आमने सामने का रहता है। वे 1990 से यहां से लगातार विधायक हैं। बीच में एक बार 2008 के चुनाव में उन्होंने पड़ौस की तारानगर सीट से चुनाव जीता था। सियासी गलियारों में तब यह चर्चा हुई थी कि उन्होंने मकबूल मंडेलिया के लिए यह सीट खाली की थी। उस चुनाव में मकबूल मंडेलिया चूरू से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीते थे। मकबूल मंडेलिया से राजेंद्र राठौड़ के व्यक्तिगत सम्बन्ध बताए जाते हैं।
2018 के चुनाव में राजेंद्र राठौड़ यहां से हारते हारते बचे थे और 1850 वोटों के मामूली अन्तर से चुनाव जीते थे। उनका मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार रफीक मंडेलिया से हुआ था। इस बार भी वे भाजपा के टिकट पर यहीं से चुनाव लड़ेंगे तथा खबर है कि इस बार उनको अन्दरखाने अपनी ही पार्टी के नेता हराने का प्रयास करेंगे, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का खेमा राजेन्द्र राठौड़ से नाराज़ बताया जा रहा है। इनके अलावा भाजपा से मुख्यमंत्री पद के अन्य दावेदार भी राठौड़ को विधानसभा पहुंचने से रोकना चाहेंगे, क्योंकि राठौड़ की भी मुख्यमंत्री बनने की चर्चा सियासी गलियारों में हो रही है और नेता प्रतिपक्ष बनाने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई है।
राजेंद्र राठौड़ की खास बात यह है कि यह जनता दल से भाजपा में आए थे और इनके सभी समुदायों से मधुर सम्बन्ध हैं। यह भाजपा की साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति से हमेशा दूर रहे हैं। इसी वजह से इन्हें मुस्लिम समुदाय के भी अच्छे खासे वोट मिलते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ बरसों में सार्वजनिक तौर पर वे भाजपा की लाइन पर चलने की कोशिश करते रहे हैं, जिससे उनकी सभी 36 कौमों वाले नेता की छवि को नुक़सान पहुंचा है, हालांकि यह अपने साथियों व नजदीकी मुस्लिम कार्यकर्ताओं को कहते रहते हैं कि "राजेंद्र राठौड़ जैसा पहले आपके लिए था वैसा ही रहेगा, कुछ मजबूरियां हैं, जिन्हें समझने की कोशिश कीजिए। मैं 24 घंटे आपके लिए उसी तत्परता से खड़ा रहूंगा जैसा पिछले 40 साल में खड़ा रहा हूं।"
जहां तक कांग्रेस की बात है तो 2008 से यहां से कांग्रेस पार्टी मंडेलिया परिवार को ही टिकट देती रही है। इस बार भी मंडेलिया परिवार मैदान में है और विचित्र बात यह है कि इस बार मंडेलिया परिवार से तीन लोग कोशिश कर रहे हैं कांग्रेस की टिकट के लिए। खबर है कि मंडेलिया परिवार के शुभचिंतक परिवार के इस सियासी बिखराव को रोकने का प्रयास कर रहे हैं और एक ही दावेदारी पार्टी नेतृत्व को पेश करेंगे। इनके अलावा कांग्रेस से राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष रेहाना रियाज भी यहां से मजबूत दावेदार बताई जा रही हैं। साथ ही पिछली बार के दावेदार और युवा नेता मुश्ताक़ ख़ान भी मैदान में हैं और वे लगातार क्षेत्र में सम्पर्क बनाए हुए हैं।
सियासी गलियारों में यह चर्चा भी है कि कांग्रेस राजेंद्र राठौड़ के सामने पिछले तीन दशक से लगातार चुनाव हार रही है, जिसका मुख्य कारण सामने मुस्लिम उम्मीदवार का होना है, अगर कांग्रेस को यह सीट जीतनी है तो किसी गैर मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारना चाहिए तथा इस सियासी समीकरण में जाट और सैनी जाति से सम्बन्धित उम्मीदवार की चर्चा चल रही है। अब असल तस्वीर तो टिकट वितरण और चुनाव परिणाम के बाद ही सामने आएगी कि कांग्रेस अपनी फटी हुई जाजम को इस बार चूरू में पैबंद लगाकर समय पर बिछाएगी या पहले की तरह फटी हुई ही एनवक्त पर बिछाएगी तथा राजेंद्र राठौड़ मुख्यमंत्री की रेस में खड़े होंगे या पूर्व विधायक बनकर घर बैठ जाएंगे ?
(10/04/2023)
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