बसपा, सीपीएम, रालोपा, आप, बीएपी आदि मिलकर मैदान में उतरें तो राजस्थान में एक "न‌ई सियासी इबारत" लिखी जा सकती है...

बसपा, सीपीएम, रालोपा, आप, बीएपी आदि मिलकर मैदान में उतरें तो राजस्थान में एक "न‌ई सियासी इबारत" लिखी जा सकती है...

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान में हर विधानसभा चुनाव में तीसरी ताक़त वाली पार्टियों का वजूद रहा है, यानी कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ काफी सीटों पर एक मजबूत विकल्प रहा है। लेकिन तीन दशक पहले जनता दल के बिखराव और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण वाली राजनीति के बढ़ावे से यह विकल्प कमजोर हो गया है। फिर भी बसपा, सीपीएम, रालोपा जैसी पार्टियों ने पिछले तीन चार चुनावों में काफी सीटों पर मतदाता के सामने एक विकल्प पेश किया है। गत चुनाव में बीटीपी और आम आदमी पार्टी आदि भी कुछ सीटों पर एक विकल्प बनकर सामने आई थीं।


इन पार्टियों का आपस में कोई गठबन्धन नहीं रहा और यह अपने अपने क्षेत्र में हाथ पैर मारती रही, फिर भी तीसरी ताकत वाली इन पार्टियों का 50 से अधिक सीटों पर मजबूत विकल्प था तथा इन सीटों पर इनको अच्छे खासे वोट मिले। कुछ सीटों पर तो जीत भी हु‌ई। इस कड़ी में अगर निर्दलीय उम्मीदवारों को शामिल कर लें तो यह संख्या काफी बढ़ जाती है, जहां मतदाताओं ने कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ बड़ी संख्या में वोट दिया था। यही वजह रही कि 2018 के विधानसभा चुनाव में मतगणना के दिन कांग्रेस को बहुमत से एक सीट कम यानी 99 ही मिली और भाजपा को 73 सीटें, शेष सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों, बसपा, रालोपा, बीटीपी आदि ने जीती थी।

इन पार्टियों के नेता हर बार चुनाव से पहले बड़े बड़े दावे करते हैं, गठबन्धन बनाने के, तीसरी ताकत के जरिए सरकार बनाने के, लेकिन इनके दावों की चुनाव की चौसर मंडते ही हवा निकल जाती है जब यह बिना किसी मजबूत गठबन्धन के मैदान में उतरते हैं। इनमें किसी पर कांग्रेस का सहयोग करने का आरोप लगता है तो किसी पर भाजपा की बी टीम होने का, सबसे बड़ी बात यह होती है कि मजबूत गठबन्धन नहीं होने की वजह से जनता भी इन पार्टियों को हल्के में लेती है और भाजपा-कांग्रेस खेमे में बंट जाती है। तीसरी ताक़त की इन पार्टियों को अच्छा खासा वोट उन्हीं सीटों पर मिलता है जहां धरातल पर इनका काम हो, उम्मीदवार मजबूत हो और जातीय समीकरण भाजपा-कांग्रेस के खिलाफ हो।

अगर यह पार्टियां चाहें कि इनका मजबूत सियासी वजूद बने और राजस्थान में सत्ता कांग्रेस व भाजपा से छीनकर तीसरी ताकत वाली पार्टियों को दिलाई जाए, तो यह काम नामुमकिन नहीं है, क्योंकि इन सभी पार्टियों का 50 से अधिक सीटों पर अच्छा खासा वजूद है और अगर यह एक मजबूत गठबन्धन बना लें तो इनका वजूद सभी 200 सीटों पर मजबूत हो सकता है तथा यह गठबन्धन कांग्रेस व भाजपा दोनों को 70-80 सीटों पर समेट सकता है। इसके लिए इन सभी को बड़ा दिल रखकर गठबन्धन करना पड़ेगा और हर पार्टी को उसकी सियासी हैसियत के मुताबिक 5 से लेकर 20 सीटें देकर सम्मानजनक समझौता करना होगा।

अभी राजस्थान में पांच पार्टियों का "राजस्थान लोकतांत्रिक मोर्चे" के नाम से एक गठबन्धन बना हुआ है, जिसके संयोजक जनता दल सेक्यूलर के प्रदेशाध्यक्ष अर्जुन देथा हैं। इस गठबन्धन में सीपीएम, सीपीआई, सीपीआई माले, सपा और जनता दल सेक्यूलर शामिल हैं तथा यह गठबन्धन पिछले दो विधानसभा चुनाव लड़ चुका है, हालांकि इस मोर्चे को कोई खासा सफलता नहीं मिली, लेकिन अगर तीसरी ताकत वाली सभी पार्टियां एक मजबूत गठबन्धन बना लें तो सफलता निश्चित है। जनता कांग्रेस व भाजपा के लूटतन्त्र और किसान विरोधी, मजदूर विरोधी, दस्तकार विरोधी, ओबीसी विरोधी, दलित विरोधी, आदिवासी विरोधी व अल्पसंख्यक विरोधी नीतियों से ख़फ़ा है, लेकिन उसे कोई मजबूत विकल्प नहीं मिल रहा है।

विधानसभा चुनाव के करीब आठ महीने बचे हैं और बसपा, आम आदमी पार्टी और रालोपा ने सभी 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। बाकी पार्टियां भी अपनी हैसियत अनुसार सीटों पर चुनाव लड़ेंगी, लेकिन बिना गठबन्धन के चुनाव लड़ी तो नतीजा वही ढाक के तीन पात रहेगा। किसी को दो सीट, किसी को तीन सीट और किसी को छह सीट मिल जाएंगी और बहुमत नहीं मिला तो इनके यह मुट्ठीभर विधायक कांग्रेस या भाजपा में भाग जाएंगे।

इन पार्टियों की बात करें तो सबसे ज्यादा मजबूत धरातल बसपा का है। जिसकी मुखिया यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती हैं। बसपा (बहुजन समाज पार्टी) 1990 में पहली बार राजस्थान के चुनावी मैदान में उतरी थी। लेकिन उस वर्ष विधानसभा के हुए चुनाव में बसपा किसी भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाई। उसे पहली बार जीत 1998 के विधानसभा चुनावों में मिली, तब उसने 108 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में बसपा को 2 सीटें मिली, एक भरतपुर जिले की नगर विधानसभा सीट जहां से माहिर आजाद विधायक बने और दूसरी अलवर जिले की बानसूर सीट जहां से जगत सिंह दायमा को विधानसभा में पहुंचने का मौका मिला था।

राजस्थान में 2003 के विधानसभा चुनावों में बसपा से फिर दो विधायक बने। एक दौसा जिले की बांदीकुई सीट से मुरारी लाल मीणा और दूसरे करौली जिले की सपोटरा विधानसभा सीट से सुखलाल। 2008 के विधानसभा चुनाव में बसपा से 6 विधायक जीतकर विधानसभा में पहुंचे। इनमें नवलगढ़ से राजकुमार शर्मा, उदयपुरवाटी से राजेन्द्र गुढ़ा, गंगापुर सिटी से रामकेश मीणा, सपोटरा से रमेश मीणा, दौसा से मुरारी लाल मीणा और बाड़ी विधानसभा सीट से गिर्राज सिंह मलिंगा विधायक बने।

वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा से तीन विधायक जीते। सादुलपर से मनोज कुमार न्यांगली धौलपुर से बीएल कुशवाह और खेतड़ी से पूरणमल सैनी। 2018 के चुनाव में एक बार फिर बसपा से 6 विधायक जीते, किशनगढ़बास से दीपचंद खैरिया, तिजारा से संदीप यादव, उदयपुरवाटी से राजेन्द्र गुढ़ा, करौली सीट से लाखन मीणा, नदबई से जोगिन्दर अवाना और नगर सीट से वाजिब अली हाथी पर सवार होकर विधानसभा पहुंचे।

अब बात करें नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल की पार्टी रालोपा (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी) की। हनुमान बेनीवाल तीन बार विधायक भी रहे हैं और 2018 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के तीन विधायक जीते थे। वर्तमान में 100 से अधिक पंचायत समिति सदस्य रालोपा के हैं, चार पंचायत समितियों में प्रधान हैं, दो नगर पालिकाओं में चेयरमैन हैं। पिछले चार साल में हुए विधानसभा के 9 उप चुनावों में रालोपा को औसतन 30 से 35 हजार वोट मिले हैं। हनुमान बेनीवाल ने लोकसभा चुनाव भाजपा के साथ गठबन्धन करके लड़ा था, किसान विरोधी काले कानून बनाने के मुद्दे पर उन्होंने करीब दो साल पहले भाजपा से गठबन्धन तोड़ दिया था। खबर है कि वे आम आदमी पार्टी और कुछ अन्य पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं।

बीटीपी (भारतीय ट्राइबल पार्टी) जो गुजरात के छोटू भाई वसावा की पार्टी है और इस पार्टी ने 2018 का विधानसभा चुनाव राजस्थान में लड़ा था, जिसमें चौरासी विधानसभा सीट से राजकुमार रोत और सागवाड़ा से रामेश्वर डिंडोर विधायक बने। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य 11 सीटों पर बीटीपी ने पिछला चुनाव लड़ा था और कुछ महीनों पहले यह दोनों विधायक और इनके साथियों ने बीटीपी छोड़कर अलग पार्टी बना ली, जिसका नाम इन्होंने भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) रखा है तथा इसी नाम से इस बार यह लोग में मैदान में उतरेंगे। आदिवासी क्षेत्र में "आदिवासी परिवार" नामक एक सामाजिक संगठन काम करता है, जिसकी आदिवासी समाज पर मजबूत पकड़ है और इसी आदिवासी परिवार के सहयोग से बीटीपी मैदान में उतरी थी तथा खबर यह है कि अब आदिवासी परिवार न‌ई पार्टी बीएपी के साथ है।

अब बात करें सीपीएम यानी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की। इसके वर्तमान में दो विधायक हैं। एक डूंगरगढ़ सीट से गिरधारीलाल महिया और दूसरे भादरा से बलवान पूनिया। 2018 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम ने राजस्थान लोकतांत्रिक मोर्चे के गठबन्धन से 28 सीटों पर चुनाव लड़ा और इनमें से क‌ई सीटों पर मजबूत टक्कर भाजपा व कांग्रेस को दी। सीपीएम के प्रदेश सचिव कामरेड अमराराम हैं, जो चार बार लगातार विधायक रहे हैं। 2008 के विधानसभा चुनाव में अमराराम सहित तीन विधायक सीपीएम से जीते थे।

उक्त सभी पार्टियां इस बार भी मैदान उतरेंगी तथा इनके अलावा हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एम‌आईएम, एसडीपीआई, वेलफेयर पार्टी, अम्बेडकर राइट पार्टी आदि भी कुछ पार्टियां सियासी मैदान में मौजूद हैं और सभी चुनाव लड़ने का दावा भी कर रही हैं। लेकिन पिछले चार पांच चुनावों का अध्ययन करें तो अधिकतर सीटों पर चुनाव भाजपा व कांग्रेस पर ही केन्द्रित रहता है तथा तीसरी ताकत की पार्टीयां 50 से अधिक सीटों पर मजबूत विकल्प देने के बावजूद बड़ी सफलता प्राप्त नहीं कर पाती हैं, क्योंकि इनका कोई मजबूत गठबन्धन नहीं होता है और तीसरी ताकत का वोट बिखर जाता है। अगर यह सभी एक मजबूत गठबन्धन के साथ मैदान में उतरें तो राजस्थान में एक "नई सियासी इबारत" लिखी जा सकती है, क्योंकि राजस्थान की सियासी जमीन इसके लिए पूरी तरह से तैयार है।
(10/04/2023)
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