मुख्यमंत्री गहलोत को अपने अन्तिम कार्यकाल में "नाइन्साफी" का दाग़ हटाना चाहिए

मुख्यमंत्री गहलोत को अपने अन्तिम कार्यकाल में "नाइन्साफी" का दाग़ हटाना चाहिए 

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विशेषकर रियायती दर पर आवन्टित ज़मीनों के मुद्दे पर, जो उन्होंने अपने तीन कार्यकाल में बिना भेदभाव के आवन्टित नहीं की हैं। इनमें मुस्लिम समुदाय के साथ पूरी तरह से भेदभाव बरता गया है।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत दिसम्बर 1998 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। यह उनका तीसरा कार्यकाल है और तीनों ही कार्यकालों में मंत्रिमंडल गठन, राजनीतिक नियुक्तियों, ट्रांसफर पोस्टिंग, वोट की राजनीति के लिए स्थापित बड़े नेताओं को हाशिए पर लगाने और रियायती दर पर जमीन आवन्टित करने आदि मुद्दों को लेकर गम्भीर सवाल खड़े होते रहे हैं। इन सब में इस लेख का प्रमुख मुद्दा रियायती दर पर ज़मीन आवन्टित करने का है, जिसमें गहलोत ने 15 बरसों में पूरी तरह से भेदभाव बरता है विशेषकर मुस्लिम समुदाय के साथ।


अशोक गहलोत ने अपने इन तीन कार्यकालों में हर जिले में बड़ी संख्या में रियायती दर पर भूमि आवन्टित की है। कमोबेश सभी समाजों को जमीन दी है, लेकिन इस मुद्दे पर ख़ुद को गांधी का अनुयायी कहने वाले गहलोत ने मुस्लिम समुदाय के साथ न्याय नहीं किया है। मुस्लिम समुदाय से सम्बन्धित संस्थाओं को बहुत ही कम जमीन आवन्टित की हैं, या यह कहें कि न के बराबर की हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय कांग्रेस का प्रमुख व परम्परागत वोट बैंक है और मुख्यमंत्री गहलोत की विधानसभा सीट सरदारपुरा मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है।‌ विचित्र बात यह भी है कि लगातार नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन मंत्री रहने वाले शांति धारीवाल जिनके हाथ में इस जमीन आवन्टित करने की प्रमुख रूप से चाबी रही है वे भी कोटा की मुस्लिम बाहुल्य विधानसभा सीट से विधायक बनते हैं।

एक थिंक टैंक के सर्वे में सामने आया है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली कुल सीटों में से 96 सीटें ऐसी हैं जो मुस्लिम वोटों के कारण जीती गई हैं, इन सीटों पर हार जीत का अन्तर मुस्लिम वोटों की संख्या से कम है तथा मुस्लिम वोटर ने एकतरफा कांग्रेस के उम्मीदवारों को वोट दिया था। ऐसा ही अधिकतर निर्दलीय या छोटी पार्टियों से जीते हुए विधायकों की सीटों पर हुआ है, यानी यह लोग भी मुस्लिम वोटों की बदौलत विधानसभा में पहुंचे हैं। इस बात की एक दर्दनाक सच्चाई यह भी है कि मामूली वोटों से चुनाव हारने के बाद एक कांग्रेसी उम्मीदवार ने  मतगणना के चार पांच दिन बाद भावुक होकर कहा था कि "अगर मेरी सीट पर दस हज़ार मुस्लिम वोट होते तो मैं विधायक बन जाता।"

अब चुनाव के कुछ महीने बचे हैं और कांग्रेस पार्टी और मुख्यमंत्री गहलोत से मुस्लिम समुदाय जबरदस्त नाराज़ है, जिसके क‌ई कारण हैं जिन्हें यहां बयान करना मुमकिन नहीं है। एक तरफ गहलोत सरकार को रिपीट करने के लिए कमर कस चुके हैं तो दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय की नाराज़गी सामने है, जो कांग्रेस की नैय्या डूबोने के लिए काफी है। साथ ही गहलोत पर मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव करने का दाग़ अलग लग रहा है। इसलिए जरूरी है कि गहलोत इस दाग़ को धोने की कोशिश करें ताकि कांग्रेस को 2013 की 21 सीट वाली करारी फजीहत से बचाया जा सके।

गहलोत 70 बसन्त देख चुके हैं और कांग्रेस हर बार उनके नेतृत्व में चुनाव हारी है, अगर यह चुनाव गहलोत के नेतृत्व में होता है और उन्हें चुनाव जीतना है तो रियायती दर पर भूमि आवन्टित करने के मुद्दे पर ईमानदारी बरतनी चाहिए तथा मुस्लिम सहित सभी वंचित तबकों से जुड़ी हुई संस्थाओं को शीघ्रता से भूमि आवन्टित करनी चाहिए। अगर इस लेख में लिखी गई बात ग़लत है तो मुख्यमंत्री को एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए और बताना चाहिए कि उन्होंने अपने तीनों कार्यकालों में जिलेवार कुल कितनी जमीन रियायती दरों पर आवन्टित की है ? इनकी लोकेशन क्या है ? किन किन संस्थाओं और समाजों को यह जमीन दी गई है ? उसका रकबा कितना है और रियायत कितनी की गई है ? यह आकंड़े जारी होते ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
(24/04/2023)
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