आर‌एस‌एस-भाजपा का पसमांदा मुस्लिम फार्मूला : विभाजन और नफ़रत की खतरनाक साज़िश

आर‌एस‌एस-भाजपा का पसमांदा मुस्लिम फार्मूला : विभाजन और नफ़रत की खतरनाक साज़िश

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। भारतीय जनता पार्टी या यह कहें कि आर‌एस‌एस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छत्रछाया वाली केन्द्र सरकार में इनके 300 के क़रीब लोकसभा सांसद हैं। यह सीटें कुछ राज्यों में तो अधिक से अधिक हैं, ख़ासकर उत्तर भारत के राज्यों में। अब इन राज्यों में एक भी सीट नहीं बढ़ सकती। जहां तक दक्षिण भारत का सवाल है तो वहां पहले से ही लोग इस नफरती हांडी को नहीं चढ़ा रहे हैं, जो बांकी टेड़ी हांडी कर्नाटक में चढ़ी हुई थी उसे वहां के जागरूक मतदाताओं ने कुछ दिनों पहले फोड़ कर फेंक दिया है।



इसके अलावा महंगाई, बेरोजगारी और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से देश में जो माहौल पिछले कुछ बरसों में बना है उससे जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। ऐसे में यह तय है कि भाजपा की लोकसभा सीटें निश्चित रूप से घटेंगी और यह 200 से भी नीचे जा सकती हैं। इस सम्भावित खतरे और सत्ता जाने के डर से आर‌एस‌एस-भाजपा ने एक नया फार्मूला इजाद किया है, वो है "पसमांदा मुस्लिम" का। यानी इन्होंने अपनी विभाजनकारी और नफरती सोच को जिस तरह से देशभर में "हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण" के नाम पर स्थापित कर सत्ता हासिल की, अब इन्होंने सत्ता बचाने के लिए "पसमांदा मुस्लिम ध्रुवीकरण" को एक न‌ए हरबे के तौर पर इस्तेमाल करना तय किया है।

सबसे पहले तो यह जानना जरूरी है कि पसमांदा मुस्लिम कौन हैं ? पसमांदा यानी पिछड़े मुस्लिम यानी ओबीसी मुस्लिम। आजकल भाजपा इनकी भलाई की बड़ी बड़ी बातें कर रही है ताकि मुस्लिम वोट का बंटवारा हो और उसकी सत्ता बची रहे। भाजपा ने कर्नाटक चुनाव से कुछ महीनों पहले वहां मिले 4 प्रतिशत पसमांदा मुस्लिम आरक्षण को खत्म कर दिया था, हालांकि उस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी यह अलग बात है। लेकिन भाजपा ने तो इस आरक्षण को अपनी तरफ से समाप्त कर ही दिया था।

इसी तरह जस्टिस मिश्रा कमिशन जिसने अपनी रिपोर्ट में 15 प्रतिशत अल्पसंख्यक आरक्षण देने की सिफारिश की थी, जिसमें साढ़े 8 फीसदी पसमांदा मुस्लिम जातियों को आरक्षण देने की वकालत की गई थी। क्या भाजपा की केन्द्र सरकार पसमांदा मुस्लिम जातियों के भले के लिए जस्टिस मिश्रा कमिशन की सिफारिश के तहत ओबीसी मुस्लिम जातियों को यह साढ़े 8 फीसदी आरक्षण दे सकती है ? जवाब होगा नहीं। फिर पसमांदा मुस्लिम के लिए यह लाड प्यार क्यों ?

पसमांदा मुस्लिम के लिए भाजपा का लाड प्यार सिर्फ सत्ता बचाने का एक खेल है, इसके सिवाय कुछ नहीं है। उसने जो दरार सत्ता के घिनौने खेल के लिए हिन्दू-मुस्लिम में पैदा की है, अब पसमांदा मुस्लिम को लेकर पैदा करना चाह रही है। आर‌एस‌एस-भाजपा चाहती है कि ओबीसी मुस्लिम और सामान्य मुस्लिम में नफ़रत की दीवार खींची जाए ताकि यह लड़ते भिड़ते रहें। यह बहुत बड़ा ख़तरनाक खेल है।

अगर यह चाहते हैं कि वाकई पसमांदा मुसलमानों का भला हो, तो सबसे पहले तो भाजपा नेतृत्व को पसमांदा मुसलमानों से इस बात की माफी मांगनी चाहिए कि "हमने कर्नाटक में पसमांदा मुस्लिम आरक्षण खत्म कर बहुत बड़ी गलती की थी, हमें इसके लिए माफ किया जाए।" दूसरा काम जस्टिस मिश्रा कमिशन की सिफारिश के तहत पसमांदा मुस्लिम को साढ़े 8 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा करें। तीसरा काम पसमांदा मुस्लिम को हर राज्य में उनकी आबादी के अनुपात में लोकसभा व विधानसभा की टिकटें देने की घोषणा करें। लेकिन ऐसा यह हरगिज़ नहीं करेंगे, क्योंकि इनकी सौ साल की पूरी यात्रा मुसलमानों से नफ़रत करने के नाम पर ही चली है।

जहां तक पसमांदा मुस्लिम की परिभाषा की बात है तो आज ओबीसी और ईडब्ल्यूएस में 99 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम शामिल हैं, यानी यह सब पिछड़े हुए हैं। एक फीसदी से कम मुस्लिम जो अधिकारी या बिजनेसमैन हैं वे ही फारवर्ड (अगड़े) हैं। साथ ही जस्टिस सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह साफ तौर पर कहा है कि "देश में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है।" जब देश के सभी मुस्लिम पसमांदा हैं तो फिर यह खेल क्यों ? इसलिए कि सत्ता की बुझती भट्टी में किसको झोंका जाए, इसलिए इस बार पसमांदा मुस्लिम फार्मूले को झोंक कर देखते हैं।
(24/05/2023)
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