सीएम गहलोत का जातीय जनगणना कराने का पत्र ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गत दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक पत्र लिखा है, जिसमें जातीय जनगणना कराने की मांग की गई है, जो बहुत ही अच्छी बात है। जातीय जनगणना की मांग दशकों से देश में हो रही है, अन्तिम जातीय जनगणना आजादी से पहले 1931 में हुई थी। जातीय जनगणना नहीं होने का सबसे बड़ा नुकसान ओबीसी वर्ग को हो रहा है, क्योंकि एससी-एसटी की जातीय जनगणना तो पहले से हो रही है और सामान्य वर्ग के अधिकतर लोग जातीय जनगणना के खिलाफ हैं।

जातीय जनगणना से यह पता चल जाएगा कि देश में कौनसी जाति और वर्ग की कितनी आबादी है तथा इससे विकास योजनाओं और आरक्षण बढ़ाने घटाने में मदद मिलेगी। जो लोग जातीय जनगणना के खिलाफ हैं वे नहीं चाहते कि ओबीसी वर्ग की जातियों का विकास हो और उनका आरक्षण बढ़ाया जाए। कर्नाटक चुनाव के दौरान कांग्रेस के नेताओं ने जातीय जनगणना की बात खुले मंच से कही है तथा पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने "जिसकी जितनी आबादी उतनी उसकी हिस्सेदारी" वाले समाजवादी फार्मूले की वकालत की है। हालांकि कांग्रेस कभी भी जातीय जनगणना के फेवर में नहीं रही, अगर होती तो करीब 55 साल तक देश पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस पार्टी आज तक कभी जातीय जनगणना करवा लेती और जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी वाले समाजवादी फार्मूले को लागू कर देती, जिसके लिए बड़े बड़े समाजवादी नेता संसद और सड़क पर लगातार आवाज़ लगा लगाकर दुनिया से चले गए।
जातीय जनगणना की नए सिरे से बात बिहार में हुई, जहां जेडीयू-भाजपा गठबन्धन सरकार ने विधानसभा में प्रस्ताव पास किया, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल सहित सभी दलों ने इसको एक राय से समर्थन दिया। उसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार के सभी राजनीतिक दलों के नेता दिल्ली आकर प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर जातीय जनगणना की गुहार लगाई। लेकिन केन्द्र सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई। अब बिहार में जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के गठबन्धन की सरकार है तथा इस सरकार ने बिहार में जातीय जनगणना करानी शुरू कर दी है, जिसके आंकड़े जल्द ही सार्वजनिक होने वाले थे और कुछ दूसरे राज्य भी जातीय जनगणना कराने की तैयारी कर रहे थे। इस बीच कोर्ट ने बिहार की जातीय जनगणना को रोक दिया।
समझ के परे है कि कोर्ट ने ऐसा क्यों किया ? क्या कोई ग्राम पंचायत अपने यहां यह जनगणना या सर्वे करे कि हमारी ग्राम पंचायत में कितनी आबादी है, किस किस जाति की है, किस किस जाति में शिक्षा और रोजगार का स्तर कैसा है ? तो क्या यह ग़लत है ? फिर अगर बिहार राज्य सरकार ने यह काम शुरू किया तो ग़लत कैसे हुआ ? अगर जातीय जनगणना केन्द्र का विषय है तो उसे इसे शीघ्रता से कराना चाहिए। लेकिन बिहार में तो जातीय जनगणना नहीं बल्कि जातीय आधार पर शैक्षणिक और आर्थिक सर्वेक्षण हो रहा था, जो किसी भी तरह ग़लत और गैर कानूनी नहीं हो सकता।
जहां तक बात राजस्थान के मुख्यमंत्री के पत्र की है, तो यह बेवकूफ बनाने और राजनीतिक स्टंट के अलावा कुछ नहीं है। अगर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जातीय जनगणना के प्रति इतने ही ईमानदार हैं तो उन्हें एक मामूली पत्र प्रधानमंत्री को लिखकर मुद्दे की इतिश्री करने की बजाए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाना चाहिए और फिर जातीय जनगणना के प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा करनी चाहिए तथा इसे पूरे देश को लाइव दिखाना चाहिए, इसमें सभी विधायकों को बोलने का मौका देना चाहिए चाहे सत्र एक सप्ताह तक क्यों न चलाना पड़े। इसके बाद प्रस्ताव पास कर केन्द्र सरकार को भेजना चाहिए। ऐसा करने से जातीय जनगणना के मुद्दे पर सभी पार्टियों और सभी विधायकों का चेहरा स्पष्ट हो जाएगा कि कौन ईमानदारी से इस मुद्दे के फेवर में है और कौन इस मुद्दे पर सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहता है और कौन इस मुद्दे के पूरी तरह से खिलाफ है ?
(24/05/2023)
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