मणिपुर और कश्मीर के हालात तथा ओडिशा का ट्रेन हादसा बहुत कुछ बयान कर रहे हैं, लेकिन सुने कौन ?

मणिपुर और कश्मीर के हालात तथा ओडिशा का ट्रेन हादसा बहुत कुछ बयान कर रहे हैं, लेकिन सुने कौन ?

***********************
जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र जहां 90 करोड़ से अधिक वोटर हैं, इतनी तो चीन को छोड़कर किसी देश की कुल आबादी भी नहीं है। विश्व के सभी धार्मिक पंथ, असंख्य जातियां, सैकड़ों भाषाएं व बोलियां तथा 140 करोड़ से अधिक आबादी और हर तबके व क्षेत्र का अपना अपना खानपान और रहन सहन। कितना खूबसूरत देश है हमारा भारत, ऐसी विविधता वाला दुनिया में दूसरा कोई देश नहीं है। लेकिन यहां ज्वालामुखी के अंदर पकते लावे की तरह बहुत कुछ पक रहा है, नफ़रत और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेजी से बढ़ रहा है, जो शुभ संकेत नहीं है तथा यह सब कुछ सत्ता प्राप्ति और सत्ता बरकरार रखने के लिए हो रहा है।


आम आदमी को बेवकूफ बनाकर राजनेता नफ़रत की आग में झोंक रहे हैं। यह बहुत खतरनाक साज़िश है देश के खिलाफ और यह साज़िश देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए बड़े खतरे की घंटी बजा रही है, कोई सुन सके तो सुन ले। करीब डेढ़ महीने से पूर्वोत्तर का सीमावर्ती छोटा सा राज्य मणिपुर नफ़रत व हिंसा की आग में तबाह हो रहा है, वहां जातीय हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए हैं। वजह कहने को एसटी आरक्षण हो, लेकिन सच्चाई सिर्फ इतनी नहीं है। इसके पीछे जातीय ध्रुवीकरण से सत्ता बरकरार रखना या सत्ता हासिल करने का फार्मूला भी है, हमारे दुश्मन देशों की साज़िश भी ख़ामोशी से आग में घी डाल रही है।

बात जम्मू-कश्मीर की करें तो वहां भी सब कुछ वैसा नहीं है, जो सरकार बता रही है। आनन फानन में जनता को भरोसे में लिए बगैर अनुच्छेद 370 हटाना, एक पूर्ण राज्य को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बांटना तथा क‌ई महीनों तक सुरक्षा बलों को हर गली चौराहे पर तैनात कर तथा इंटरनेट, फोन, मोबाइल आदि सब कुछ बंद कर पूरे प्रदेश को एक अघोषित जेल बनाकर  लोगों से केन्द्र सरकार का फैसला मनवाना सही नहीं था। अगर यह सही था तो चार साल होने को आ ग‌ए अभी तक वहां विधानसभा चुनाव क्यों नहीं करवाए गए ? जवाब हो सकता है कि वहां चुनाव के हालात नहीं हैं। यह हालात खराब किसने किए ? जब खराब हालात थे तब भी चुनाव हो रहे थे तो क्या अब पहले से भी ज्यादा खराब हालात हैं ?

जम्मू-कश्मीर हमारे दो दुश्मन देशों चीन व पाकिस्तान से घिरा हुआ है, मणिपुर सहित पूरा पूर्वोत्तर क्षेत्र चीन और चीन की साज़िश से घिर चुका है। पूर्वोत्तर के पड़ौसी देशों बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और म्यांमार में चीन पूरी तरह से अपने पंजे गाड़ चुका है। पाकिस्तान पूरी तरह से चीन का सहयोगी बन चुका है। गुट निरपेक्ष आंदोलन और सार्क जैसे भारत हितैषी अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म जिन्हें भारत की दूरदृष्टी व कूटनीति से खड़ा किया गया था, इन दोनों प्लेटफॉर्म की पिछले दो दशक में हमारी केन्द्रीय सत्ता के कर्णधारों ने पूरी तरह से कब्र खोद दी है।

यूक्रेन युद्ध के कारण रूस एक बड़ी ताक़त बनकर उभर रहा है। चीन, ईरान जैसे कुछ देश खुलकर रूस के साथ खड़े हो गए हैं। खाड़ी के देशों में तेजी से चीन अपनी जगह बना रहा है। अमेरिका और यूरोप घबराया हुआ है तथा वो रूस व चीन के खिलाफ मजबूत लामबंदी करने में लगा हुआ है। ऐसी स्थिति में अगर आज गुट निरपेक्ष आंदोलन और सार्क जैसे प्लेटफॉर्म मजबूत होते तो हमारे देश के साथ पूरे विश्व का हित सुरक्षित होता, विश्व के बहुत से देश भारत की लीडरशिप में खड़े होते, लेकिन हमारे कर्णधारों की स्वार्थी संकीर्ण सोच यानी "खुद की सत्ता ही सब कुछ है" के कारण आज हम अंतरराष्ट्रीय और घरेलू तौर पर एक ख़तरनाक मोड़ पर खड़े हो गए हैं।

अब बात ओडिशा के ट्रेन हादसे की, जिसमें काफी संख्या में लोग मारे गए। तीन ट्रेनों का एक साथ टकराना और आधुनिक टेक्नोलॉजी के बावजूद इतना नुकसान होना अपने आप में सवाल खड़े करता है कि क्या हमारे रेलवे की यह स्थिति है ? इस हादसे की वजह जो भी हो, लेकिन रेल, पुल, सड़क आदि के हादसे पूरी दुनिया में होते हैं, परंतु इन हादसों के पीछे सिस्टम की लापरवाही, घटिया इंजीनियरिंग और कमजोर मैटेरियल हो तो बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है तथा यही प्रश्न चिन्ह ओडिशा रेल हादसे पर खड़ा है। वजह साफ है "भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद।" भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के कारण देश का निर्माण क्षेत्र पूरी तरह से खूबसूरत दिखते हुए भी पैरालिसिस का शिकार है, नतीजा आए दिन के कहीं न कहीं हादसे हैं।

इसलिए जनता को ध्रुवीकरण से सत्ता हासिल करने वाले नेताओं और चौपट होती व्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय और घरेलू तौर पर कमजोर होते देश के मुद्दे पर खुलकर सवाल करने चाहिए। एक महत्वपूर्ण सवाल के साथ इस लेख का समापन कर रहे हैं, क्या कोई बता सकता है कि "ओडिशा के रेल हादसे में कितने हिन्दू मारे गए, कितने मुस्लिम मारे गए, कितने कूकी मारे गए, कितने मैतेई मारे गए ? जवाब शायद यही होगा कि यह क्या बेहूदा सवाल है, वहां तो सभी इन्सान मारे गए हैं और घायलों को बचाने वालों ने भी इन्सान समझकर ही सभी को बचाया है। इसलिए देश के दर्द की आवाज सुनिए, जो आपसे बहुत कुछ कहना चाह रहा है।
(09/06/2023)
------------------------------------
➡️अगर आपको हमारा यह लेख/खबर पसंद आया हो, तो प्लीज इसे शेयर/फॉरवर्ड कीजिए और साथ ही हमारे अखबार की आर्थिक मदद भी कीजिए।
अकाउंट डिटेल्स:- इकरा पत्रिका
IKRA PATRIKA
IFSC:- PUNB 0613900
PNB, MUSLIM SR. SEC. SCHOOL, MOTI DUNGARI ROAD, JAIPUR.
-------------------------------------------
➡️इकरा पत्रिका को सहयोग राशि आप Paytm, Phone Pay और Google Pay से भी भेज सकते हैं। फोन नम्बर 9414361522 पर (अकाउंट Farooq Ali Khan)
--------------------------------------------
©️ Copyright :- इस सम्पूर्ण लेख/खबर को या इसके किसी पैराग्राफ़ को हुबहू या तोड़ मरोड़ कर प्रकाशित करना मना है। अलबत्ता आप चाहें तो लेखक और हमारे अखबार के नाम के साथ इस सम्पूर्ण लेख/खबर को सोशल मीडिया पर शेयर जरूर कर सकते हैं।
---------------------------------------------
-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।

©️ Copyright Thar News & Ikra Patrika.
All Rights Reserved.

Comments

Popular posts from this blog

झुंझुनूं में रीटा चौधरी को कांग्रेस जिलाध्यक्ष बनाने पर जबरदस्त रोष

चित्तौड़गढ़ अन्जुमन स्कूल में किया मुस्लिम शिक्षकों का सम्मान

कुरैशी समाज की नो दहेज, नो गार्डन, नो डिनर मुहिम के तहत सादगी से हुई शादी