जयपुर शहर की विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की हालत कमजोर क्यों हुई ?
जयपुर शहर की विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की हालत कमजोर क्यों हुई ?
इसी तरह 2008 के विधानसभा चुनाव में शहर की आठ विधानसभा सीटों में से तीन पर कांग्रेस को जीत मिली और पांच पर भाजपा को। 2013 के चुनाव में शहर की सभी आठों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की करारी हार हुई। इसी तरह जयपुर नगर निगम पर भी अधिकतर भाजपा का ही कब्जा रहा है। 2009 में मेयर का सीधा चुनाव कांग्रेस की ज्योति खण्डेलवाल जीत गई थी, लेकिन निगम सदन में बहुमत भाजपा को मिला, क्योंकि पार्षद ज्यादा भाजपा के जीते थे।
2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जरूर करिश्मा किया, इस चुनाव में कांग्रेस ने शहर की आठ में से पांच सीटें जीत ली। इतनी बड़ी जीत होने के बावजूद चार महीने बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस यहां से चुनाव हार गई। इस बीच 2020 के नगर निगम चुनाव में इज्जत बचाने के लिए कांग्रेस की गहलोत सरकार ने जयपुर को दो निगमों में विभाजित कर दिया। लेकिन दोनों ही निगम कांग्रेस हार गई। पुराने शहर का मुस्लिम बाहुल्य हैरिटेज नगर निगम जहां निर्दलीय मुस्लिम पार्षद अच्छी खासी संख्या में जीते उन्हें साथ लेकर कांग्रेस ने अपना मेयर जरूर बना लिया।
इस संक्षिप्त चुनावी इतिहास के बाद अब बात करें मौजूदा चुनावी माहौल पर। विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने बचे हैं और 6 जुलाई को दिल्ली में राजस्थान से सम्बंधित एक महत्वपूर्ण मीटिंग के बाद कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा है कि "चुनाव के तीन महीने पहले ही सभी टिकटें बांट दी जाएंगी।" मतलब यह है कि अगस्त के आखरी सप्ताह में टिकट बांट दी जाएंगी और अधिकतर पुराने चेहरे ही मैदान में होंगे। ऐसी हालत में कांग्रेस नेतृत्व अपनी सरकार को रिपीट करने का जो ख्वाब देख रहा है वो जयपुर में कैसे पूरा होगा ? क्योंकि यहां तो कांग्रेस के विधायकों की हालत बहुत कमजोर है, ऐसा यहां के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है।
सवाल है जयपुर में कांग्रेस की हालत कमजोर क्यों हुई ? उसके कई कारण हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण विधायक और उनके चेले चपाटे हैं। इनकी गुटबाजी, सत्ता के जरिए माल बटोरने की व्यस्तता, एक दूसरे को नीचा दिखाने और जनता को कोई प्राथमिकता नहीं देने से जनता में कड़ा रोष है। जनता ने इन्हें भाजपा के गढ़ में भाजपा के लूट व साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के राज से दुखी होकर चुना था। लेकिन यह लोग जनता की उम्मीदों पर खरे उतरने की बजाए, अपने खुद के और अपनों हितों के लिए समर्पित हो गए।
धरातल की सच्चाई यह है कि जयपुर की जनता अपने सरकारी काम भाजपा के राज में भी पैसे देकर करवाती थी और आज कांग्रेस के राज में भी पैसे देकर करवाती है। कोढ़ में खाज यह हो गई कि पहले बिचौलिए कम थे अब बढ़ गए। पहले उच्च स्तर की लूट थी, अब निम्न स्तर की लूट हो रही है। जयपुर में ज्यादातर काम जनता का नगर निगम और जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) में पड़ता है तथा इसके बाद पुलिस थानों में। लेकिन जयपुर में चल रहा लूट तंत्र इन तीनों जगह पर इस कदर कुंडली मारे बैठा है कि बिना बड़ी सिफारिश और सेवा किए किसी का काम नहीं होता है। दोनों नगर निगमों में शुरू से चल रही धमाचौकड़ी भी इसी लूट तंत्र का मुख्य कारण है।
जयपुर में विकास को लेकर भी नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल और स्थानीय विधायकों में दो तीन बार सार्वजनिक आरोप प्रत्यारोप हो चुके हैं। शहर में जगह जगह टूटी सड़कें, सीवरेज के गड्ढे, बहता पानी, गंदगी के ढेर आदि इस विश्व प्रसिद्ध गुलाबी नगरी के विकास के गवाह हैं कि कांग्रेस राज में कैसा विकास हुआ है ?
जहां तक गुटबाजी और कांग्रेस संगठन की बात है तो शहर में आज न कोई जिलाध्यक्ष है और ना ही कोई पार्टी संगठन। हां, नेताओं के अपने अपने गुट जरूर हैं। जो मुख्यतः चार जगह बंटे हुए हैं। एक गुट कैबिनेट मंत्री महेश जोशी का है, दूसरा गुट कैबिनेट मंत्री और सिविल लाइंस विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास का है, तीसरा गुट आदर्श नगर विधायक रफीक खान का है और चौथा गुट किशनपोल विधायक अमीन कागजी का है। महेश जोशी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खासमखास हैं। प्रताप सिंह खाचरियावास और महेश जोशी की गुटबाजी आमने-सामने है, रफीक खान का गुट महेश जोशी के खिलाफ प्रताप सिंह खाचरियावास के साथ नजर आता है और अमीन कागजी का गुट महेश जोशी के साथ नजर आता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जयपुर शहर से कांग्रेस के पांच विधायकों में थोड़ी बहुत अच्छी स्थिति सिविल लाइंस विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास की है। बाकी चार विधायकों महेश जोशी हवा महल, रफीक खान आदर्श नगर, अमीन कागजी किशनपोल और गंगा देवी बगरू की स्थिति बहुत कमजोर है। इस स्थिति को भांपकर महेश जोशी के क्षेत्र बदलकर किशनपोल आने की भी चर्चा है, जहां से वे विधायक रह चुके हैं। मालवीय नगर से प्रत्याशी रही अर्चना शर्मा और विद्याधर नगर से प्रत्याशी रहे सीताराम अग्रवाल की स्थिति कुछ हद तक ठीक मानी जा रही है, क्योंकि हार के बाद वे लगातार जनता के सम्पर्क में हैं और जितना हो सके काम करवाने का प्रयास भी करते हैं तथा यह दोनों बड़ी हद तक शहर की गुटबाजी से भी दूर हैं। जहां तक सांगानेर सीट की बात है तो वहां के भाजपा विधायक अशोक लाहोटी ने ध्रुवीकरण की नीति पर ज्यादा फोकस कर रखा है, जो शायद कांग्रेस के लिए इस बार भी भारी साबित हो।

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