दूध दही की नदियां बहा दें तो भी गहलोत अपनी सरकार को रिपीट नहीं कर सकते ?
दूध दही की नदियां बहा दें तो भी गहलोत अपनी सरकार को रिपीट नहीं कर सकते ?
बन्द दरवाजों की इन चौपालों में जब चर्चा होती है तो कांग्रेस के बड़े नेता और सरकारी अधिकारी भी कहते हैं कि गहलोत किसी भी हाल में सरकार रिपीट नहीं कर सकते, यह सिर्फ उनकी सियासी चोंचलेबाजी और प्रचार तंत्र का भ्रम है। यह लोग चर्चा में यहां तक कहते हैं कि गहलोत कोई बेवकूफ नहीं हैं, जो उन्हें सच्चाई मालूम नहीं है, गहलोत खुद भी अच्छी तरह से जानते हैं कि सरकार वापस नहीं आ रही है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का तो यहां तक कहना है कि दूध दही की नदियां बहा दें तो भी गहलोत कांग्रेस को नहीं जीता सकते। यानी जनहित की कोई भी योजना उतार दें तो भी सरकार रिपीट नहीं हो सकती। इन सबके अपने अपने तर्क भी हैं।
जहां तक राजस्थान के चुनावी इतिहास की बात है तो 1993 से कभी भी कोई सरकार रिपीट नहीं हो पाई है। दूसरा इतिहास यह है कि 2003 और 2013 का विधानसभा चुनाव गहलोत के नेतृत्व में ही लड़ा गया था तथा इन दोनों चुनावों में कांग्रेस की बहुत ही बुरी हार हुई थी। 2003 के चुनाव में कांग्रेस 156 से 56 विधायकों पर आ टिकी थी, ऐसे ही 2013 के चुनाव में 200 विधानसभा सीटों में से उसे सिर्फ 21 सीटें मिली थी, ऐसी बुरी हार कांग्रेस की इमरजेंसी के बाद हुए 1977 के चुनाव में भी नहीं हुई, जो कांग्रेस का सबसे बुरा दौर समझा जाता है।
जहां तक तर्क की बात है, तो कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं, सरकारी अधिकारियों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव जीतने के लिए सबसे पहले मजबूत संगठन चाहिए, जो आज कांग्रेस के पास नहीं है। जैसा संगठन है वो गहलोत और पायलट की गुटबाजी के कारण और कमजोर हो चुका है। इनका दूसरा तर्क यह है कि हमारे देश में विकास के नाम पर बहुत ही कम वोटिंग होती है और उस वोटिंग से चुनाव नहीं जीता जा सकता। अधिकतर वोटिंग जातीय समीकरण और उम्मीदवार के चेहरे पर होती तथा यही जीत का मुख्य कारण होता है। राजस्थान में आज जातीय समीकरण पूरी तरह से कांग्रेस के खिलाफ हैं और उम्मीदवारों के चेहरों यानी वर्तमान विधायकों व मंत्रियों से जनता में बड़े पैमाने पर रोष है। जिसका खामियाजा चुनाव में कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा।
बन्द दरवाजों की इन चर्चाओं में यह भी बात सुनने को मिलती है कि गहलोत सरकार ने भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर दी, भ्रष्टाचार निम्न से निम्न स्तर का हो रहा है। टारगेट और वसूली सब फिक्स हैं। छापेमारी भी वहीं होती है जहां तय टारगेट में घालमेल की जाए। जनहित के लिए चलाई जा रही सरकार की हर योजना में घालमेल और भाई भतीजावाद हो रहा है। सरकारी दौरों, कार्यक्रमों और फुल पेज के आए दिन लगने वाले अखबारी विज्ञापनों, टीवी विज्ञापनों और पोस्टर हाॅर्डिंग के प्रचार तंत्र सब में जमकर हेराफेरी का खेल खेला जा रहा है तथा लूट के इस खेल में गहलोत पानी की तरह जनता का पैसा (सरकार को दिया जा रहा टैक्स) बहा रहे हैं।
बड़े स्तर के प्रचार तंत्र के बारे में चर्चा यहां तक होती है कि गहलोत एक तो इसके जरिए अपने चहेतों को लाभ पहुंचा रहे हैं, दूसरा आलाकमान की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं कि "देखिए राजस्थान में पूरी तरह से माहौल कांग्रेस के फेवर में बना हुआ है और हमारी सरकार रिपीट हो रही है।" जहां तक जनहित की योजनाओं और घोषणाओं की बात है तो ऐसे काम पिछले कार्यकालों में भी और इस बार भी चुनावी साल में घोषित किए हैं, जिनका क्रियान्वयन समय पर और पारदर्शिता से नहीं होता है। इसीलिए ऐसी घोषणाओं का लाभ उन्हें 2003 और 2013 के चुनावों में भी नहीं मिला था।

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