क्या सिर्फ पैर धोने से दलितों और आदिवासियों का भला होगा ?

क्या सिर्फ पैर धोने से दलितों और आदिवासियों का भला होगा ?

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)।  06 जुलाई 2023 का दिन भारतीय इतिहास में याद रखा जाएगा। इस दिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक पीड़ित आदिवासी को सम्मानपूर्वक अपने राजकीय आवास पर बुलाया और फिर उसके पैर धोकर उसे सम्मानित किया। उन्होंने यह बहुत अच्छा कार्य किया है। इस पीड़ित आदिवासी पर मध्यप्रदेश के सीधी क्षेत्र में भाजपा से ही जुड़े प्रवेश शुक्ला नामक एक युवक ने सरेआम पेशाब किया, उसकी वीडियो बनाकर वायरल की, जिससे पूरा देश विश्व में शर्मसार हुआ।


इससे पूर्व इसी से मिलता जुलता एक ऐतिहासिक कार्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी किया था, हालांकि उसमें कोई पीड़ित नहीं था। लेकिन वो कार्य भी ऐतिहासिक था और सम्भवतः शिवराज सिंह चौहान ने उसी कार्य से प्रेरणा लेकर इस पीड़ित आदिवासी का इस अंदाज़ में सम्मान किया है। वो दिन था 24 फरवरी  2019 का। इस दिन विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री ने सफाई कर्मियों के पैर धोए और फिर सफेद कपड़े से उन्हें पौंछा भी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह शुभ और सराहनीय कार्य कुम्भ मेले में किया था। प्रधानमंत्री ने इस दिन पांच सफाई कर्मियों के पैर धोए, जो कुम्भ मेले में सफाई करने के लिए लगाए गए थे। प्रधानमंत्री के द्वारा किया गया यह सम्मान वाकई काबिल ए तारीफ़ है। क्योंकि यह सफाईकर्मी उस दलित समुदाय से हैं, जिनसे आज भी बहुत से लोग छुआछूत करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा किए गए इस दलित और आदिवासी सम्मान की तारीफ सिर्फ इसलिए कि वाकई उन्होंने दिल से इनका सम्मान किया होगा, राजनीतिक नफे नुक़सान के लिए नहीं। जहां तक अत्याचार की बात है, तो मृत जानवरों की खाल उतारने और शादी में घोड़ी पर बैठने जैसे मुद्दों पर आए दिन दलितों पर अत्याचार का चाबुक चलता रहता है। ऐसा ही अत्याचार विभिन्न प्रकार का आदिवासियों पर भी होता है।

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश के सबसे बड़े पद राष्ट्रपति की कुर्सी पर रामनाथ कोविंद जी को बैठाया गया, जो कि दलित समुदाय से हैं। इनके बाद द्रोपदी मुर्मू जी को बैठाया गया, जो वर्तमान में राष्ट्रपति हैं और आदिवासी समुदाय से हैं। यह भी बहुत अच्छा काम किया। लेकिन अगर दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार होते रहे, उनके साथ भेदभाव होता रहा, तो फिर ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी, शिवराज सिंह चौहान और अन्य राजनेताओं के यह कार्य सिर्फ राजनीतिक नफे नुक़सान को लेकर किए जाते हैं।

यह जग जाहिर है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में अच्छे खासे दलित और आदिवासी वोट भाजपा को मिले और पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में और ज्यादा मिले, जिससे भाजपाई सांसदों की संख्या पहली बार 300 पार कर गई। साथ ही 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी इस तबके के वोट भाजपा को खूब मिले और फिर 2022 के विधानसभा चुनाव में तो दलित वोटर ने ही यूपी में भाजपा की डूबती हुई नैय्या को बचाया था। इसी तरह देश के अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी इस तबके के जमकर वोट भाजपा के खाते में जाते हैं, परिणामस्वरूप क‌ई राज्यों में आज भाजपा की सरकार है।

इतना वोट देकर और भाजपा को सत्ता की चाबी सौंप कर आखिर दलितों और आदिवासियों को क्या मिला ? उनका आरक्षण आबादी के अनुपात में बढ़ा दिया गया ? प्राइवेट सेक्टर में एससी-एसटी को आरक्षण दे दिया गया ? बिना परीक्षा के लेटरल एन्ट्री से बनाए गए आईएएस अधिकारियों में बड़ी संख्या में एससी-एसटी की भी नियुक्त कर दी गई ? कई राज्यों में मुख्यमंत्री एससी-एसटी के बना दिए गए ? केन्द्र व राज्य सरकारों के मुख्य मन्त्रालय व विभाग एससी-एसटी नेताओं को दे दिए गए ? बरसों से खाली पड़े बैक लाॅक के सभी पदों को भर दिया गया ? जवाब होगा नहीं।

जब तक उक्त सभी सवालों का जवाब हां में नहीं होगा। जब तक दलितों और आदिवासियों पर हो रहे विभिन्न प्रकार के अत्याचार नहीं रूकेंगे। जब तक दलितों और आदिवासियों के विकास के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं को ईमानदारी से समय पर क्रियान्वित नहीं किया जाएगा, तब तक इन पैर धोने वाले कार्यक्रमों का कोई औचित्य नहीं होगा।
(08/07/2023)
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