देश के हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं, लेकिन इसका दोषी अकेला मीडिया नहीं है...

देश के हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं, लेकिन इसका दोषी अकेला मीडिया नहीं है...

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। देश के हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं, नफ़रत का बाजार गर्म है, सोशल मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया इसके लिए बड़े जिम्मेदार हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। जो हालात 1940 के दशक में बन रहे थे वैसे ही खतरनाक हालात आज बनते जा रहे हैं, जो किसी के हित में नहीं हैं। नफ़रत की यह आग सभी को अपने लपेटे में लेने के लिए विकराल रूप धारण करती जा रही है। देश की इस दुर्दशा के लिए विपक्षी राजनेता और भाजपा विरोधी सोच के लोग दिन रात मीडिया को कोसते रहते हैं कि मीडिया बिकाऊ है, भाजपा का दलाल है, जिसके कारण देश की आज यह हालत हो गई है। हमारे ख्याल में यह सही नहीं है। हां, इसमें कोई दोराय नहीं है कि मीडिया का बड़ा वर्ग बिकाऊ है और उसकी निम्न स्तरीय दलाली ने लोकतंत्र के चौथे ही नहीं बल्कि बाकी तीन स्तंभों को भी एक तरह से ध्वस्त कर दिया है।


यह सच है कि मीडिया "भेदभाव" करता है, क्योंकि मीडिया एक सेठ की "दुकान" है, जो सेठ जी के हिसाब से संचालित होती है। लेकिन विपक्षी दलों या भाजपा विरोधी सोच रखने वालों को अकेला मीडिया को कोस कर संतुष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे भड़ास तो निकल सकती है, लेकिन विशेष परिणाम नहीं आता है। वो इसलिए कि जितने भी लोकतंत्रवादी, संविधानवादी या शुद्ध भाषा में आरएसएस विरोधी लोग जिस काम को जिस तरीके से करना हो वैसे नहीं करते हैं। सांप को मारना भी चाहते हैं और आपस में गुथमगुथा होकर बार बार उसकी पूंछ पर ही मारते रहते हैं।

कांग्रेस, सपा, बसपा, कम्युनिस्ट यानी करीब करीब सभी विपक्षी पार्टियां मीडिया को कोसती हैं, लेकिन इनके नेता-प्रवक्ता अक्सर टीवी चैनल की डिबेट में चाय की चुस्की भी लेते हैं और एजेंडा एंकर से अपनी फजीहत भी करवाते हैं। आरएसएस तो सत्ता-संस्थान और मीडिया पर 2014 में ही हावी हुआ है। उससे पहले वही लोग हावी थे, जो आज मीडिया को कोसते हैं।

कांग्रेस, सपा, बसपा, कम्युनिस्ट आदि जब सत्ता में थे, तो उन्होंने राष्ट्रीय स्तर का एक भी टीवी चैनल व अखबार संचालित किया या संचालित करवाने में किसी की मदद की ? हां, जो पहले से चलते थे उनका गला जरूर घोंट दिया था। इन पार्टियों की सत्ता में बुद्धिजीवियों को राजनीतिक नियुक्तियां भी खूब मिली, ऊंचे ऊंचे पदों पर मिली। लेकिन उनमें अधिकतर ने क्या किया ? अपनी बुद्धि व नियुक्ति से लोकतांत्रिक व संवैधानिक विचारधारा को फ़ैलाने व कैडर बेस आन्दोलन खड़ा करने की बजाए अपना कद, पद व नकद खड़ा किया, जो आज स्वाहा होने के कगार पर है।

यह सच है कि मीडिया बहुत बड़ी ताक़त है, लेकिन यह सच नहीं है कि वो सबको एक लकड़ी से हांक सकता है। देशभर में किसी न किसी मुद्दे को लेकर धरना प्रदर्शन होते हैं, क्या कभी किसी मीडिया संस्थान के आगे भी कोई धरना प्रदर्शन हुआ है ? जो मीडिया संस्थान ग़लत करता है, उसके आगे दो पांच हजार लोग जमा होकर धरने पर बैठ जाइए। देखिए परिणाम आता है या नहीं आता है। मीडिया को कोसने की बजाए मीडिया संस्थान खड़ा कीजिए, जो लोग इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं उनकी नैतिक व आर्थिक मदद कीजिए। उनको दिल खोलकर प्रोत्साहित कीजिए, उनको सही दिशा में डायवर्ट करने का प्रयास कीजिए। परिणाम जरूर सुखद आएंगे।

अब एक और बात, 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को लगभग 39 प्रतिशत वोट मिले, 61 प्रतिशत भाजपा के विरोध में पड़े। यानी देश का बहुसंख्यक वोटर भाजपा के खिलाफ था, फिर भी उसको 303 सीटों का ऐतिहासिक बहुमत मिला, क्यों ? क्या यह मीडिया ने दिलवाया ? भाजपा को यह ऐतिहासिक बहुमत सत्ता स्वार्थी और लूट के माल को बचाने के प्रयास में व्यस्त विपक्षी नेताओं की "खुदगर्ज़ी" ने दिलवाया। कुछ दिनों पहले करीब दो दर्जन विपक्षी दलों ने इंडिया नामक गठबंधन बनाया है, जो अच्छी बात है। अगर यह गठबंधन सेक्यूलरिज्म के उसूलों और सबका साथ सबका विकास के फार्मूले पर मजबूती से खड़ा होने की बजाए सिर्फ सत्ता हासिल करने का सपना देखेगा और सीट बंटवारे को लेकर उलझ जाएगा तो परिणाम जैसा लोग सोच रहे हैं वैसा नहीं आएगा।

देश के बिगड़ रहे हालात को सिर्फ जनता सुधार सकती है, जनता नफरती लोगों और नफ़रत परोस रहे संगठनों से पूरी तरह दूरी बना ले, न‌ई पीढ़ी सोशल मीडिया पर नफ़रत देखने व परोसने की बजाए सत्ताधीशों से रोज रोटी रोजगार का सवाल करें। देश को बचाना है तो किसी को भी कोसने की बजाए नफरती बात करने वालों से दो गज की नहीं बल्कि 100 गज की दूरी बना लें, इसी में हम सबकी भलाई है।
(24/07/2023)
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