विपक्षी गठबंधन "इंडिया" को मुसलमानों के वोट चाहिए या नहीं ?
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देश बचाने और संविधान बचाने के नाम पर बना करीब दो दर्जन विपक्षी पार्टियों का गठबंधन "इंडिया" कहने को एक सेक्यूलर गठबंधन है, लेकिन इस सेक्यूलर गठबंधन में देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय "मुस्लिम" के मुद्दों और उनकी पहचान के तौर पर बनी हुई कुछ राजनीतिक पार्टियों को कोई जगह नहीं देना गम्भीर सवाल खड़े करता है कि यह गठबंधन देश बचाने के लिए है या साॅफ्ट हिन्दुत्व के जरिए सत्ता हासिल करने का साधन है ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। कांग्रेस सहित 26 विपक्षी पार्टियों जिनमें प्रमुख हैं ममता बनर्जी की टीएमसी, नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड, लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, शरद पवार की एनसीपी, स्टालिन की डीएमके, उद्धव ठाकरे की शिवसेना, हेमन्त सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा, जयन्त चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल, सीपीएम, सीपीआई, सीपीआई एमएल आदि पार्टियों ने विपक्षी एकता के लिए इंडिया नाम से गठबंधन बनाया है, जिसको लेकर विपक्षी नेताओं में उत्साह है वहीं भाजपा में डर का माहौल उत्पन्न हुआ है।
इस गठबंधन को बनाने के लिए 17 और 18 जुलाई को इन विपक्षी पार्टियों की बैठक बेंगलूरू में हुई। इससे पहले विपक्षी एकता की एक बड़ी बैठक पटना में 23 जून को भी हुई थी, जिसमें 17 पार्टियां शरीक हुई थी। बेंगलुरु बैठक में जिन आठ नौ और पार्टियों को बुलाया गया उनमें ज्यादातर बहुत ही छोटी पार्टियां और मामूली प्रभाव वाली हैं, लेकिन उनका साथ एक बड़े गठबंधन और भाजपा को हराने के लिए जरूरी था इसलिए उन्हें साथ लिया गया।
कहने को यह गठबंधन देश बचाने, संविधान बचाने और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में चल रही भाजपा की तानाशाह सरकार को हटाने के लिए बनाया गया है। बैठक के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में इंडिया गठबंधन के नेताओं ने बड़ी बड़ी बातें भी कहीं। लेकिन इस गठबंधन से मौलाना बदरुद्दीन अजमल की की एआईयूडीएफ, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम, एसडीपीआई, वेलफेयर पार्टी आदि पार्टियों को पूरी तरह से दूर रखा गया है, जिनका नेतृत्व मुस्लिम लीडर करते हैं। हालांकि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ्ती के साथ ही केरल की मुस्लिम लीग को इस गठबंधन में शामिल किया गया है, यह इस गठबंधन की सियासी मजबूरी भी है, क्योंकि इनके राज्यों में इन पार्टियों के बगैर गठबंधन की नैय्या पार होनी मुश्किल है।
इसके अलावा मुस्लिम से सम्बंधित मुद्दों और अत्याचारों पर भी इंडिया गठबंधन के नेता उस बेबाकी से नहीं बोल रहे हैं जिस तरह वे दूसरे मुद्दों पर बोलते हैं। गत दिनों ट्रेन में जिस तरह एक आतंकी रेलवे फोर्स के सिपाही ने विचारधारा और शक्ल देखकर लोगों को बोगियों में ढूंढ ढूंढ कर गोलियों से भूना, जो शायद विश्व की पहली घटना है, उस पर भी विपक्षी नेताओं ने दबी हुई आवाज़ में निन्दा की तथा बड़े विपक्षी नेताओं में से शायद ही कोई मृतकों के घर गया। क्यों ? क्या इसलिए कि एक को छोड़कर बाकी मरने वाले मुसलमान थे ?
इसी तरह दिल्ली की चौखट के पास हरियाणा के मेवात इलाके में गत दिनों जो फसाद हुआ, एक इमाम को मस्जिद में घुसकर आतंकियों ने मार डाला, नूंह में हरियाणा सरकार ने फसादियों को सजा देने के नाम पर बुलडोजर चलवाकर जिस तरह कानून की धज्जियां उड़ाई, लोगों के रोटी रोजगार और मकानों को जिस तरह जमींदोज किया, यह अपने आप में हैरान करने वाला है कि क्या यह उसी भारत में हुआ है जिसको एक लोकतांत्रिक व कल्याणकारी देश के तौर संवैधानिक व्यवस्था से चलने वाला देश बनाने का सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान सभा के सदस्यों ने देखा था ? इस मुद्दे पर भी विपक्षी पार्टियों की आवाज दबी हुई जबान में निकली है, क्यों ? क्या इसलिए कि अधिकतर पीड़ित मुस्लिम समुदाय से सम्बंधित हैं ?
एक और मुद्दा यह है कि इन्हीं विपक्षी दलों की यूपीए सरकार ने जस्टिस सच्चर कमेटी और जस्टिस मिश्रा कमिशन बनाया था। इनकी सिफारिशों में अल्पसंख्यकों से सम्बंधित कई ऐसे मुद्दे थे जिनको ईमानदारी से क्रियान्वित किया जाए तो मुस्लिम सहित सभी अल्पसंख्यकों का भला हो सकता है। इनमें सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में 15 प्रतिशत अल्पसंख्यकों को आरक्षण देना तथा साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक कानून बनाना भी शामिल है। लेकिन इन दोनों मुद्दों पर कमोबेश सभी विपक्षी पार्टियां ख़ामोश हैं।
मुस्लिम समुदाय से सम्बंधित मुद्दों पर विपक्षी पार्टियों की खामोशी से मुसलमान आज अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहा है। वो विपक्षी पार्टियों से पूछ रहा है कि सेक्यूलरिज्म क्या यही है कि सत्ता हासिल करने के लिए किसी बड़े समुदाय को पूरी तरह से नजर अंदाज़ कर दिया जाए ? यक़ीन मानिए हम ज़मीनी सच्चाई बता रहे हैं कि विपक्षी पार्टियों के इस रवैए से मुस्लिम समुदाय में जबरदस्त नाराजगी है। इस नाराजगी के कारण अब भाजपा के डर से मुसलमानों का सम्पूर्ण वोट विपक्षी पार्टियों को नहीं मिलेगा, मुसलमानों का बड़ा वोट उधर जाएगा, जो उनके मुद्दों पर बात करेंगे चाहे वे कोई भी हों।
(09/08/2023)
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-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।
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