मुसलमानों को तथाकथित सेक्यूलर पार्टियां तवज्जोह क्यों नहीं देती हैं ?

मुसलमानों को तथाकथित सेक्यूलर पार्टियां तवज्जोह क्यों नहीं देती हैं ?

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अमूमन हर मुसलमान चाहे वो सियासी हो या गैर सियासी एक बात हर जगह कहता मिलता है कि खुद को सेक्यूलर कहने वाली पार्टियां भी अब मुसलमानों को कोई तवज्जोह नहीं देती हैं। यह पीड़ा इन सेक्यूलर पार्टियों के मुस्लिम नेताओं की भी है और मुस्लिम अधिकारियों की भी। सवाल यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। आज देश में मुस्लिम वोटर की जो दुर्गत हुई है वैसी तो 1952 के प्रथम आम चुनाव में भी नहीं हुई थी, जब देश विभाजन के ज़ख्म भरे भी नहीं थे। 2014 से पहले हर चुनाव में चाहे वो लोकसभा का हो या किसी राज्य की विधानसभा का चुनाव मुस्लिम वोटर को विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की तरफ से पूरी तवज्जोह (ध्यान देना) मिलती थी। लेकिन 2014 के बाद स्थिति पूरी तरह से बदल गई। सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ ?


भारतीय जनता पार्टी (भाजपा ) जिसका पूरा राजनीतिक धरातल मुस्लिम विरोध के कारण स्थापित हुआ है और भाजपा शुरू से ही वो मुद्दे बेबाकी व झूठ फरेब से उठा रही है जो मुसलमानों के खिलाफ हों और इससे हिन्दू वोटर का ध्रुवीकरण हो। भाजपा की इस रणनीति को समझने और समय रहते उसी की भाषा में जवाब देने के मामले में अपने आपको सेक्यूलर कहने वाली पार्टियां मात खा गई, अगर यह कहें तो भी ग़लत नहीं होगा कि इन्होंने मात नहीं खाई बल्कि बिना मुकाबले के ही मैदान छोड़ दिया।

भाजपा ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में यह दिखा दिया कि वो कैसे ध्रुवीकरण के जरिए पूर्ण बहुमत से भी अधिक सीटें जीत सकती है। इसका कारण यह है कि 1996 के चुनाव से 2004 के चुनाव तक करीब 6 साल अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री रहे, इसमें कोई शक नहीं है कि वे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हजार गुणा विद्वान और जन हितैषी थे, लेकिन उनके नेतृत्व में भी भाजपा को किसी भी चुनाव में 200 सीट भी नहीं मिली, वे तीन बार गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री बने। तो फिर 2014 में ऐसा क्या हो गया कि मोदी के नेतृत्व में 282 सीटों का स्पष्ट बहुमत मिल गया ?

इसका जवाब यह है कि अटल जी के समय देश की सेक्यूलर कहीं जाने वाली पार्टियों में वो लीडरशिप मौजूद थी जो साम्प्रदायिक ताकतों के आंख में आंख डालकर सड़क से संसद तक उन्हें खुलेआम खरी खोटी सुनाती थी, लेकिन 2010 के बाद ऐसी लीडरशिप का खात्मा होना शुरू हो गया, खुद को सेक्यूलर कहने वाली पार्टियां डर गई या खुद भी धीरे-धीरे साॅफ्ट कम्यूनल हो गई, इसके लिए यह पार्टियां खुद ही जिम्मेदार हैं कोई दूसरा नहीं, जिसकी सजा आज न सिर्फ यह पार्टियां बल्कि पूरा देश भुगत रहा है।

2014 के बाद सेक्यूलर कहीं जाने वाली सभी पार्टियों ने मुस्लिम मुद्दों और मुसलमानों की पीड़ा पर मुंह खोलना बंद कर दिया, इन्होंने खुद को साॅफ्ट हिन्दुत्व के नाम पर साबित करने के लिए भांति भांति के स्वांग रचने शुरू कर दिए। जिसके पीछे उद्देश्य सिर्फ यह है कि मुस्लिम वोट तो हमें भाजपा के डर से मिल ही जाएंगे और हिन्दू वोट हमारे इस स्वांग से मिल जाएंगे इतने में सत्ता हमारी हो जाएगी। सियासी तौर पर उनकी यह रणनीति सही है या ग़लत, यह एक अलग बहस का मुद्दा है। लेकिन इससे सेक्यूलर पार्टियां बेनकाब हो गई, वे सत्ता के लिए भाजपा की तरह कुछ भी स्वांग रचने के लिए तैयार हैं। इनके इस रवैए से सबसे ज्यादा नुकसान देश को हो रहा है। इनके इस रवैए से मुस्लिम वोटर अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

आज अमूमन हर मुसलमान चाहे वो सियासी हो या गैर सियासी एक बात हर जगह कहता मिलता है कि खुद को सेक्यूलर कहने वाली पार्टियां भी अब मुसलमानों को कोई तवज्जोह नहीं देती हैं। यह पीड़ा इन सेक्यूलर पार्टियों के मुस्लिम नेताओं की भी है और मुस्लिम अधिकारियों की भी। इन पार्टियों के मुस्लिम नेता कहते हैं कि पद और टिकट देने के मामले में ही नहीं बल्कि बैनर पोस्टर पर मुस्लिम नेताओं की फोटो लगाने और मंच पर बैठाने से भी अब सेक्यूलर पार्टियां कतरा रही हैं। सवाल यह है कि यह स्थिति पैदा क्यों हुई और इसका जिम्मेदार कौन है ?

हमारा जवाब है कि यह स्थिति मुसलमानों ने खुद पैदा की है और इसके जिम्मेदार मुसलमानों के नाम पर सियासत करने वाले तथाकथित सेक्यूलर नेता, उनके नाअहल (अयोग्य) समर्थक, मुसलमानों के सामाजिक व मजहबी रहनुमा हैं, जिन्होंने मुसलमानों को सिर्फ़ एक वोट बैंक और सत्ता की सीढ़ी बनाकर लावारिस छोड़ दिया है। जब तक मुसलमान किसी के डर से और किसी के बिना कुछ दिए पीछे भाग कर वोट देता रहेगा तब तक उसकी यही हालत रहेगी।

2008 या 2013 के राजस्थान विधानसभा के चुनाव का एक वाकिया है। एक गांव में वोटिंग का बहिष्कार करने का कुछ लोगों ने बैनर लगा दिया और कहा कि हमारे गांव में पोलिंग पार्टी भेजने की कोई आवश्यकता नहीं है, हम किसी को वोट नहीं देंगे, क्योंकि हमारे गांव के विकास पर कोई तवज्जोह नहीं दी गई है। इसका असर यह हुआ कि आनन फानन में अधिकारी और विभिन्न उम्मीदवार व नेता उस गांव में पहुंचे तथा गांव वालों को वोट डालने के लिए मनाया। इस वाक़िए को लिखने का उद्देश्य यह है कि जब तक आप वोट की चोट नहीं करोगे या बिना मांगे पीछे भागकर वोट डालते रहोगे आपको कोई तवज्जोह नहीं मिलेगी। लोकतंत्र में तवज्जोह उसे मिलती है, जो वोट उस उम्मीदवार को डाले जो उसके भले की बात करता हो, चाहे उसका वोट हार में पड़े या जीत में।

आप देखिए केरल, तेलंगाना और यूपी में मुसलमानों की अच्छी खासी संख्या है। लेकिन केरल व तेलंगाना में हर सियासी पार्टी मुसलमानों को तवज्जोह देती है और यूपी में कोई नहीं, क्यों ? क्योंकि केरल व तेलंगाना का मुस्लिम वोटर न किसी के डर से वोट देता है और ना ही किसी के पीछे भागकर वोट देता है, वो अपने वोट का सियासी मोल भाव करना जानता है और इसी कारण उसे हर पार्टी तवज्जोह देती है। अगर लोकतंत्र में तवज्जोह चाहिए तो उसे वोट दीजिए जो आपके भले की सरेआम बात करता है चाहे वो उम्मीदवार किसी भी पार्टी का हो यहां तक कि निर्दलीय ही क्यों नहीं हो। चाहे वो चुनाव जीतता भी नजर नहीं आ रहा हो, लेकिन वो चुनाव हार कर भी आपके हित में खड़ा रहेगा। अगर आप बिना मांगे पीछे भागकर या किसी पार्टी के डर से वोट करते रहेंगे तो आपको कभी भी कोई सियासी पार्टी तवज्जोह नहीं देगी।

मुसलमानों को जाट, ब्राह्मण, राजपूत, एससी-एसटी आदि समुदायों से सीखना चाहिए कि वे अपने वोट का मोल भाव कैसे करते हैं ? कैसे उन्हें सभी राजनीतिक पार्टियां तवज्जोह देती हैं ? यह समुदाय किसी पार्टी विशेष के न तो बंधुआ वोटर हैं और ना किसी के डर से या किसी को पीछे भाग कर वोट देते हैं। मुसलमानों को सियासी तवज्जोह चाहिए तो उन्हें सियासी गुलामी से मुक्त होना पड़ेगा और गली गली में घूम रहे जमीर फरोश सियासी दलालों की बातें सुनकर खौफजदा होने की बजाए अपने दिलो दिमाग से सियासी फैसला करना पड़ेगा, वरना हमेशा यही हालत रहेगी, कोई तवज्जोह नहीं मिलेगी।
(10/09/2023)
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