राहुल गांधी के संघर्ष और सोच पर गहलोत जैसे नेता पानी फेर सकते हैं !

राहुल गांधी के संघर्ष और सोच पर गहलोत जैसे नेता पानी फेर सकते हैं !

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। देश का संविधान खतरे में है, लोकतंत्र खतरे में है, तानाशाही आ चुकी है, सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है, फासीवाद अजगर की तरह देश को जकड़ रहा है। ऐसे जुमले हर वो आदमी पिछले सात आठ से बोल रहा है जिसे देश की चिंता है, जिसे गंगा जमुनी तहज़ीब यानी मिलीजुली संस्कृति पसंद है, जो चाहता है कि देश में भाईचारा फले फूले, हर किस्म की नफ़रत का खात्मा हो, हर जगह मुहब्बत की दुकान खुले और नफ़रत के कारखानों के शटर डाउन हों।


यह सब काम राजनीतिक विषय हैं, क्योंकि समस्या राजनीतिक है तो उसका समाधान भी राजनीतिक ही होगा, राजनीतिक समाधान तब होगा जब देश की सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में आएगी, जो पूरी ताक़त से नफरती कारखानों के शटर डाउन कर दें। विपक्ष की बात करें तो एक ही चेहरा है जो नफरती कारखानों का शटर डाउन करने और मुहब्बत की दुकान पूरे देश में खोलने के लिए दिन रात लगा हुआ है और उसने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है।

उस चेहरे का नाम राहुल गांधी है, जो केन्द्रीय जांच एजेंसियों, बिकाऊ व नफरती मीडिया, टुच्चे राजनेताओं और चवन्ने व फर्जी आईडी वाले आईटी सेल के नफरती दलालों के लगातार निशाने पर रहा है। इसके बावजूद राहुल गांधी एक महान योद्धा की तरह लगातार इन सबसे संघर्ष करते हुए आगे बढ़ता गया, इसी क्रम में कन्याकुमारी से कश्मीर तक की भारत जोड़ो यात्रा इस शख्स से निकाली, दर दर पैदल चला, जनता का दुख दर्द समझने और उसका इलाज करने की कोशिश की।

इस शख्स की दादी और पिता (पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी) ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, छोटी सी उम्र में कलेजा फटने वाली परिवार में दो शहादतें देखकर भी यह शख्स न किसी से डरा और ना ही ग़लत के आगे कभी झुका। अपने संघर्ष की यात्रा लगातार जारी रखी, सोच को परवान चढ़ाया तथा देश को गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद, ख़ान अब्दुल गफ्फार खान आदि की उस विचारधारा जिसमें भाईचारे का मजबूत फेविकोल हो और सभी का कल्याण हो, के पथ पर आगे बढ़ने के लिए अपनी कमर कस ली।

यकीनन इस शख्स (राहुल गांधी) की सबसे बड़ी विरोधी फासिस्ट ताकतें हैं, जो नहीं चाहती कि देश में अमन व भाईचारा रहे। लेकिन इस शख्स के सबसे बड़े विरोधी वे लोग भी हैं जो गुणगान तो राहुल गांधी का करते हैं, नाम कांग्रेस का लेते हैं, स्वांग गांधी व नेहरू का रचते हैं, लेकिन हैं सिर्फ सत्ता के भूखे लालची, जो सत्ता को छोड़ना नहीं चाहते, दूसरे को मौका देना नहीं चाहते, जिनके हाथ से कुछ जाता दिखे तो पार्टी आलाकमान (कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व) को सरेआम ज़लील करने की कोशिश भी करते हैं, इन लोगों ने ऐसे ऐसे चेले पैदा कर रखे हैं, जिनके लिए टिकट, चुनाव और सत्ता ही सब कुछ है, इनके लिए राहुल गांधी का संघर्ष और मिशन कुछ नहीं है।

पूरे देश में मुहब्बत की दुकान तब मजबूती से खुलेगी जब 2024 का लोकसभा चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में जीता जाएगा। 2024 बहुत बड़ा मिशन है तथा यह मिशन राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में हो रहे विधानसभा चुनाव जीतने से ही सम्भव होगा। इस मिशन की हवा चारों राज्यों में बनी हुई है, रोड़ा हैं तो सत्ता के लालची खुद कुछ कांग्रेसी नेता हैं, जिनको राहुल गांधी के मिशन की बजाए सिर्फ खुद की सत्ता चाहिए, अगर सत्ता नहीं मिले तो थाली में रखी सत्ता की खीर को बिखेर दी जाए। इस मानसिकता के नेता जिनकी कोई पहचान और छवि नहीं थी, जो राहुल गांधी के परिवार की चौखट पर सज्दे करके यहां तक पहुंचे हैं और आज उसी चौखट को आंख भी दिखा रहे हैं और दबाव भी बना रहे हैं, ऐसे नेता राहुल गांधी के मिशन पर पानी भी फेर सकते हैं। अगर समय रहते इनकी लगाम नहीं कसी गई तो।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी इसी कड़ी के एक नेता हैं, जिन्हें 45 साल के राजनीतिक जीवन में वो सब कुछ मिला, जो उनके साथ वाले किसी भी नेता को नहीं मिला, यह राहुल गांधी के परिवार की देन है। आज गहलोत तीन बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद बार बार कह रहे हैं कि "मैं मुख्यमंत्री का पद छोड़ना चाहता हूं, लेकिन यह पद मुझे नहीं छोड़ना चाहता और ऐसा लग रहा है कि आगे भी यह पद मुझे छोड़ना नहीं चाहता है।" उन्होंने राजस्थान मिशन 2030 शुरू किया है, मतलब सीधा है कि मैं चौथी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहा हूं और 2028 तक तो किसी का नम्बर नहीं आना है चाहे कोई कुछ भी कर ले। इनके लिए राहुल गांधी का मिशन 2024 कोई मायने नहीं रखता है। कांग्रेस के ऐसे नेताओं के लिए राहुल गांधी का संघर्ष और सोच बेमानी है, इन्हें तो सिर्फ सत्ता चाहिए राहुल गांधी का मिशन नहीं। ऐसे नेताओं ने कांग्रेस के नाम पर सिर्फ सत्ता भोगी है, जब चुनाव आए तो अपने चेलों के लिए जी जान लगा दी और पार्टी की नैय्या डूबो दी, इतिहास इसका साक्षी है। सदियों की कहावत आज भी जिन्दा है "जब जगे तभी सवेरा।"
(24/10/2023)
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