दर दर ठोकरें खाते उम्मीदवार...
दर दर ठोकरें खाते उम्मीदवार...
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान में 25 नवम्बर को विधानसभा चुनाव हैं। कांग्रेस, भाजपा, छोटी मोटी सभी पार्टियों के उम्मीदवारों और निर्दलीयों ने अपने आपको चुनाव में झोंक रखा है। सबसे ज्यादा कांग्रेस व भाजपा के उम्मीदवार पसीना बहा रहे हैं। ऐसा करना भी चाहिए क्योंकि चुनाव जो जीतना है। कांग्रेस के विधायकों ने पांच साल सत्ता के मजे लिए, लोगों की नाराज़गी पर कोई खास ध्यान नहीं दिया, अब वे हर उस दर पर ठोकर खा रहे हैं, जहां से उसे जीत की सम्भावना लग रही हो। भाजपा के विधायक या प्रत्याशी भी दर दर ठोकरें खा रहे हैं, क्योंकि पांच साल वे विपक्ष होने की जिम्मेदारी निभाने की बजाए भाईसाहबों के चक्कर लगाते रहे, भाईसाहबों ने टिकट तो दिला दी, लेकिन वोट तो जनता के पास हैं, जहां वे गए ही नहीं।
निर्दलीय और बागी उम्मीदवार भी मैदान में खम ठोक कर हर उस चौखट को चूम रहे हैं जहां से उसे सांत्वना पुरस्कार मिल जाए। सवाल यह है कि उम्मीदवारों ख़ासकर सत्ताधारी दल के उम्मीदवारों से जनता नाराज़ क्यों है ? इसकी एक ही वजह है, सत्ताधारी दल कांग्रेस के विधायक और उनके चेले अपने आपको इलाके का मालिक समझने लग गए। मनचाहे अधिकारी लगाकर जो मन में आया वो किया, जिसका चाहा भला किया और जिसे चाहा उसको पानी के पेंदे बैठा दिया। लोग विधायकों की निरंकुशता और उनके चेलों के कारनामों के अब हिसाब चुकता कर रहे हैं।
तमाम उम्मीदवारों में कांग्रेस व भाजपा के अधिकतर उम्मीदवार दिन में जन सम्पर्क और सभाएं कर रहे हैं और फिर रात दो तीन बजे तक खामोशी से इस घर और उस घर जाकर विरोधियों के आगे पुरानी बातों को आई गई कर साथ देने की गुहार लगा रहे हैं। बहुत से उम्मीदवारों को इसमें सफलता भी मिल रही है, लेकिन जिन उम्मीदवारों का मैनेजमेंट फेल है या उनमें अभी भी सत्ता की अकड़न बाकी है वे सब कुछ दांव पर लगाकर भी हार की तरफ बढ़ रहे हैं। लोगों ने उनकी रड़क निकालने के लिए पूरी तरह से कमर कस ली है।
अगर यही विधायक लगातार जनता के सम्पर्क में रहते, जो लोग उनकी आलोचना कर रहे थे उनकी बातों पर गौर करते तथा जो लोग इनसे किसी भी वजह से नाराज़ थे तो उनको समय पर मनाने की कोशिश करते, तो आज ऐसे दिन नहीं देखने पड़ते। राजस्थान में कई विधायक ऐसे हुए हैं, जो हल्की सी नाराज़गी की खबर को गम्भीरता से लेते थे और उसका समाधान तुरंत निकालते थे, वे जीवन में एकाध बार को छोड़कर कभी चुनाव नहीं हारे। आज भी कुछ विधायक ऐसे हैं, जिन पर उनकी जनता भरोसा करती है, वे किसी भी प्रकार की हल्की सी नाराज़गी का भी उसी समय समाधान कर समापन कर देते हैं, उनके लिए चुनाव लड़ना और जीतना बहुत आसान है, बाकी अकड़ू तो ठोकरें खाकर ही दर बदर होने हैं।
(09/11/2023)
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