वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत का अगला कदम क्या होगा ?
वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत का अगला कदम क्या होगा ?
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खैर, अब असली मुद्दे पर आते हैं। चुनाव बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का अगला कदम क्या होगा ? सियासी गलियारों में जो चर्चा है वो यह है कि दोनों राजस्थान की सत्ता अगले दस साल तक तो नहीं छोड़ेंगे, इन्हें चाहे कुछ भी करना पड़े। अब "यह कुछ भी करना पड़े, क्या है" इसका जवाब थोड़ा बाद में। पहले यह चर्चा कि गहलोत हर हाल में सत्ता वसुंधरा राजे को हस्तांतरण करने का प्रयास करेंगे। अगर वे इस प्रयास में सफल नहीं हुए तो वसुंधरा राजे गहलोत की सत्ता बरकरार रखने का प्रयास करेंगी। चाहे दोनों को किसी भी हद तक जाना पड़े, क्योंकि दोनों नहीं चाहते कि पिछले 25 साल राजस्थान में जो अंधेरगर्दी और लूटमार हुई है उसकी कोई जांच हो और उनका कोई चेला या वे स्वयं इसमें लपेटे जाएं।
कुछ भी करना पड़े, उसका एक जवाब तो यह सुनने में आ रहा है कि गहलोत और वसुंधरा दोनों चाह रहे हैं कि कांग्रेस और भाजपा 90 के आस पास ही रहें, यानी पूर्ण बहुमत दोनों ही पार्टियों को नहीं मिले। फिर मैनेजमेंट के खेल में इन दोनों से बड़ा कोई खिलाड़ी नहीं है, खेल का परिणाम अपने आप इनके फेवर में हो जाएगा। कुछ भी करना पड़े, उसका दूसरा जवाब यह सुनने को मिल रहा है कि अगर कांग्रेस या भाजपा किसी को भी बहुमत तो मिलता है, लेकिन बड़ा बहुमत नहीं मिलता है तथा दोनों को अगर इनके आलाकमान ने सत्ता से वंचित करने का प्रयास किया, तो फिर यह अपनी अपनी पार्टी को तोड़ कर आलाकमान को उसकी हैसियत दिखा देंगे।
कुछ भी करना पड़े, उसका तीसरा जवाब यह सुनने को मिल रहा है कि गहलोत ने 2008 और 2018 के चुनाव में जो रणनीति बनाई कि कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिले और फिर मैं निर्दलीयों और छोटी पार्टियों के सहयोग से मुख्यमंत्री बन जाऊं, वो फार्मूला पूरी तरह वसुंधरा राजे को सीखा दिया है। दोनों इसी फार्मूले के तहत पूरी तरह से सक्रिय हैं। राजस्थान की 200 में से करीब 50 सीटों पर त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय मुकाबला साफ नजर आ रहा है, कुछ सीटों पर तो पांच छह मजबूत उम्मीदवार मैदान में हैं। कोई निर्दलीय तो कोई छोटी पार्टी के सिम्बल पर। चर्चा है कि इनमें अधिकतर गहलोत और वसुंधरा के सम्पर्क में हैं। इनमें से करीब 35 के जीत की सम्भावना बताई जा रही है। हनुमान बेनीवाल, मायावती, केजरीवाल और ओवैसी के उम्मीदवार भी मैदान में हैं, जो किसकी खटिया बिछाएंगे और किसकी खड़ी करेंगे यह भी मतगणना के दिन स्पष्ट हो जाएगा।
इस लेख के प्रथम पैराग्राफ में यह भी लिखा गया है कि राजस्थान में सत्ता की चाबी किसी ऐसे आदमी के पास भी आ सकती है, जिसके बारे में किसी ने सोचा तक नहीं। इसकी चर्चा यह है कि अगर छोटी पार्टियों के उम्मीदवार व निर्दलीय कम जीते और सिर्फ वोट कटुआ साबित हुए तो भाजपा बड़ा बहुमत लेकर चुनाव जीत सकती है, फिर यहां भी कोई खट्टर या फड़नीस जैसा बिल्कुल नया चेहरा लेकर भाजपा आ सकती है। लेकिन इसकी सम्भावना बहुत कम है, क्योंकि वसुंधरा राजे ऐसा कभी नहीं होने देंगी, क्योंकि उनके करीब 80 समर्थकों को भाजपा ने टिकट दिया है और इनमें से करीब 55 के जीत की पूरी सम्भावना है।
गहलोत के बारे में दिल्ली में चर्चा यह है कि उनके रवैए के कारण राहुल गांधी ने राजस्थान में दिलचस्पी लेनी ही छोड़ दी है, वे पूरी तरह से तेलंगाना, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सक्रिय हैं, क्योंकि उन्हें इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की जीत पक्की नज़र आ रही है, राजस्थान को वे अपने सर्वे में कमजोर मान रहे हैं तथा गहलोत और पायलट के व्यवहार से वे नाराज़ हैं, इसलिए उन्होंने टिकटों के मामले में भी गहलोत व पायलट को एक तरह का फ्री हैंड दे दिया था कि "देखते हैं तुम कितने विधायक लेकर आते हो ?"
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