राजस्थान में कांग्रेस का यह हाल कैसे हुआ ?

राजस्थान में कांग्रेस का यह हाल कैसे हुआ ?

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कांग्रेस की इस हार का पहले से ही सबको मालूम था, सिर्फ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके कुछ चेलों ने सम्भावित जीत का भ्रम बना रखा था, जो 3 दिसम्बर को मतगणना के दिन टूट गया।
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राजस्थान में न कांग्रेस हारी है और ना ही पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व, यहां तो सिर्फ अशोक गहलोत चुनाव हारे हैं, जिन्होंने कभी भी कांग्रेस को जीत नहीं दिलवाई।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान में विधानसभा चुनाव के दिन बहुत से लोग मायूस हो गए, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि कांग्रेस जीत रही है और अशोक गहलोत चौथी बार मुख्यमंत्री बन रहे हैं, जबकि धरातल की सच्चाई कांग्रेस को चुनाव हरवा रही थी। लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके नजदीकी चेलों और उनके द्वारा स्थापित आईटी सेल कार्यकर्ता कांग्रेस को पूर्ण बहुमत के साथ चुनाव जितवा रहे थे। गहलोत खुद 156 सीटों से अधिक की जीत का दावा कर रहे थे। गहलोत और उनके चेलों ने पूरी तरह एक भ्रम बना रखा था, जो 3 दिसम्बर को मतगणना के दिन 12 बजे ही टूट गया, लोग नर्वस हो गए, उनके साथ भावनात्मक ठगी हो गई।


मतगणना के दिन इस हार के ताबूत में कील मुख्यमंत्री गहलोत के ओएसडी लोकेश शर्मा ने ठोक दी, उन्होंने पांच साल सत्ता के मजे लिए, वे गहलोत के इर्द-गिर्द बने नजदीकी घालमेल वाले सर्किल का पार्ट रहे। उन्होंने मतगणना के दिन सभी नतीजों की घोषणा नहीं हुई उससे पहले ही सोशल मीडिया पर एक लम्बा लेख लिखकर इस हार के लिए पूरी तरह से गहलोत को जिम्मेदार ठहरा दिया। लेकिन सच्चाई इतनी ही नहीं है सच्चाई यह है कि इस हार के गहलोत और उनके सभी चेले जिम्मेदार हैं, जिन्होंने सबको अंधेरे में रखा और सत्ता के मजे उड़ाए, इनमें लोकेश शर्मा खुद भी शामिल हैं।


हमने इक़रा पत्रिका के 25 जून 2023 के अंक में कवर स्टोरी प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था, "दूध-दही की नदियां बहा दें तो भी गहलोत अपनी सरकार को रिपीट नहीं कर सकते ?" यह हमने तब लिखा था, जब गहलोत आए दिन कोई घोषणा कर रहे थे, विभिन्न समाजों को विकास बोर्ड नाम का झुनझुना थमा रहे थे, चारों ओर चेले गहलोत सरकार के रिपीट होने की झूठी हवा बना रहे थे। गहलोत ने दर्जनों सामाजिक बोर्ड बनाए, कई लोगों को चुनाव आचार संहिता लागू होने वाले दिन तक आनन फानन में बैक डेट में राजनीतिक नियुक्तियों का लोलीपॉप थमाया।

देश के इतिहास में पहली बार एक साथ बिना किसी विशेष तैयारी के 20 के करीब नए जिले बना दिए। भांति भांति की योजना और गारंटी शुरू कर दी, लेकिन परिणाम हार का ही आया। नव गठित जिलों की कई सीट भी कांग्रेस हार गई। महंगाई राहत कैम्प कोई काम नहीं आया। जिसकी वजह एक ही है कि गहलोत हर काम लटकाए रखते थे, हर काम व घोषणा आखरी साल करते हैं, जिससे उसका क्रियान्वयन ढंग से नहीं होता है। चाहे 2003 का हाल देखें या फिर 2013 और 2023 का, गहलोत का हमेशा एक जैसा ही रवैया रहा है।

गहलोत ने पार्टी आलाकमान पर दबाव बनाकर अधिकतर सीटें विधायकों और पूर्व प्रत्याशियों को दिलवाए, पार्टी आलाकमान को सरकार रिपीट करवाने का भरोसा दिया, आलाकमान ने भी सब कुछ गहलोत के हवाले कर दिया। सरकार संचालन, टिकट वितरण और चुनाव संचालन सब कामों में आलाकमान ने गहलोत को फ्री हैंड दे दिया, फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।

गहलोत ने एकाध को छोड़कर अपने सभी विधायकों को टिकट दिलवा दिया। 98 विधायक मैदान में उतरे उनमें से 63 चुनाव हार गए। 25 मंत्री मैदान में उतरे इनमें से 17 पूर्व विधायक बन गए। वजह एक ही थी कि विधायकों व मंत्रियों के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा था, गहलोत ने सभी विधायकों और मंत्रियों को लूट खसोट का एक तरह से लाइसेंस दे रखा था। राजस्थान के इतिहास में ऐसी भ्रष्ट सरकार पहले कभी नहीं रही, जिसने गांधीवाद व सेक्यूलरिज्म का मुखौटा पहन कर जनता को लूटा तथा उस सरकार में हर विधायक और विधायकों के चहेते अधिकारी अपनी मनमर्जी कर रहे थे, दलालों के मजे थे और जनता इन सबसे दुखी थी, प्रताड़ित थी। परिणाम सबके सामने आ गया।

कांग्रेस के सिम्बल पर जो 69 विधायक जीते हैं, उनमें भी अधिकतर उन सीटों से जीते हैं, जहां मुस्लिम वोटर 20 हजार से ऊपर है। क्योंकि गहलोत के गांधीवाद और सेक्यूलरिज्म के चक्कर में सिर्फ मुसलमान ही आ सकता है, जिसे कोई ठौर ठिकाना नहीं है। पार्टी आलाकमान अगर गहलोत की जगह एक साल पहले किसी और को मुख्यमंत्री बना देता और विधायकों में से 60-70 की टिकट काट देता तो कांग्रेस की जीत को कोई रोकने वाला नहीं था, क्योंकि भाजपा तो वैसे ही गुटबाजी के जंजाल में फंसी हुई थी, उसकी चुनाव में कोई विशेष तैयारी नहीं थी। भाजपा की जीत अशोक गहलोत की हार ने सुनिश्चित की है।

राजस्थान के विधानसभा चुनाव इस बार कांग्रेस के लिए जीतना बहुत आसान था, लेकिन गहलोत और उनकी मंडली ने सब कुछ चौपट कर दिया। इस चुनाव में न कांग्रेस पार्टी हारी है और ना ही कांग्रेस की विचारधारा और पार्टी आलाकमान, इस चुनाव में सिर्फ और सिर्फ अशोक गहलोत और मंडली चुनाव हारी है तथा यही इस हार के जिम्मेदार हैं।
(09/12/2023)
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