गहलोत की हेकड़ी और पाखंड के कारण बनी राजस्थान में भाजपा सरकार

गहलोत की हेकड़ी और पाखंड के कारण बनी राजस्थान में भाजपा सरकार

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-अर्जुन देथा
जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बने कई दिन हो गए, अब उसका सियापा हो रहा है। सबसे ज्यादा सियापा कांग्रेस पार्टी में हो रहा है, क्योंकि उन्हें लगता था कि राजस्थान में सरकार पुनः बनाई जा सकती थी। जिन कारणों को गिनाया जा रहा है, वो असली कारण हार के नहीं हैं। हार के असली कारण पर अभी भी कोई अंगुली नहीं रख रहा है। सब दाएं बाएं की बातें हो रही हैं। स्वयं अशोक गहलोत इसका कारण उनकी योजनाओं को जनता को नहीं समझा पाना और ध्रुवीकरण बता रहे हैं।

इस हार का पहला पहला कारण आंशिक सत्य है, लेकिन दूसरा कारण सफेद झूठ है। यह चुनाव राजस्थान में हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण का चुनाव कतई नहीं था, क्योंकि ऐसा कुछ वास्तव में जमीन पर था ही नहीं, वास्तविकता यह है कि इस चुनाव में भी राजस्थान के कई इलाकों में हिंदुओं ने मुसलमान को और मुसलमानों ने हिंदुओं को ही नहीं भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों अथवा भारतीय जनता पार्टी के कुछ चुनाव चिन्ह रहित विद्रोही उम्मीदवारों को वोट दिया है।



मैं यह बात पूरे विस्तार से और आंकड़ों के साथ बता सकता हूं, लेकिन अशोक गहलोत इसकी कोई जिम्मेदारी लेने को कतई तैयार नहीं हैं। क्योंकि उनकी राजनीति हमेशा झूठ पाखंड, मनी मैनेजमेंट, मीडिया मैनेजमेंट और दिल्ली मैनेजमेंट के आधार पर रही है। वे कभी भी जन नेता नहीं थे। अशोक गहलोत हमेशा तिकड़म के नेता रहे हैं, अभी भी वही हैं। गहलोत अभी सबको बेवकूफ समझते हुए सब की आंखों में धूल झोंकते हुए चुनाव की हार का असली कारण छुपाना चाहते हैं, इसलिए ध्रुवीकरण और योजनाओं को नहीं समझा पाना इस हार के कारण बता रहे हैं।

कोलायत, खाजूवाला, पोकरण, लक्ष्मणगढ़, चूरू, कामां आदि विधानसभा क्षेत्रों में मुसलमानों ने भारतीय जनता पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों को कमल के फूल पर वोट दिया है। इसके अलावा बाड़मेर, चित्तौड़गढ़, डीडवाना आदि में भाजपा में रहे उम्मीदवारों को वोट दिया है, हां बेशक डीडवाना के उम्मीदवार भाजपाई पृष्ठभूमि वाले होते हुए भी मुसलमान थे। यह कुछ उदाहरण मैं प्रथम दृष्टि से दे रहा हूं विश्लेषण में और भी जगह यह बात साबित की जा सकती है तथा पोलिंग बूथ के आधार पर साबित की जा सकती है, आंकड़ों के साथ मैं साबित कर सकता हूं।

फिलहाल मैं दुर्घटनाग्रस्त होकर बिस्तर हवाले हूं इसलिए यह काम विशेष अध्ययन करके और राज्य भर में संपर्क करके प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की पुख्ता जानकारी और विस्तृत जानकारी के आधार पर कह रहा हूं। इसलिए कहा जा सकता है कि राजस्थान में हिंदू मुस्लिम जैसा कोई ध्रुवीकरण नहीं था। राज्य की सबसे अधिक मुस्लिम मतदाताओं वाली सीट भरतपुर जिले की कामां है, जहां गहलोत मंत्रिमंडल की सदस्या जाहिदा खान भारी जन विरोध के बावजूद गहलोत की चहेती उम्मीदवार थी। वहां उसकी बुरी हार हुई और वो तीसरे नम्बर पर रही। यहां भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी नोक्षम चौधरी को एक पूरी बड़ी मेव मुस्लिम गोत्र का वोट मिल गया और वह जीत गई।

अशोक गहलोत सत्ता में रहते हुए लगातार 5 वर्ष अपने ही कनिष्ठ साथियों और सहयोगियों को अभद्र भाषा से संबोधित करते रहे। लगातार उन्हें अपमानित करते रहे, लगातार उनकी उपेक्षा करते रहे और प्रदेशभर के पार्टी कार्यकर्ताओं को भी लगातार निराश करते रहे। उन्होंने पार्टी संगठन कभी बनने ही नहीं दिया, चुनाव की घोषणा से कुछ माह पहले तक आधे राजस्थान में कांग्रेस पार्टी का कोई संगठन नहीं था। चुनाव से ठीक पहले कुछ जिला इकाइयां वगैरह बनाई गई, लेकिन किसी ने काम शुरू किया, किसी ने नहीं किया। किसी प्रकार का संगठन में तालमेल या एकरूपता नहीं थी, तो कौन चुनाव लड़ता ? कौन बूथ पर खड़ा रहता ? कौन मतदाताओं को कांग्रेस के पक्ष में तैयार करता और कौन उन्हें बूथ पर लाकर वोट डलवाता ?

अशोक गहलोत जब भी सत्ता में रहे हैं, उन्होंने सत्ता और संगठन हमेशा अपने अंगूठे के नीचे रखने का काम किया है। वे कभी भी सामूहिक नेतृत्व अथवा सामूहिक कार्य प्रणाली के पक्षधर नहीं रहे हैं। वे एक तानाशाही मनोवृति के व्यक्ति हैं और अपनी हेकड़ी में अपने हिसाब से चहेते अधिकारियों और चाटुकारों के घेरे में रहते हैं और इसी अंदाज में राज चलाते हैं। अशोक गहलोत ने रेवड़ी बांटने के अंदाज में जिले बना दिए और अधिकतर जिलों में बुरी तरह से हार गए। अपने चहेते उम्मीदवारों के होते हुए दुर्गति को प्राप्त हुए, उनसे कोई पूछे की वर्षों से जिलों की मांग करने वाले इलाकों को छोड़कर दूदू जैसे कस्बे को पंचायत स्तर से सीधा जिला बनाने का उन्होंने क्या राजनीतिक लाभ प्राप्त किया ? जहां उनके उम्मीदवार बाबूलाल नागर बुरी तरह से हार गए।

अशोक गहलोत ने अपने सत्ताकाल में क‌ई यूआईटी को लूट का अड्डा बना दिया और सैकड़ों करोड़ रुपए की वहां पर लूट हुई। कितनी किसको मिली यह जांच का विषय है ? लेकिन उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को वहां का अध्यक्ष अथवा ट्रस्ट का सदस्य बनने का मौका नहीं दिया। यही हाल अन्य निकायों का रहा। इसी कारण कार्यकर्ता बेहद निराश थे, कांग्रेस सरकार का अच्छा संदेश जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं में ही नहीं था तो जनता में कैसे होता और जनता में उनकी योजनाओं को कौन प्रचारित करता ? इस सवाल का जवाब भी स्वयं अशोक गहलोत को देना चाहिए किसी और को नहीं।

अशोक गहलोत का जो वैमनस्य भाव कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के प्रति था वही भाव मित्र दलों के प्रति भी था। राजस्थान में लगभग सभी नॉन कांग्रेस नॉन बीजेपी पार्टियां कांग्रेस की निकट विचार और मित्र दल थी। उनमें से चार विधायकों ने लगातार 5 वर्ष तक कांग्रेस सरकार का समर्थन भी किया था, संकट के समय में भी उन्होंने गहलोत सरकार को बचाया था। जब स्वयं कांग्रेस के विधायकों ने कांग्रेस सरकार को लगभग अपदस्थ करने की स्थिति में ला दिया था, तब भी उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का विरोध और कांग्रेस सरकार का समर्थन किया था। इसके बावजूद अशोक गहलोत ने चुनाव से पहले और आज तक कभी भी उन दलों के साथ कोई बातचीत भी नहीं की, तालमेल का तो सवाल ही नहीं।

जिसका परिणाम यह हुआ कि तालमेल नहीं होने के कारण कांग्रेस लगभग 20 सीटें हार गई और इस तालमेल के साथ चुनाव लड़ने से आराम से बहुमत का आंकड़ा प्राप्त किया जा सकता था जो कि अशोक गहलोत की हेकड़ी के कारण संभव नहीं हुआ। इस बात को मैं सीट वाइज साबित कर सकता हूं। सीएए , एन‌आरसी आंदोलन के समय हम लोगों के पास अशोक गहलोत का फोन आया था और मैंने राजस्थान लोकतांत्रिक मोर्चे के अन्य सभी साथियों से बातचीत की, इसके बाद आमराय से हम उस संयुक्त रैली में शामिल हुए जो कि जयपुर में आयोजित की गई थी।

इसके अलावा पूरे 5 साल में कभी भी अशोक गहलोत के साथ 1 मिनट का भी हमारा संवाद नहीं हुआ, अशोक गहलोत सभी को कांग्रेसियों की तरह अपने अंगूठे के नीचे रखना चाहते हैं और उन्हें किसी भी प्रकार से आपस में सहयोग या सद व्यवहार के दायरे में नहीं रखना चाहते। इसी का परिणाम यह है कि राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता बन चुकी है। भविष्य में क्या होगा यह नहीं मालूम, लेकिन करारी हार के बावजूद अशोक गहलोत अभी भी किसी भी मित्र दल के साथ दुआ सलाम का भी रिश्ता नहीं रखना चाहते।

2019 में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटें भारतीय जनता पार्टी के हवाले कर दी थी और खुद अपने पुत्र के जोधपुर से उम्मीदवार होते हुए खुद अपने पारिवारिक पोलिंग बूथ पर भाजपा उम्मीदवार से बुरी तरह से हारे थे। इस बूथ पर अशोक गहलोत के बेटे को मात्र 266 वोट प्राप्त हुए थे और इस बूथ पर अशोक गहलोत ने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार गजेंद्र सिंह शेखावत को 607 वोट की भारी बढ़त दी थी। अभी हुए विधानसभा चुनाव में अशोक गहलोत के गृह जिले जोधपुर की सभी सीटें कांग्रेस हार ग‌ई, सिर्फ एक सीट सरदारपुरा जीती है जहां से गहलोत खुद विधायक हैं। है कोई पूछने वाला कि गहलोत अपने गृह जिले में सरदारपुरा के अलावा एक भी सीट कांग्रेस पार्टी को क्यों नहीं जीता पाए ?

अब अशोक गहलोत ही बताएं कि वह किसके नेता हैं और कहां के नेता हैं ? इस चुनाव में भी उन्होंने कुछ कांग्रेसियों को चुन चुन कर हराने का प्रयास किया, किसी को हरा दिया, कोई बाल बाल बच गया। ऐसी मनोवृति के नेता के कारण राजस्थान में कांग्रेस की यह दुर्दशा हुई है, भविष्य में भी सहयोग के बिना और सामंजस्य के बिना अच्छा परिणाम नहीं लाया जा सकता। सबसे ज्यादा दुखद पहलू यह है कि अशोक गहलोत अभी पुराने अहंकार में ग्रस्त हैं और लोकसभा में भी ऐसी हालत में क्या होगा ? यह सहजता से समझा जा सकता है। कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता इस बारे में क्या सोचते हैं यह भी विचारणीय विषय है। अब तक जिस किसी ने भी अशोक गहलोत से हटकर थोड़ी सी राय भी व्यक्त की है तो उसे बुरे परिणाम देखने पड़े हैं, आगे खुदा खैर करे। (लेखक राजस्थान के वरिष्ठ समाजवादी नेता हैं)
(24/12/2023)
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