देश में बदलाव की तड़प है, लेकिन यह तभी सम्भव है जब विपक्षी दल एकजुट होकर चुनाव लड़ें
देश में बदलाव की तड़प है, लेकिन यह तभी सम्भव है जब विपक्षी दल एकजुट होकर चुनाव लड़ें
इसका जवाब यह है कि कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार का दूसरा कार्यकाल एक नम्बर का नाकारा और भ्रष्ट था, वहां लीडरशिप नाम की कोई चीज़ नहीं थी। सहयोगी दल दिन रात लूट खसोट में व्यस्त थे। इन कमियों का लाभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अन्ना हजारे को आगे करके उठाने की योजना बनाई, दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए, इस मुहिम में कुछ धन्नासेठों ने योजनाबद्ध तरीके से अपनी तिजोरियां भी खोल दी थी।
इन सब घटनाक्रम का योजनाबद्ध मोदी जी ने लाभ उठाया और लोकसभा चुनाव 2014 में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार केन्द्र में बनी। इसके बाद जब 2019 का लोकसभा चुनाव हुआ तो उसमें और ज्यादा बहुमत भाजपा को मिला। अगर दोनों चुनावों के वोटों की बात की जाए तो विपक्षी दलों का वोट भाजपा से ज्यादा रहा है, लेकिन आपस में ही एक दूसरे के सामने उम्मीदवार खड़े कर विपक्षी दलों ने भाजपा का राज बहुमत से स्थापित करवाने में मदद की है। अगर 2019 में विपक्षी दल एकजुट होकर भाजपा के सामने चुनाव लड़ते तो भाजपा को सत्ता से दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं था।
खैर कोई बात नहीं, जब जगे तभी सवेरा। अगर इस चुनाव यानी 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दल एकजुट होकर चुनाव लड़ें और जनहित के मुद्दों पर चुनाव लड़ें तो आसानी से भाजपा को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। इसके लिए विपक्षी दलों ने इंडिया नाम से गठबंधन भी बना लिया है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि गठबंधन बने छह महीने के करीब हो गए हैं, अभी तक न इस गठबंधन का किसी को संयोजक बनाया है और ना ही सीटों का बंटवारा किया है। अगर ढुलमुल गठबंधन रहा और कुछ बड़े राज्यों में विपक्षी दल खुद ही आमने-सामने हुए, तो फिर मोदी की हैट्रिक को रोकना नामुमकिन होगा।
यह सच है कि आज देश का वोटर दो धड़ों में साफ तौर पर बंट चुका है, एक मोदी समर्थन में और दूसरा मोदी विरोध में। जो मोदी समर्थन में हैं उनमें से एक वोट भी विपक्षी दलों को नहीं मिलेगा तथा जो मोदी विरोधी वोटर है वो मोदी को तो नहीं पड़ेगा, लेकिन विपक्षी एकता के अभाव में हताश और दिशा चूक जरूर हो जाएगा।
आज देश में बदलाव की चर्चा आम है। लोग रोटी रोजगार को लेकर दुखी हैं। विपक्षी नेता केन्द्रीय एजेंसियों की छापेमारी से घबराए हुए हैं। बहुत से विपक्षी नेता 70-75 बरस पार कर चुके हैं, उन्हें यह अन्तिम चुनाव नज़र आ रहा है। उन्हें साफ दिख रहा है कि या तो वे इस चुनाव के बाद बची ज़िन्दगी में सत्ता से दूर हो जाएंगे, या फिर जो लूट का माल बनाया है उसके चक्कर में बाकी जीवन सलाखों के पीछे गुजारेंगे।
इसलिए लगता है कि मानसिक तौर पर विपक्षी नेता एकजुट होने का प्रयास ईमानदारी से कर रहे हैं। बस उन्हें सीट बंटवारे के लिए बड़ा दिल दिखाना पड़ेगा। उदाहरण के तौर पर राजस्थान जहां 25 लोकसभा सीटें हैं और कांग्रेस पिछले दो चुनावों से सभी सीटें हार रही है, अगर वो दो चार सीटें सहयोगी दलों को देती है, तो राजस्थान में भाजपा को 8-10 सीटों पर समेटा जा सकता है। ऐसा हाल अन्य राज्यों में भी है।
अगर इसको थोड़ा और बड़े रूप में देखें तो पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और महाराष्ट्र में कुल 279 लोकसभा सीटें हैं, यहां भाजपा को जितनी मिलनी चाहिए उतनी अधिकतम सीटें मिली हुई हैं। अगर इन 9 राज्यों में विपक्ष का मजबूत गठबंधन बनकर मैदान में आए तो यहां भाजपा को 80 से भी कम सीटों पर समेटा जा सकता है। फिर बाकी देश की तस्वीर तो अपने आप बदल जाएगी। लेकिन यह सब तब होगा जब विपक्षी दल मजबूती से एकजुट हों, बड़ा दिल दिखाकर शीघ्रता से सीटों का बंटवारा करें, जनहित के मुद्दों के अलावा किसी भी मुद्दे पर अपना मुंह नहीं खोलें तथा साॅफ्ट साम्प्रदायिकता का कुर्ता पहनने से बचें।
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