भाजपा लोकसभा चुनाव हार रही है...
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खबर है कि आंतरिक सर्वे में मिले हार के इशारे से भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की केन्द्रीय लीडरशिप घबराई हुई है तथा इस हार की घबराहट का सबूत यह है कि विपक्षी दलों पर ईडी का एक्शन तेज कर दिया गया है, नीतीश कुमार को साथ लिया गया है। झारखंड में तख्तापलट की कोशिश की गई, लेकिन वो नाकाम हो चुकी है। अरविन्द केजरीवाल पर शिकंजा कसने की तैयारी, यूसीसी और एनआरसी के जरिए माहौल फेवर में करने की कोशिश तेज कर दी गई है।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। दो महीने बाद लोकसभा चुनाव होने जा रहे हैं, भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है। वापसी के लिए उसने 400 पार यानी लोकसभा की 400 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर दिया है। लेकिन अंदर की सच्चाई कुछ और ही है, जिससे भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की केन्द्रीय लीडरशिप पूरी तरह से घबरा चुकी है।
सियासत की उच्च चौपालों में चर्चा है कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने लोकसभा चुनाव आसानी से जीतने के लिए आनन फानन में अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन तो कर दिया, लेकिन पार्टी के आंतरिक सर्वे में जो रिपोर्ट आई उससे नेतृत्व का बीपी हाई हो गया। इस सर्वे में विपक्षी दलों से भाजपा पिछड़ती बताई गई है और उसे पूर्ण बहुमत मिलना मुश्किल है।
इससे घबराकर सबसे पहले बिहार में खेला किया गया, नीतीश कुमार को वापस भाजपा गठबंधन में शामिल किया गया, ताकि बिहार में सम्भावित करारी हार को कम किया जा सके। फिर लगे हाथ झारखंड में भी तख्तापलट की कोशिश की गई, लेकिन बात नहीं बनी और भाजपा की सत्ता हड़पू योजना यहां विफल हो गई। केन्द्रीय एजेंसियों को पूरी तरह से सक्रिय कर दिया गया, ख़ासकर ईडी को। अरविन्द केजरीवाल पर भी पूरी तरह से शिकंजा कसने और दिल्ली से उनको बेदखल करने की तैयारी कर ली।
केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना आदि राज्यों में राज्यपालों को भी पूरी तरह से एक्टिव कर दिया। क्योंकि कैसे भी करके दक्षिण भारत में पांव जमें और सम्मानजनक सीटें मिल जाएं, ताकि अन्य राज्यों में होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके। नीतीश कुमार को तोड़ कर यह संदेश देना आवश्यक था कि इंडिया गठबंधन कुछ भी नहीं है, हालांकि यह सच है कि विपक्षी गठबंधन इंडिया कमजोर है और इसे कमजोर करने में कांग्रेस का लेट लतीफी वाला ढुलमुल रवैया मुख्य जिम्मेदार है। फिर भी बढ़ती साम्प्रदायिक नफ़रत, बेरोजगारी, महंगाई, चौपट होते छोटे मोटे काम-धंधों और केन्द्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग, बढ़ती तानाशाही से जनता दुखी व पीड़ित है और वो सरकार बदलना चाहती है और सरकार बदलने के लिए विपक्षी दलों के साथ एकजुट होती जा रही है।
धरातल की इस सच्चाई से भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की केन्द्रीय लीडरशिप सम्भावित हार से पूरी तरह से घबरा चुकी है। चुनावी माहौल को अपने पक्ष करने के लिए उसने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का कार्ड खेलना ही उचित समझा है। इसके लिए यूसीसी, एनआरसी, ज्ञानवापी मस्जिद आदि मुद्दों को प्राथमिकता देना तय कर लिया है कि कैसे भी करके सत्ता की डूबती नैया को बचाया जा सके।
देश का बुद्धिजीवी और पढ़ा लिखा वर्ग यह सवाल मुखर होकर उठा रहा है कि ईडी की कार्रवाई भाजपा के मुख्यमंत्रियों, पूर्व मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और भाजपा शासित राज्यों के अधिकारियों पर क्यों नहीं हो रही है ? जो विपक्षी नेता भाजपा द्वारा भ्रष्ट बताए जाते हैं उनके भाजपा में शामिल होते ही उन पर भ्रष्टाचार की कार्रवाई बंद क्यों कर दी जाती है ? इससे यह साबित होता है कि भाजपा को चोरों पर कार्रवाई से कोई मतलब नहीं है, सिर्फ सत्ता से मतलब है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की घबराहट का मुख्य कारण यह है कि केन्द्र की सत्ता उनके हाथ से जा रही है तथा इस बात को वे अच्छी तरह समझ चुके हैं। भाजपा ने उत्तर व मध्य भारत के राज्यों की अधिकतम सीटें जीत रखी हैं और इनका घटना तय है। भाजपा की यूपी, बिहार, बंगाल आदि राज्यों में काफी सीटें घटना तय हैं। इसकी भरपाई कहीं से भी नहीं हो पाएगी। दक्षिण भारत में उसके पांव जमने की बजाए जितने टिके हुए थे वे भी उखड़ रहे हैं। इन विश्लेषकों के बीच चर्चा यह है कि भाजपा 400 पार तो दूर की बात 200 के आस पास अटक जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी तथा भाजपा इस हार को भांप चुकी है। इसलिए अब वो हार के अंतर को कम करने के लिए हर उस दांव को इस्तेमाल कर रही है, जो उसे 250 के करीब सीटें दिला सके और कैसे भी करके सत्ता बचा सके।
10/02/2024
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