मिल्ली काॅन्सिल ने देशभर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राजनीतिक दलों और सरकार के सामने पेश किया मांग पत्र

मिल्ली काॅन्सिल ने देशभर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राजनीतिक दलों और सरकार के सामने पेश किया मांग पत्र

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न‌ई दिल्ली/जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। ऑल इंडिया मिल्ली काॅन्सिल ने मुल्क और मुसलमानों से मुताल्लिक विभिन्न मुद्दों पर एक विस्तृत मांग पत्र सभी राजनीतिक दलों और सरकार के सामने पेश किया है। जिसमें लोकसभा चुनाव को लेकर मांग की गई है कि इन मांगों व घोषणाओं को पूरा किया जाए या अपने चुनाव घोषणा पत्र में शामिल किया जाए। इस मांग पत्र को जारी करने के लिए दिल्ली, जयपुर और देश के अन्य शहरों में एक साथ 23 फरवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई।


जयपुर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस मोती डूंगरी रोड स्थित मुस्लिम मुसाफिरखाने में आयोजित की गई, जिसे मिल्ली काॅन्सिल के जनरल सेक्रेटरी एडवोकेट मुजाहिद नक़वी, उपाध्यक्ष शौकत कुरैशी और एडवोकेट अनवार अहमद ने सम्बोधित किया।

उन्होंने बताया कि 2024 के आम चुनाव के संदर्भ में राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र हेतु महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आधारित मांग पत्र ऑल इण्डिया मिल्ली काॅन्सिल के 15-16 जनवरी 2024 मुंबई में आयोजित राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन में पारित किया गया। जो निम्न हैं:-

परिचय : ऑल इण्डिया मिल्ली कॉन्सिल हिन्दुस्तानी मुसलामानों का एक एकजुट और साझा राष्ट्रीय मंच है, जिसमें राष्ट्र के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन और मुसलमानों के विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले कानूनी विशेषज्ञ, विद्वान, सामाजिक कार्यकर्ता राष्ट्रीय पर्यवेक्षक, बुद्धिजीवी, शिक्षाविद आदि शामिल हैं। कॉन्सिल की गतिविधियों के मुख्य क्षेत्रों में सांप्रदायिक सद्भाव, समग्र रूप से देश का विकास अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों और अन्य पिछड़े वर्गों के अधिकारों और हितों की सुरक्षा, शैक्षिक विकास, आर्थिक विकास, राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक सुधार शामिल हैं।

मिल्ली काॅन्सिल ने अतीत में भारत के नागरिकों, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों तथा मुस्लिम समुदाय के संवैधानिक मूल्यों एवं अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और स्वतंत्रता, भाईचारे और लोकतंत्र में निहित मूल्यों को बनाए रखने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के समक्ष कार्य किया है, जो भारत के संविधान में लिखे हैं यानी न्याय, समानता, समान अवसर, स्वतंत्रता और बंधुत्व सुनिश्चित करने की अपनी सर्वोत्तम क्षमता के प्रतिनिधित्व का उल्लेख किया गया है।

प्रस्तावना : इस साल अप्रैल और मई 2024 में देशभर में लोकसभा के आम चुनाव होने हैं। 18वीं लोकसभा के लिए होने वाले इन चुनावों को भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व की लड़ाई कहा जा सकता है। साल 2024 देश के लिए बेहद अहम है जिसमें 140 करोड देशवासियों की किस्मत का फैसला होगा। हमें एक राष्ट्र के रूप में गंभीर चुनौतियों का सामना है, जहां बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। हमारा लोकतंत्र हमारी स्वतंत्रता हमारे धर्मनिरपेक्ष मूल्य, हमारी सामाजिक एकता, हमारा संविधान और समझौता का शिकार हमारे संवैधानिक संस्थान, हमारी न्यायिक प्रणाली हमारे देश के अल्पसंख्यक और अन्य पिछड़े वर्गों की गरिमा।

देश की अर्थव्यवस्था के बारे में कहने की जरूरत नहीं है, जिसने हमारे गरीबों और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को और गरीब बना दिया है और देश की संपत्ति कुछ कॉरपोरेट्स के हाथों में केंद्रित हो गई है। साम्प्रदायिक उन्माद से प्रेरित बयानबाजी, देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ संगठित घृणा अभियान, दलितों और अन्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों के उत्पीड़न को जारी रखा जा रहा है। बिना दंड दिए उन्हें संस्थागत बनाया जा रहा है। हम रास्ता भटक गए हैं और अब समय आ गया है कि हम गभीरता से अपने संविधान में निहित मूल्यों यानी न्याय स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को बहाल करने का रास्ता खोजें।

इस संबंध में ऑल इण्डिया मिल्ली काॅन्सिल की राजनीतिक मामलों की समिति के द्वारा आयोजित राजनीतिक सलाह कंवेंशन 2024 के अवसर पर आम चुनावों के संदर्भ में देश भर के राजनीतिक दलों से अपेक्षा करता है कि वे अपने चुनावी घोषणा पत्र जारी करने से पहले मिल्ली काॅन्सिल के राजनीतिक सलाहकार कन्वेंशन द्वारा जारी घोषणापत्र व मागों को अपने चुनाव घोषणापत्र में शामिल करें और देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग की भावनाओं को महसूस करते हुए उनके साथ जहां न्याय के पहलू को ध्यान में रखा जाए। वहीं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग के साथ-साथ सामाजिक समानता और न्याय भी सुनिश्चित किया जाए।

घोषणा पत्र की मांग निम्न हैं:-
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विकास के मामलों पर मांग
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1. पिछली सरकारों में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में की गयी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया। इस संबंध में हमारी मांग है कि जस्टिस सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू किया जाए और उसके सभी बिंदुओं पर ध्यान आकृष्ट किया जाए।

2. सरकारी और निजी क्षेत्रों में अल्पसख्यकों के प्रतिनिधित्व के लिए एक डेटाबेस तैयार किया जाए।

3. समान अवसर आयोग (Equal Opportunities Commission) का गठन किया जाए और संविधान की धारा 340, 341 और 342 को धारा 14, 15, 16, 29 और 30 के साथ जोड़ करके अनिवार्य उद्देश्यों के मद्देनजर इसे एक वैधानिक निकाय बनाया जाए।

4. जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को व्यावहारिक रूप से लागू किया जाए। जस्टिस रंगनाथ आयोग ने जहां धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए 15 प्रतिशत कोटे की सिफारिश की थी, वहीं वर्तमान एनडीए सरकार जान बूझकर इस मुद्दे पर चुप रही, हालांकि आर्थिक आधार पर ऊंची जातियों के लिए नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान लागू कर दिया गया, जो भारत के संविधान के बुनियादी नैतिकता के उसूलों को नकारता है। हालात की मांग है कि सरकारी नौकरियों और शिक्षा क्षेत्र में सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए अलग से कोटा आवंटित किया जाए।

5. केन्द्रीय एवं राज्य बजट में जो भी परियोजनाएँ बनाई जाएँ, उनमें मुस्लिम आबादी को ध्यान में रखते हुए उप-योजना के तहत आनुपातिक धनराशि आवंटित की जाए।

6 आम चुनाव के बाद जो भी सरकार बने, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नीचे से ऊपर तक सरकारी स्तर पर गठित सभी सरकारी समितियों और बोर्ड, नगर निगमों में अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिले।

7. विधानमंडल यानी राज्य विधानमंडल और राज्यसभा में नामित सदस्यों (एमएलसी और राज्यसभा सांसद) के रूप में अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व दिया जाए।

8 क्षेत्रीय निकायों, बोर्डों और नगर निगमों तथा ऐसी अन्य संस्थाओं को बाध्य किया जाए कि अल्पसख्यकों की कल्याण योजनाओं के लिए प्राप्त धनराशि सरकार को वापस न करें और ऐसा करने की सूरत में उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

9 लघु एवं पारंपरिक उद्योगों के पुनरुद्धार के लिए उद्यमियों को ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाए। यदि आवश्यक हो तो ऐसी व्यावसायिक समस्याओं के अध्ययन और समाधान के लिए एक आयोग का गठन किया जाए।

10. सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए सिंगल विंडो सिस्टम एवं ग्रीन चैनल तैयार किया जाए ताकि वास्तविक लाभार्थियों को बिना किसी बाधा के इन योजनाओं का लाभ मिल सके।

वक्फ संपत्तियां :-
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वक्फ अधिनियम 1995 देश भर में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में एक शक्तिशाली माध्यम है, लेकिन वास्तविक मुद्दा इसके प्रभावी क्रियान्वयन और जवाबदेही और बोर्ड के कार्यों के तत्काल निवारण के सदर्भ में कानून को लागू करने की इच्छा है। इसलिए वक्फ अधिनियम 1995 के प्रभावी एवं सही अर्थों में क्रियान्वित किया जाना सुनिश्चित किया जाए।

1  वक्फ संपत्तियों पर सरकार या निजी लोगों के कब्जों को खाली कराया जाए और इन संपत्तियों को वक्फ बोर्ड को सौंप दिया जाए।

2 विभिन्न राज्यों में वक्फ संपत्तियों को मुसलमानों के विकास और प्रगति के लिए उपयोगी और प्रभावी बनाया जाए।

3 साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा वक्फ अधिनियम 1995 को निरस्त करने की मांग अत्यंत निंदनीय है। वक्फ अधिनियम 1995 के प्रावधानों को मजबूत करने के लिए कदम उठाकर राज्य वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ बोर्ड को वास्तव में मुसलमानों का प्रतिनिधि बनाया जाए।

(ए) निर्वाचित प्रतिनिधियों (एमएलए एमएलसी, एमपी, स्थानीय निकाय सदस्य) और सरकारी अधिकारियों को नामित करने की प्रणाली को समाप्त किया जाए और बक्फ बोर्ड के सभी सदस्यों को समग्र रूप से मुस्लिम समुदाय से चुना जाए।

(बी) चूंकि वक्फ अल्लाह के रास्ते में किया जाता है जो कि एक धार्मिक मामला है, अतः वक्फ बोर्ड को हर स्तर पर इस्लामी शरीयत में काजी को दिए गए अधिकारों के बराबर अधिकार दिए जाएं।

सुरक्षा के बारे में:-
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1 यूएपीए एक्ट में 2004, 2008, 2012 और 2019 में किए गए संशोधनों को वापस लिया जाए। यूएपीए कानून के तहत हिरासत में लिए गए, गिरफ्तार किए गए और गंभीर रूप से प्रताड़ित किए गए लोगों का पूरा डेटा प्राप्त करने के लिए एक उच्च स्तरीय आयोग का गठन किया जाए।

2 ऐसे व्यक्ति जो पुलिस और प्रशासन का खिलौना बन गए हैं और वर्षों तक जेल और कारावास की यातनाएं झेल चुके हैं, फिर अदालतों ने उन्हें निर्दोष साबित किया है, उन्हें मुआवजा दिया जाए और इसके लिए आपराधिक कानून (फौजदारी) में आवश्यक संशोधन किया जाए। जिन्हें लंबे समय तक बिना जमानत के जेल में रखा गया है, जब वे अदालत से बरी हो गए हैं तो ऐसे लोगों के पुनर्वास का बदोबस्त किया जाए।

3 आतंकवाद की सभी घटनाओं की जांच के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया जाए।

4. एनआरसी की तैयारी के संबंध में असम सहित विभिन्न राज्यों में जो कवायद की जा रही है उसे खत्म किया जाए।

5. नागरिकता संशोधन कानून को रद्द किया जाए।

6 AFSPA कानून को निरस्त किया जाए।

7 आईएमडीटी एक्ट 1983 को बहाल किया जाए।

8 हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, भारतीय न्याय संहिता और भारतीय साक्ष्य संहिता के कई प्रावधान ऐसे हैं, जो पुलिस को अनुचित शक्ति और अधिकार देते हैं और अभियुक्तों और कैदियों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। ये प्रावधान संविधान की भावना के खिलाफ हैं और पुलिस राज लागू करने के साधन बनते हैं, इसलिए इन्हें संशोधित करने की आवश्यकता है बल्कि पहले के सीआरपीसी, आईपीसी और साक्ष्य अधिनियम को बहाल किया जाए। इसके अलावा आईपीसी के तहत राजद्रोह की धारा (124ए) को कानून की किताब से हटाने के बजाय भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 150 के तहत इसे और सख्त तरीके से संविधान का हिस्सा बनाया गया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने भी अनुच्छेद 124ए पर दुबारा गौर करने की सरकार को सलाह दी थी। अतः भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 150 को कानून की किताब से हटा जाए।

साम्प्रदायिक दंगे:-
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1 साम्प्रदायिक दंगों की सामूहिक रोकथाम के लिए साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक 2011 को कानूनी मंजूरी दी जाए।

2 सांप्रदायिक दंगों के पीड़ितों के पुनर्वास को राज्य की जिम्मेदारी के तहत लाया जाए।

अल्पंसख्यक आयोग :-
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केंद्र व राज्य स्तर पर गठित अल्पसंख्यक आयोगों को न्यायिक शक्तियां दी जाएं।

धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार :-
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1 धार्मिक अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार और उन्हें जिस तरह से समाज से बाहर किया जा रहा है उसके खिलाफ ठीक उसी तरह सख्त कानून बनाया जाए, जिस तरह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए अत्याचार निवारण अधिनियम (Prevention Of Atrocities Act) बनाया गया है। इसी तरह अल्पसंख्यक संरक्षण अधिनियम (Prevention Of Monorirties Act) को भी जल्द से जल्द लागू किया जाए।

2 भीड़ हिंसा (मॉब लिंचिंग) की घटनाओं के लिए राज्य प्रशासन को जवाबदेह बनाया जाए और भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 103 (2) जो भीड़ हिंसा अपराधियों के लिए जुर्माना के साथ मौत या आजीवन कारावास का प्रावधान करती है। इसको एक अलग कानूनी दर्जा देकर सही मायने में क्रियान्वित करना सुनिश्चित किया जाए।

विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व के संबंध में :-
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1 सभी केंद्रीय एवं राज्य जांच एवं गुप्त एजेंसियों में विशेष नियुक्ति अभियान के तहत अल्पसंख्यकों की आनुपातिक नियुक्तियां सुनिश्चित की जाएं।

2 एक व्यापक आरक्षण कानून बनाया जाना चाहिए ताकि हाशिए पर रहने वाले लोगों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण मिल सके।

3 एससी और एसटी के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 341 में 1950 के राष्ट्रपति के आदेश में संशोधन किया जाए, ताकि धर्म के आधार पर अल्पसख्यकों विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयो के खिलाफ भेदभाव को हल किया जा सके।

मुस्लिम बाहुल्य निर्वाचन क्षेत्रों के संबंध में :-
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1 संसद और विधानसभा क्षेत्र जहां वोटों के मामले में मुस्लिम बहुमत में हैं, उन्हें पिछले परिसीमन के तहत उन्हें एससी, एसटी के लिए आरक्षित कर दिया गया था, इस श्रेणी से उन्हें हटाया जाए।

2 विधानमंडलों में अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए संशोधन किया जाए।

शैक्षिक मुद्दों के संबंध में :-
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1 शिक्षा एवं शैक्षिक संस्थानों में अल्पसंख्यकों को आरक्षण दिया जाए, जिसमें मुसलमानों के लिए दो-तिहाई उप-कोटा आरक्षित किया जाए।

2 राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग को पुर्नगठित किया जाए और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए कदम उठाए जाएं। 9 जुलाई 2017 के दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार मौजूदा सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

3 सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में मुस्लिम समुदाय के 15 प्रतिशत छात्र-छात्राओं को प्रवेश दिया जाए और इन सस्थानों में शिक्षकों के नियुक्ति में जनसंख्या के अनुपात में उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति की जाए।

4 नवोदय विद्यालय की तर्ज पर अल्पसंख्यक बहुल ब्लॉकों में अल्पसख्यकों के लिए आवासीय विद्यालय स्थापित किए जाएं। मुस्लिम लड़कियों को अच्छी शिक्षा से लैस करने के उद्देश्य से उन शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों का चयन किया जाना चाहिए जहां शैक्षिक स्तर व सुविधा बहुत अच्छी हो।

5 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र को बहाल रखा जाए और इसके लिए आवश्यक कानून बनाया जाए।

6 अन्य अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की अल्पसंख्यक भूमिका की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, जो संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के अनुरूप हैं।

7 सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता बहाल की जाए, जो विशेष रूप से अल्पसंख्यकों और अन्य कमजोर वर्गों के लिए स्थापित किए गए हैं।

8 जिस तरह से सभी शैक्षणिक संस्थानों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों को भगवा रंग (भगवा करण) देने की कोशिश की गई है, उनमें सुधार लाया जाए और जो पाठ यहां की गंगा-जमुनी सरकृति से मेल नहीं खाते हैं, उन्हें पाठ्यक्रम से पूरी तरह से बाहर कर दिया जाए।

9 हाल के दिनों में एनसीईआरटी पाठ्यक्रम में जो बदलाव किए गए हैं और शिक्षण संस्थानों द्वारा एक वर्ग की सांस्कृतिक सर्वोच्चता स्थापित करने की कोशिश की जा रही है, इन बदलावों को समाप्त किया जाए।

10 नई शिक्षा नीति (एनईपी 2020) में देश की संवैधानिक सोच और गंगा-जमुनी संस्कृति के तहत बदलाव किया जाए।

11 अल्पसंख्यक वर्गों के लिए स्थायी कौशल विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य में संबंध में :-
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सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अस्पताल एवं फार्मेसियों (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) की स्थापना की जाए और दवाओं के वितरण के लिए एक एकीकृत प्रणाली स्थापित की जाए।

सांस्कृतिक मुद्दों के संबंध में :-
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1 एनडीए सरकार द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के विरुद्ध लागू किए गए तीन तलाक अध्यादेश और अन्य विवादास्पद कानूनों को निरस्त किया जाए।

2 मस्जिदों और कब्रिस्तानों के निर्माण में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए सरल नियम बनाए जाएं।

3 सभी धार्मिक पूजा स्थलों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जाएं और ऐसी ध्वस्त ढांचों का पुनर्निर्माण किया जाए और संबंधित समुदाय को सौंप दिया जाए।

4  पूजा स्थल (संरक्षण) अधिनियम 1991 को अक्षरशः लागू किया जाए और जामा मस्जिद ज्ञानवापी और मथुरा शाही ईदगाह मस्जिद सहित सभी पूजा स्थलों की सुरक्षा हेतु कानून के तहत सुनिश्चित किया जाए।

5 ऐसे सभी धर्म स्थलों और विशेष रूप से मस्जिदें, जो एएसआई के नियंत्रण में हैं, को इबादत के लिए खोलने हेतु आवश्यक उपाय किए जाएं।

6 नफरत फैलाने वालों पर कानूनी प्रक्रिया के जरिए अंकुश लगाया जाए।

7 जो लोग बाबरी मस्जिद के विध्वंस और साजिश में शामिल थे, उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई तेज की जाए और जस्टिस लिब्राहन आयोग द्वारा विध्वंस प्रक्रिया में जिन लोगों की पहचान की गई थी, उनके खिलाफ सरकार को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।

राष्ट्रीय एवं अल्पसंख्यक भाषाओं के संबंध में :-
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सभी राष्ट्रीय भाषाओं, विशेषकर अल्पसंख्यकों की भाषाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और उनके प्रचार एवं विकास के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।

उर्दू भाषा के संदर्भ में :-
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उर्दू भाषा, जिसने भारतीय समाज के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने में असाधारण भूमिका निभाई है, उसका प्रचार-प्रसार सुनिश्चित किया जाए।

हज मामलों के संबंध में :-
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हज यात्रियों के लिए सरकारी कोटा बढ़ाया जाए, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि यात्रा का खर्च कम हो और सभी राज्यों में एक समान हो जिससे हज सभी के लिए किफायती हो सके।

महिलाओं के संबंध में :-
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1 अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यकों की महिलाओं को विशेष कोटा के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आरक्षण दिया जाए।

2  कम साक्षरता वाले शहरों और कस्बों में अल्पसंख्यक लड़कियों, छात्राओं के लिए विशेष शैक्षणिक कार्यक्रम चलाए जाए।

हिजाब विवाद के संबंध में :-
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महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनके विवेक और विश्वास के अनुसार उनके कपड़ों की पसंद का सम्मान किया जाए और महिलाओं पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाए जो उनके मौलिक अधिकारों को सीमित करता हो।

किसानों से जुड़े मुद्दे :-
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किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, भारत कृषि उत्पादन में विश्व स्तर पर दूसरे स्थान पर है और कई आर्थिक सर्वे रिपोर्टी के अनुसार कृषि 50 प्रतिशत से अधिक भारतीय कार्यबल को रोजगार देती है और देश की जीडीपी में 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी प्रदान करती है। लेकिन सच्चाई यह है कि हर राजनीतिक दल किसानों को चुनाव जीतने के लिए वोट पाने के अवसर के रूप में देखता है और ऐसे वादे करता है जो पूरे नहीं होते जिससे किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं। भारी कर्ज का बोझ, सरकारी सहायता की कमी, अप्रत्याशित मौसम परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान न देना, ये सभी किसान आत्महत्याओं की चिताजनक दर में योगदान करते हैं। इस समस्या के निदान के लिए एक व्यापक समाधान की आवश्यकता है, जिसमें वित्तीय सहायता प्रणालियों में बदलाव, कृषि पद्धतियों में सुधार, मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक अधिक पहुंच और किसानों के लिए एक स्थायी और सहायक वातावरण प्रदान करने वाली नीतियां शामिल हैं। इस पृष्ठभूमि में हम मांग करते हैं कि-

1 सभी फसलों की खरीद पर एमएसपी की गारंटी का कानून बनाया जाए।

2 स्वामी नाथन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार फसल बीमा योजनाएं लागू की जाएं।

3 किसानों एवं खेतिहर मजदूरों के लिए सपूर्ण ऋण माफी की व्यवस्था लागू की जाए।

4 भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 और 2015 में किये गये संशोधन को निरस्त किया जाये तथा अधिनियम को मूल स्वरूप में लागू किया जाये।

5 विश्व व्यापार संगठन के साथ भारत के समझौते रद्द किये जाएं।

6  60 वर्ष तक के किसानों एवं खेतिहर मजदूरों के लिए 10,000 रुपये प्रति माह पेशन योजना लागू की जाए।

7 बिजली बिल (संशोधन) अधिनियम 2020 को निरस्त किया जाए।

8 लखीमपुर खीरी नरसंहार के अपराधियों को सजा दी जाए और दिल्ली मार्च और विरोध प्रदर्शन 2020-2021 के दौरान दर्ज पुलिस मामले वापस लिए जाएं।

9 2020-2021 किसान विरोध प्रदर्शन में मरने वालों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए।

अन्य मामलों के संबंध में :-
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विदेश में रहने वाले अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) की सुरक्षा और उनकी वापसी पर उनका पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए एक अलग मंत्रालय स्थापित किया जाए।
(24/02/2024)
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