कांग्रेस चली भाजपा की चाल...
कांग्रेस चली भाजपा की चाल...
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9 राज्यों की 130 लोकसभा सीटों में से एक भी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारेगी ?
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जिस तरह भाजपा ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारने की नीति बना रखी है, अब कांग्रेस भी उसी नीति पर चलने की तैयारी कर चुकी है। लोकसभा चुनाव 2024 में राजस्थान से मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारने की योजना कहीं कांग्रेस को भारी नहीं पड़ जाए। क्या कांग्रेस ने अपने तमाम मुस्लिम नेताओं को नाकारा और निकम्मा मान लिया है ? या वो सिर्फ मुसलमानों के वोट तो लेना चाहती है, लेकिन उन्हें लोकसभा में प्रतिनिधित्व नहीं देना चाहती है ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। लोकसभा चुनाव 2024 की घोषणा हो चुकी है और पहला चरण 19 अप्रैल को है। इस बीच देश की सबसे पुरानी पार्टी और प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस जिसने करीब 55 साल देश पर एकछत्र राज किया है। उसने भाजपा के नक्शे कदम पर चलने की योजना बना ली है, ख़ासकर मुस्लिम समुदाय को लेकर। मुस्लिम समुदाय से सम्बंधित किसी भी मुद्दे पर कांग्रेस नेताओं की पिछले एक दशक से जो खामोशी चल रही है, उस खामोशी में एक इजाफा और होने जा रहा है।
और वो इजाफा यह है कि इस बार कांग्रेस राजस्थान से लोकसभा प्रत्याशी के तौर पर किसी भी मुस्लिम को नहीं उतारेगी। यह लेख लिखे जाने तक कांग्रेस ने राजस्थान की 25 में से 16 टिकटें घोषित कर दी, जिनमें चूरू और झुंझुनूं की लोकसभा सीट भी शामिल हैं, जहां से करीब आधा दर्जन बार मुस्लिम उम्मीदवार उतारे गए हैं। सियासी गलियारों में चर्चा यह है कि इस बार कांग्रेस राजस्थान से किसी भी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारेगी, जिसके कारण कांग्रेस हलके में दो बताए जा रहे हैं, पहला यह है कि मुस्लिम उम्मीदवार लगातार चुनाव हार रहे हैं, दूसरा कारण यह है कि एक भी मुस्लिम नेता लोकसभा चुनाव जीतने के लायक नहीं है।
लेकिन इस कहानी के पीछे की सच्चाई कुछ और ही है, कांग्रेस ने 2014 में हार के बाद मुस्लिम मुद्दों पर पूरी तरह से खामोशी इख्तियार कर ली। वो मुसलमानों के वोट तो लेना चाहती है, लेकिन उन्हें न सम्मानजनक प्रतिनिधित्व देना चाहती है और ना ही उनसे सम्बन्धित किसी मुद्दे पर बोलना चाहती है। अब तो ऐसा लग रहा है कि जिस तरह भाजपा ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारने की नीति बना रखी है, कांग्रेस भी उसी नीति पर चलने की तैयारी कर चुकी है और वो लोकसभा चुनाव 2024 में राजस्थान से मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारने की योजना बना चुकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की यह नीति कांग्रेस को ही भारी पड़ सकती है। सियासी मामलों में रूचि रखने वाले मुस्लिम आज यह सवाल कर रहे हैं कि क्या कांग्रेस ने अपने तमाम मुस्लिम नेताओं को नाकारा और निकम्मा मान लिया है ? या वो सिर्फ मुसलमानों के वोट तो लेना चाहती है, लेकिन उन्हें लोकसभा में प्रतिनिधित्व नहीं देना चाहती है ?
कांग्रेस 9 राज्यों (राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) की 130 लोकसभा सीटों में से एक सीट पर राजस्थान से मुस्लिम को टिकट देती है, इस बार जो खबरें आ रही हैं, उससे लगता है कि वो यह एक टिकट भी नहीं देगी। जहां तक जिताऊ उम्मीदवार की बात है, तो यह सही है कि कांग्रेस के पास राजस्थान में एक भी जिताऊ मुस्लिम उम्मीदवार नहीं है। जिताऊ उम्मीदवार इसलिए नहीं हैं, क्योंकि कांग्रेस ने मुस्लिम नेताओं के नाम पर गुलामों और चाटुकारों की भीड़ खड़ी की है, जिन्होंने अपनी कोई सियासी हैसियत स्थापित नहीं की।
लेकिन इस सच्चाई के बाद यह कह कर टिकट काटना कि कोई जिताऊ मुस्लिम नेता नहीं है, तो यही बात भाजपा भी कहती है। फिर दोनों में फ़र्क क्या रहा ? विचित्र बात यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में इन 130 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ 12 सीटें जीत पाई थी। 118 सीटें हार गई थी। सवाल यह है कि इन 118 में से 117 गैर मुस्लिम उम्मीदवार क्या जिताऊ थे ? अगर हां, तो फिर सभी क्यों हारे ? अगर इन 117 को हारने के लिए सीट दी जा सकती है तो फिर मुस्लिम को एक अदद सीट क्यों नहीं दी जा सकती ? लेकिन कांग्रेस की यह सोच बताती है कि उसने सेक्यूलरिज्म और डेमोक्रेसी का कुर्ता दिखावे के तौर पर पहन रखा है, असल में तो वो भी भाजपा की बी नहीं बल्कि ए टीम ही है।
पिछले लोकसभा चुनाव 2019 में 9 राज्यों की इन 130 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस ने एक मुस्लिम को राजस्थान में चूरू लोकसभा सीट से टिकट दिया था और इस बार यह एक टिकट भी काट दी गई है, तो क्या कांग्रेस आलाकमान इस बात की गारंटी ले रहा है कि इस बार इन 130 सीटों में से अधिकतर सीटें कांग्रेस जीत जाएगी ? क्योंकि इस बार तो सभी ठोक बजाकर जिताऊ उम्मीदवार ही उतारे जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन 130 सीटों में से अगर 20 सीटें भी कांग्रेस जीत लेती है, तो बहुत बड़ी गनीमत होगी। इन हालात में यह कहकर एक अदद मुस्लिम टिकट को काटना कि कोई भी मुस्लिम नेता जिताऊ नहीं है, यह जुमला इन 130 सीटों पर कांग्रेस के लिए ही आईना है।
कांग्रेस नेतृत्व के इस सुलूक और मुसलमानों को नज़र अंदाज़ करने के रवैए से मुस्लिम समुदाय में जबरदस्त रोष है, लेकिन उनके पास कोई विकल्प नहीं है। परन्तु एक भावना मुस्लिम समुदाय में तेजी से पनप रही है ख़ासकर युवाओं में कि जो पार्टी हमारे मुद्दों पर खामोश रहे और हमें उचित राजनीतिक भागीदारी नहीं देना चाहे, ऐसी पार्टी को हमें भी वोट नहीं करना चाहिए। इस भावना से तय है कि मुस्लिम वोट की पोलिंग कम होगी या जो भी छोटा मोटा किसी सीट पर कोई विकल्प होगा उधर वोट जाएंगे। ऐसी स्थिति में नुक़सान कांग्रेस का ही होगा।
मुसलमानों में एक बात यह भी चर्चा का विषय बनी हुई है कि कोई जीते कोई हारे हमें पार्टी नहीं बनना चाहिए, हमने (मुसलमानों ने) 2014 और 2019 में गिन गिन कर थोक में तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों को वोट किया मोदी को रोकने के लिए, नतीजा सबके सामने है। इसलिए हमें हमारी पूरी ताकत अपने घर, परिवार, रिश्तेदारों का ख्याल रखने और जरूरतमंद की मदद करने और तालीम व कारोबार को मजबूत करने और सरकारी नौकरी हासिल करने पर केन्द्रित रखनी चाहिए। इन तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों और इनके नेताओं को इनके खुद के भरोसे छोड़ देना चाहिए। इस सोच और भावना को नज़र अंदाज़ करने का मतलब है कि कांग्रेस जैसी तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों को लोकसभा चुनाव में भारी नुक़सान हो सकता है।
राजस्थान में कब और कहां से मुस्लिम को कांग्रेस ने लोकसभा टिकट दिया ?
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राजस्थान से अब तक सिर्फ एक मुस्लिम लोकसभा सांसद रहे हैं। झुंझुनूं से वीर चक्र विजेता कैप्टन मोहम्मद अय्यूब खान, वे यहां से दो बार सांसद और केन्द्रीय मंत्री भी रहे हैं। इनके अलावा कोई भी मुस्लिम लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाया।
1984 के लोकसभा चुनाव में झुंझुनूं लोकसभा सीट से कांग्रेस ने कैप्टन मोहम्मद अय्यूब खान को टिकट दिया और वे चुनाव जीत गए। 1989 में भी उन्हें यहीं से उम्मीदवार बनाया और चुनाव हार गए। फिर 1991 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने कैप्टन मोहम्मद अय्यूब खान को झुंझुनूं से उम्मीदवार बनाया और वे चुनाव जीत गए। 1996 के लोकसभा चुनाव में भी उन्हें झुंझुनूं से टिकट दिया और वे चुनाव हार गए। इस तरह झुंझुनूं से लगातार चार बार कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारा था।
1998 में जयपुर शहर लोकसभा सीट से कांग्रेस ने सईद गुडएज को टिकट दिया और वे चुनाव हार गए। 1999 में डाॅक्टर अबरार अहमद को झालावाड़ लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया और वे भी चुनाव हार गए। 2004 के लोकसभा चुनाव में अजमेर लोकसभा सीट से हबीबुर्रहमान को कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवार के तौर पर मैदान उतारा और वे भी चुनाव हार गए। 2009 में कांग्रेस ने चूरू लोकसभा सीट से रफीक मंडेलिया को टिकट दिया और वे भी चुनाव हार गए। 2014 में कांग्रेस ने टोंक सवाई माधोपुर लोकसभा सीट से भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे मोहम्मद अजहरुद्दीन को यहां से उम्मीदवार बनाया और वे भी चुनाव हार गए। 2019 में वापस चूरू से रफीक मंडेलिया को टिकट दिया और वे भी चुनाव हार गए।
राजस्थान में कौन थे कांग्रेस से मुस्लिम दावेदार ?
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राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों में से 13 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोट 3 लाख से लेकर साढ़े 4 लाख तक बताए जाते हैं। इनमें जयपुर शहर सबसे ज्यादा मुस्लिम वोटों वाली सीट है। जहां तक दावेदारों की बात है तो इस बार झुंझुनूं और जयपुर शहर से दावेदारी थी। झुंझुनूं से पूर्व पीसीसी महासचिव शब्बीर हुसैन खान और पूर्व पीसीसी सचिव रियाज फारूकी दावेदार थे। जयपुर शहर से यूसुफ अली टाक दावेदार थे।
इसके अलावा जो चर्चा सियासी गलियारों में थी वो यह थी कि रफीक मंडेलिया, रेहाना रियाज़, वक्फ बोर्ड चेयरमैन डॉक्टर खानू खां बुधवाली, मदरसा बोर्ड चेयरमैन एम डी चौपदार, आदर्श नगर विधायक रफीक खान और किशनपोल विधायक अमीन कागजी आदि में से किसी एक को लोकसभा चुनाव मुस्लिम उम्मीदवार के तौर पर लड़वाया जा सकता है। लेकिन खबर यह भी है कि रफीक मंडेलिया, रफीक खान और अमीन कागजी ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। लेकिन बाकी किसी को टिकट दे दी जाती तो वे दिल्ली तक नंगे पांव जाकर टिकट ले आते, चाहे कितनी भी बुरी हार हो।
शब्बीर हुसैन खान जो 2009 से टिकट मांग रहे हैं, उन्होंने चूरू और झुंझुनूं सीट का एक एक गांव ढाणी बाकी नहीं छोड़ा, जहां वे नहीं गए हों। दिल्ली और जयपुर के किसी बड़े कांग्रेसी नेता को नहीं छोड़ा जहां उनकी चौखट पर उन्होंने कई बार टिकट की गुहार नहीं लगाई हो। सरकारी नौकरी छोड़ दी, एक अदद टिकट के चक्कर में 17 साल से भागते भागते अपना पांव तुड़वा लिया। फिर भी कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया। रियाज़ फारूकी जिनका परिवार परम्परागत कांग्रेसी है, जब से होश संभाला तब से वे कांग्रेस की सेवा कर रहे हैं, अपनी ज़िन्दगी के अमूल्य 40 साल उन्होंने कांग्रेस की सेवा में लगा दिए। लेकिन उन्हें भी टिकट नहीं दिया।
एम डी चौपदार जो पिछले 15 साल से झुंझुनूं से लोकसभा और विधानसभा टिकट मांग रहे हैं। जो चुनाव लड़ने में भी सक्षम हैं। उन्होंने खास व्यवस्था के तहत बिना किसी को सुगबुगाहट लगे विधानसभा चुनाव से छह महीने पहले मदरसा बोर्ड चेयरमैन का पद हासिल कर लिया, तो फिर लोकसभा टिकट में कहां चूक हुई हैरानी की बात है ? डॉक्टर खानू खां बुधवाली जो 2008 से विधानसभा और लोकसभा टिकट की कतार में खड़े हैं, उन्हें भी पार्टी ने नजर अंदाज कर दिया। आखिर यह खेल हुआ कैसे ? क्या कांग्रेस ने सभी दावेदारों को नाकारा समझ लिया, या किसी बड़ी व्यवस्था के तहत मुस्लिम की टिकट काटकर अन्य को दे दी ? इन दावेदारों में एम डी चौपदार के बारे में चर्चा है कि अगर पार्टी इशारा करती तो टिकट के बदले वे चाहे जैसी व्यवस्था कर सकते थे।
रफीक मंडेलिया की वजह से हुआ बड़ा कूड़ा ?
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रफीक मंडेलिया को कांग्रेस ने सबसे पहले 2009 में चूरू से लोकसभा टिकट दिया और वे मामूली वोटों 12 हजार 440 से चुनाव हार गए। इसके बाद वे लगातार यहां से चुनाव हारते गए। उन्हें यहां से दो बार विधानसभा और दो बार लोकसभा टिकट दिया गया। उनके पिताजी मकबूल मंडेलिया को दो बार विधानसभा टिकट दिया और वे एक बार 2008 में यहां से चुनाव जीत पाए। यानी चूरू पर लगातार दबदबा मंडेलिया परिवार का रहा और वो पिछले 20 साल में यहां से सिर्फ एक बार विधानसभा चुनाव जीतने में सफल हुआ।
मंडेलिया परिवार की लगातार हार और वहां कमजोर होती कांग्रेस के बारे में सियासी जानकारों का मानना है कि रफीक मंडेलिया ने कभी भी क्षेत्र पर ध्यान नहीं दिया। वे टिकट लेकर आते और चुनाव जीतने के बाद वापस मुम्बई चले जाते। उनकी क्षेत्र से दूरी और गैर राजनीतिक सोच ने चूरू कांग्रेस का कूड़ा कर दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि रफीक मंडेलिया के कारण एक टैग लग गया कि मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सकता। जिसका खामियाजा सभी दावेदारों को भुगतना पड़ा।
(24/03/2024)
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