चूरू, झुंझुनूं और सीकर का सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा ?
चूरू, झुंझुनूं और सीकर का सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा ?
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चूरू और झुंझुनूं में कांग्रेस की स्थिति मजबूत, सीकर में कांग्रेसियों के भीतरघात से कामरेडों की नैय्या डांवाडोल, तीनों सीटों को लेकर भाजपा पसोपेश में...
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फ़ारूक़ अली ख़ान (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)
जयपुर/चूरू/झुंझुनूं/सीकर। लोकसभा चुनाव 2024 के पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल को है और इस दिन आधे राजस्थान में भी मतदान होगा। राजस्थान में भाजपा करो और मरो की स्थिति में आ चुकी है, क्योंकि पिछले दो चुनावों में उसने सभी 25 सीटें जीती थीं तथा इस बार उसे स्पष्ट तौर पर यह सीटें घटती हुई नजर आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजस्थान में 8 सीटों पर कड़ा मुकाबला है और इनमें कुछ सीटें भाजपा के हाथ से निकलना तय हैं। इसी खबर को लेकर भाजपा नेतृत्व के कान खड़े हो चुके हैं और वो सभी 25 सीटें तीसरी बार जीतकर हैट्रिक लगाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा चुका है।
पहले चरण के इस चुनाव में उत्तरी राजस्थान की तीन प्रमुख सीटों पर भी मतदान होगा और इन तीनों की सीमाएं आपस में जुड़ी हुई हैं तथा एक ही नेचर और राजनीतिक परिस्थितियों की यह सीटें हैं। भाषा, संस्कृति, रहन सहन, खान-पान और जातीय समीकरण भी इन तीनों सीटों पर एक जैसे हैं। इन सीटों के नाम हैं चूरू, झुंझुनूं और सीकर। वर्तमान में तीनों सीटें भाजपा के पास हैं। चूरू और झुंझुनूं में भाजपा व कांग्रेस के बीच आमने-सामने का मुकाबला है, तो सीकर सीट इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (सीपीएम) के लिए कांग्रेस ने छोड़ दी है। यहां मुकाबला सीपीएम और भाजपा के बीच है।
चूरू लोकसभा क्षेत्र
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सबसे पहले बात करें चूरू लोकसभा सीट की। चूरू से भाजपा के लगातार दूसरी बार सांसद रहे राहुल कस्वां का पार्टी ने टिकट काट दिया और वे नाराज होकर कांग्रेस में चले गए तथा कांग्रेस के उम्मीदवार बनकर मैदान में उतर गए, जिससे भाजपा की सारी रणनीति फेल हो गई। भाजपा ने यहां से पैरालिंपियन खिलाड़ी देवेन्द्र झाझड़िया को मैदान में उतारा है, जो देश प्रदेश में बड़ी पहचान तो रखते हैं, लेकिन उनके पास राजनीतिक अनुभव नहीं है, वे सियासी मैदान में पूरी तरह नए हैं।
चूरू जिले की राजनीति में भाजपा नेता राजेन्द्र राठौड़ और राहुल कस्वां परिवार का दबदबा है। राजेन्द्र राठौड़ चूरू विधानसभा सीट से कई बार विधायक रहे हैं तथा चार महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने चूरू की बजाए पड़ौस की तारानगर सीट से चुनाव लड़ा और वे चुनाव हार गए, वे तब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे और मुख्यमंत्री बनने के प्रयास में लगे हुए थे। उन्होंने इस हार के लिए राहुल कस्वां को जिम्मेदार ठहराया, जिन्होंने भाजपा सांसद होते हुए कांग्रेस उम्मीदवार नरेन्द्र बुडानिया की अन्दरखाने मदद की और उन्हें चुनाव जितवा दिया। राजेन्द्र राठौड़ राजपूत समुदाय से हैं और नरेन्द्र बुडानिया व राहुल कस्वां जाट समुदाय से हैं। दोनों समुदायों में राजनीतिक खेमेबाजी जग जाहिर है।
इस हार के बाद राजेन्द्र राठौड़ ने राहुल कस्वां की टिकट कटाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी और वे इसमें सफल भी हो गए तथा उन्होंने राहुल कस्वां की जगह विश्व स्तरीय चर्चित खिलाड़ी देवेन्द्र झाझड़िया को टिकट दिलवा दिया। देवेन्द्र झाझड़िया भी जाट समुदाय से ही हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में राजेन्द्र राठौड़ ने तत्कालीन सांसद राम सिंह कस्वां का भी टिकट कटवाया था, जो कि 1999 से लगातार चूरू से भाजपा के सांसद रहे थे, तब बदले में उनके पुत्र राहुल कस्वां को राजेन्द्र राठौड़ ने टिकट दिलवाया था।
इस क्षेत्र में राजेन्द्र राठौड़ और कस्वां परिवार की गुटबाजी और राजनीतिक लड़ाई किसी से छुपी हुई नहीं है। यही कारण है कि चूरू लोकसभा चुनाव में इस बार का चुनाव भाजपा व कांग्रेस के बीच न होकर राजेन्द्र राठौड़ और कस्वां परिवार के बीच हो रहा है। इस चुनाव के परिणाम से किसी एक का राजनीतिक अन्त भी यहां के राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं।
यहां 5 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी चूरू में सभा हुई और उन्होंने इमोशनल अंदाज में चुनावों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश भी की, लेकिन यहां के धरातल से जुड़े हुए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री की सभा और भाषण में वो उत्साह नहीं था, जैसा 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री की चूरू सभा में था।
चूरू की चुनावी चौपालों में जातीय समीकरण के हिसाब से जो चर्चा है, वो यह है कि जाट वोट देवेन्द्र झाझड़िया और राहुल कस्वां में बंटेंगे। वहीं मूल ओबीसी, राजपूत, ब्राह्मण और वैश्य समुदायों के वोट भाजपा उम्मीदवार देवेन्द्र झाझड़िया को एक तरह से एकतरफा पड़ेंगे। इसी तरह मुस्लिम वोट कांग्रेस के राहुल कस्वां को एक तरह से एकतरफा पड़ेंगे और एससी-एसटी वोट बड़ी संख्या में कांग्रेस को पड़ेंगे। जाट वोटों का रोष राजेन्द्र राठौड़ के खिलाफ है और साथ में राहुल कस्वां के टिकट कटने की सहानुभूति भी है, इसलिए चर्चा यह है कि 70 प्रतिशत से अधिक जाट वोट राहुल कस्वां को पड़ सकते हैं। इस तरह मुकाबला कांटे की टक्कर का भी बताया जा रहा है, वहीं बहुत से लोग स्पष्ट तौर पर चुनावी झुकाव राहुल कस्वां की तरफ भी बता रहे हैं।
एससी-एसटी वोटों का कांग्रेस की तरफ झुकाव का मुख्य कारण यह बताया जा रहा है कि एससी-एसटी वर्ग के पढ़े लिखे लोग अपने समुदाय को यह बात समझाने में सफल हो रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे बड़ा प्रहार आरक्षण पर करेंगे तथा इससे एससी-एसटी समुदाय को जो सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर आरक्षण के माध्यम से मिला है वो समाप्त हो जाएगा और एससी-एसटी वर्ग के लोग उसी दयनीय स्थिति में आ जाएंगे जो स्थिति उनकी 1947 से पहले थी। इस डर से एससी-एसटी वर्ग का वोट बड़ी संख्या में कांग्रेस को मिल सकता है।
यहां एक बात और गौर करने वाली है और वो यह है कि चूरू सीट पर कुल 13 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें भाजपा और कांग्रेस के अलावा बसपा उम्मीदवार भी है। बसपा से देईराम मेघवाल चुनाव लड़ रहे हैं और चूरू लोकसभा सीट की आठ विधानसभा सीटों में से एक राजगढ़ सादुलपुर बसपा के पास है और अगर बसपा उम्मीदवार देईराम मेघवाल को एससी समुदाय का ठीक-ठाक वोट मिल गया, तो इसका नुक़सान कांग्रेस को होना तय है। देईराम मेघवाल जो कि खुद भी एससी वर्ग से ही हैं।
यहां इस कारण भी कांग्रेस का पलड़ा भारी माना जा रहा है कि चूरू लोकसभा की आठ विधानसभा सीटों में से 5 कांग्रेस के पास हैं, जबकि भाजपा के पास सिर्फ दो ही हैं। लेकिन एक कारण और भी है, जो भाजपा को चूरू में ही नहीं बल्कि झुंझुनूं और सीकर में भी बढ़त दिला सकता है और इस कारण की चर्चा सियासी पंडित कर रहे हैं वो यह है कि इन तीनों सीटों पर सरकारी कर्मचारी बड़ी संख्या में हैं और इनमें अधिकतर संख्या जाट और एससी-एसटी समुदाय की है। राजस्थान में राज भाजपा का है, इसलिए सरकारी कर्मचारियों को चुनाव में मदद करने का इशारा किया जा रहा है। अगर यह मदद ढंग से हो गई, तो तीनों सीटों को जीतना भाजपा के लिए आसान हो जाएगा।
झुंझुनूं लोकसभा क्षेत्र
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अब बात झुंझुनूं लोकसभा सीट की। यहां की आठ विधानसभा सीटों में से एक सीट फतेहपुर है जो कि सीकर जिले में आती है। झुंझुनूं विधानसभा सीट से विधायक और पूर्व मंत्री बृजेन्द्र ओला को कांग्रेस ने यहां से लोकसभा प्रत्याशी बनाया है। बृजेन्द्र ओला के पिता शीशराम ओला यहां से कई बार विधायक, सांसद और केन्द्र व राज्य सरकार में मंत्री रहे हैं। ओला परिवार झुंझुनूं क्षेत्र का कद्दावर कांग्रेसी परिवार है। यहां से भाजपा ने शुभकरण चौधरी को मैदान में उतारा है, जो यहां की उदयपुरवाटी विधानसभा सीट से विधायक रहे हैं।
यहां भी चूरू की तरह कांग्रेस और भाजपा में आमने सामने का मुकाबला है और धरातल के सियासी गणित का झुकाव कांग्रेस की तरफ बताया जा रहा है। क्योंकि यहां के जातीय समीकरण और विधायकों की संख्या कांग्रेस को मजबूत स्थिति में बता रहे हैं। यहां की कुल आठ विधानसभा सीटों में से छह सीटें कांग्रेस के पास हैं, भाजपा के पास सिर्फ दो ही सीटें हैं। इसके अलावा यहां के सांसद नरेन्द्र खीचड़ जो कि भाजपा से हैं और भाजपा ने उन्हें चार महीने पहले मंडावा से विधानसभा चुनाव लड़वाया और वे हार गए, इसलिए उनका टिकट काट दिया गया। नरेन्द्र खीचड़ को पूरी तरह से सियासी हाशिए पर लगा दिया गया है और इससे जितना भी हो नुक़सान भाजपा को ही होगा। ऐसी चर्चा झुंझुनूं की सियासी चौपालों में है।
झुंझुनूं में कुल 8 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें कांग्रेस व भाजपा के अलावा तीसरा उम्मीदवार बसपा के बंशीधर को माना जा रहा है। सियासी चर्चा यह है कि बसपा उम्मीदवार अगर 50 हजार के आसपास वोट ले गया तो फिर भाजपा के लिए चुनाव जितना आसान हो जाएगा। हालांकि यहां भी चूरू की तरह कांग्रेस व भाजपा दोनों पार्टियों के उम्मीदवार जाट समुदाय से हैं और जाट वोट दोनों में बंटना तय है। सरकारी कर्मचारियों, एससी-एसटी, मूल ओबीसी, मुस्लिम, ब्राह्मण, वैश्य और जाट वोटों के समीकरण यहां भी चूरू जैसे ही हैं।
यहां विशेष बात यह है कि राजपूत वोट भी अच्छी खासी संख्या में हैं और उनका परम्परागत झुकाव भाजपा की तरफ रहता है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक तो कांग्रेस उम्मीदवार की साॅफ्ट छवि और दूसरा गुजरात में हो रहे राजपूत आंदोलन का प्रभाव झुंझुनूं की सीट पर पड़ना तय है तथा ऐसा होगा तो यह भाजपा के लिए नुकसानदेह और कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है। झुंझुनूं में कांग्रेस उम्मीदवार बृजेन्द्र ओला की छवि और पारिवारिक पृष्ठभूमि से भी कांग्रेस को लाभ मिलने की चर्चा यहां के सियासी धरातल पर है।
सीकर लोकसभा क्षेत्र
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जहां तक इन तीनों सीटों की प्रमुख सीट सीकर लोकसभा की बात है तो सीकर क्षेत्र का बड़ा तेजी से विकसित होता शहर है। इसे राजस्थान का एज्यूकेशन हब माना जाता है। कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार ने इसे सम्भाग भी बना दिया था। सीकर सीट इंडिया गठबंधन के कारण कांग्रेस ने खाली छोड़ दी है और इसे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (सीपीएम) को दी है। सीपीएम के राज्य सचिव और चार बार विधायक रहे कामरेड अमराराम यहां से मैदान में हैं। उन्हें बहुत ही संघर्षशील और जमीन से जुड़ा हुआ नेता ही नहीं बल्कि गरीब गुरबा लोगों के दिलों में बसा हुआ साथी समझा जाता है। सीकर क्षेत्र को कामरेडों के प्रभाव का क्षेत्र और राजस्थान की लाल पट्टी भी माना जाता है।
सीकर लोकसभा की आठ विधानसभा सीटों में से कामरेडों के पास एक भी नहीं है, लेकिन उनके सहयोगी दल कांग्रेस के पास यहां पांच विधानसभा सीटें हैं और तीन भाजपा के पास हैं। यहां मुकाबला सीपीएम के अमराराम और भाजपा के सुमेधानंद सरस्वती के बीच आमने-सामने का है। सुमेधानंद सरस्वती यहां 2014 से लगातार सांसद हैं, तीसरी बार मैदान में हैं। उनकी छवि भी सभी वर्गों में अच्छी बताई जाती है।
अमराराम और सुमेधानंद सरस्वती दोनों जाट समुदाय से हैं, इसलिए यह तय है कि चूरू और झुंझुनूं की तरह यहां भी जाट वोटों का बंटवारा होगा। सियासी गलियारों में जो चर्चा है वो यह है कि जाट किसान वर्ग है और कामरेड अमराराम ने जब से होश संभाला है, वे किसानों मजदूरों के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं, इसलिए जाट समुदाय का वोट अमराराम को अधिक पड़ने की सम्भावना है। मुस्लिम, एससी-एसटी, मूल ओबीसी, ब्राह्मण, वैश्य और सरकारी कर्मचारियों के वोटों के समीकरण यहां भी चूरू और झुंझुनूं जैसे ही बताएं जा रहे हैं।
विशेष बात यह है कि राजपूत समुदाय का यहां स्पष्ट झुकाव सुमेधानंद सरस्वती की तरफ बताया जा रहा है। साथ ही मुस्लिम वोटों में भी सुमेधानंद सरस्वती की कुछ हद तक पकड़ बताई जा रही है और पिछले दो चुनावों में भी उन्हें मुस्लिम वोट ठीक-ठाक मिला बताया जा रहा है, जिसकी वजह सुमेधानंद सरस्वती की खुद की छवि है। सीकर से 14 उम्मीदवार मैदान में हैं और इनमें अमराराम और सुमेधानंद सरस्वती के अलावा बसपा से अमरचंद भी मैदान में हैं। यहां भी चर्चा चूरू और झुंझुनूं जैसी है कि बसपा यहां जो भी वोट लेगी उसका नुकसान कामरेड अमराराम को ही होगा।
यहीं की लक्ष्मणगढ़ विधानसभा सीट से विधायक गोविंद सिंह डोटासरा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष हैं। इस सीट को लेकर डोटासरा की प्रतिष्ठा पूरी तरह दांव पर लगी हुई है। जिसकी वजह यह है कि डोटासरा ने इंडिया गठबंधन के जरिए सीकर सीट कामरेडों को नहीं देने के लिए पार्टी आलाकमान तक जबरदस्त लॉबिंग की बताई जा रही है। लेकिन आलाकमान ने डोटासरा की बात को खास तवज्जोह देने की बजाए यह सीट कामरेडों को दे दी। अब अगर डोटासरा एड़ी चोटी का जोर लगाकर इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार अमराराम को नहीं जितवा पाते हैं, तो उनके सहयोग और क्षेत्र में पकड़ पर सवाल खड़े होंगे, क्योंकि वे इस क्षेत्र के कद्दावर नेता हैं, पीसीसी अध्यक्ष हैं और लगातार चौथी बार विधायक हैं।
सीकर के सियासी धरातल की एक विचित्र चर्चा और है, वो यह है कि अमराराम का फार्म भरवाने की बड़ी सभा में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित कांग्रेस के कमोबेश सभी बड़े नेता शरीक हुए थे और उन्होंने यहां से अमराराम को जिताने की अपील की, लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता उस दिल दिमाग से अमराराम का साथ नहीं दे रहे हैं, जैसे कांग्रेस के उम्मीदवारों का देते हैं। जिसकी वजह यह बताई जा रही है कि अगर एक बार सीकर लोकसभा कामरेडों के पास चली गई तो फिर पंचायती राज चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों में हमारा भविष्य क्या होगा ? यह क्षेत्र पूरी कामरेडों के पास चला जाएगा।
इस डर से कांग्रेस के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता इंडिया गठबंधन की छान चढ़ाने के लिए जोर तो लगा रहे हैं, लेकिन चाहते यह हैं कि कामरेडों की छान आधी अधूरी चढ़कर गिर जाए, ताकि हम भविष्य में हमारी छान चढ़ाने का अवसर नहीं खोएं। यहां के सियासी गलियारों में कांग्रेसियों के भीतरघात के साथ एक और चर्चा भी है कि मौजूदा चुनाव बहुत खर्चीले हो गए हैं और कामरेडों के पास भाजपा के मुकाबले धन का बहुत बड़ा अभाव है, जो भाजपा के लिए वरदान बन सकता है।
चूरू, झुंझुनूं और सीकर तीनों सीटों पर एक और मुद्दा भी चर्चा में है और वो यह है कि इन तीनों सीटों पर अच्छे खासे मुस्लिम वोट हैं और चूरू सीट मुस्लिम को कांग्रेस देती आ रही है, लेकिन इस बार न सिर्फ चूरू बल्कि राजस्थान की किसी भी सीट से मुस्लिम उम्मीदवार कांग्रेस ने नहीं उतारा है। ऐसा पहली बार हुआ है, जिससे मुस्लिम वोटों में इस बात को लेकर नाराजगी है, जिसका नुकसान जितना भी हो तीनों सीटों पर कांग्रेस गठबंधन को होना तय है। यहां की झुंझुनूं सीट पर चार बार कांग्रेस ने वीर चक्र विजेता कैप्टन मोहम्मद अय्यूब खान को टिकट दिया था और वे दो बार चुनाव जीते थे। वे केन्द्र में मंत्री भी रहे थे। इसके बावजूद कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को नजर अंदाज करना यह माना जा रहा है कि कांग्रेस भी अब मुसलमानों को लेकर भाजपा के नक्शे कदम पर चलने लग गई है।
अब असल परिणाम तो 4 जून को मतगणना के दिन ही मालूम होगा कि इन तीनों सीटों का सियासी ऊंट किस करवट बैठता है ? लेकिन धरातल की चर्चा में चूरू और झुंझुनूं कांग्रेस के लिए मजबूत मानी जा रही हैं, वहीं सीकर की दारोमदार कांग्रेस नेताओं व कार्यकर्ताओं की वफादारी पर है कि वे इंडिया गठबंधन के साथी को चुनाव जीताते हैं या नहीं। जहां तक भाजपा का सवाल है तो उसकी स्थिति इन तीनों सीटों पर कमजोर तो है, जो खुली नजर भी आ रही है, लेकिन इतनी कमजोर भी नहीं है कि वो तीनों सीटें बहुत बड़े अंतर से हार जाए। अगर भाजपा अपनी रणनीति में बदलाव करे, तो वो परिणाम बदल भी सकती है। इस बार तीनों सीटों पर चुनाव बहुत ही रोचक हो चुका है, दोनों ही पक्ष चुनाव परिणाम को अपने फेवर में भी कर सकते हैं और अगर हल्के से भी चूक गए तो रन आउट होकर पवेलियन भी लौट सकते हैं।
(08/04/2024)
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