विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव में क्यों ठगा सा महसूस कर रहा है मुस्लिम समुदाय ?

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव में क्यों ठगा सा महसूस कर रहा है मुस्लिम समुदाय ?

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। हमारे देश भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है। जिसकी वजह यह है कि यहां समय पर चुनाव होते हैं और 97 करोड़ वोटर हैं, क‌ई देशों को मिलाएं तो इतनी उनकी कुल जनसंख्या भी नहीं बनती है। इस समय हमारे यहां लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं, जिसमें सभी समुदायों के मुद्दे राजनीतिक दल उठा रहे हैं। एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस आदि सभी आरक्षित वर्गों की भी बात हो रही है। इन मुद्दों को अपने अपने अंदाज में सभी राजनीतिक दल खुलेआम उठा रहे हैं। देश में अल्पसंख्यक समुदाय मुस्लिम जो कि दूसरी सबसे बड़ी आबादी है, जिसे 25 करोड़ के करीब माना जाता है, जो विश्व में सबसे अधिक हमारे देश में ही है।


मुस्लिम समुदाय इस चुनाव में अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहा है, जिसकी वजह यह है कि भाजपा मुसलमानों के मुद्दों को टच नहीं करती है, टच करती है तो ध्रुवीकरण के लिए नफ़रती अंदाज में टच करती है। कांग्रेस सहित कुछ तथाकथित सेक्यूलर पार्टियां भी भाजपा की चाल चलने लग गई हैं। इन्होंने भी मुसलमानों को कटी पतंग बना दिया है। मुसलमानों के नाम पर चलने वाली सियासी पार्टियों का अव्वल तो कोई बड़ा वजूद नहीं है और वे राजनीति की बजाए मजहबी तंजीमें ज्यादा लगती हैं। साथ ही इन पार्टियों पर भाजपा की बी टीम होने के आरोप न सिर्फ तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों के नेता लगाते हैं बल्कि बहुत से मुस्लिम भी इन्हें भाजपा को फायदा पहुंचाने वाली पार्टियां मानते हैं।

ऐसे में मुसलमान सियासी तौर पर क्या करे ? यह चिंता मुस्लिम समुदाय में हर जगह मिलती है। इसका जवाब यह है कि जिस तरह दूसरी कौमें किसी एक पार्टी का वोट बैंक बनने की बजाए सभी पार्टियों से जुड़ी हुई हैं, मुस्लिम को भी हर पार्टी में होना चाहिए ताकि कोई सुनवाई हो। साथ ही मुस्लिम को तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों के चक्कर में पड़ कर सियासी फुटबॉल नहीं बनना चाहिए, कोई जीते कोई हारे इसके लिए ज्यादा उछल कूद करने की बजाए खुद के बारे में सोचना चाहिए कि हमारी बुनियादी जरूरतें क्या हैं और हमारा भला कैसे हो सकता है ?

आज जरूरत इस बात की है कि मुसलमानों को गम्भीरता से अपने आप पर ध्यान देना चाहिए, सियासी फुटबॉल बनने और तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों से वोट बैंक का कंधा निकाल लेना चाहिए। हालात तेजी से बदल रहे हैं और इन तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों की जो जिम्मेदारी बनती थी वो उन्होंने वक्त पर अदा नहीं की, इनका कुछ नहीं बंट रहा है, इसलिए मुसलमानों को गैर जरूरी टारगेट नहीं बनना चाहिए। इन तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों ने अपने शासनकाल में विशेष ध्यान सभी वर्गों और साथ में मुस्लिम समुदाय पर भी दिया होता तो आज न देश की यह हालत होती और ना ही मुस्लिम समुदाय पिछड़ों से भी ज्यादा पिछड़ा नहीं होता।

आज तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों की जो हालत हुई है, वो उनके नेताओं की हरामखोरी, खुदगर्जी, खुद के परिवार को आगे बढ़ाने और चम्मचों से घिरे रहने के कारण हुई है। कोई जीते कोई हारे, यह फ़िक्र मुसलमानों की अब नहीं होनी चाहिए, मुसलमानों को पार्टी नहीं बनना चाहिए। मुसलमानों ने 2014 और 2019 में गिन गिन कर थोक में तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों को वोट किया मोदी को रोकने के लिए, नतीजा सबके सामने है। इसलिए मुसलमानों को पूरी ताकत अपने घर परिवार, रिश्तेदारों का ख्याल रखने तथा पड़ौसियों, मुसाफिरों और हर जरूरतमंद से अच्छा सुलूक करने और तालीम व कारोबार को मजबूत करने और सरकारी नौकरी हासिल करने पर लगानी चाहिए। इन तथाकथित सेक्यूलर नेताओं को इनके भरोसे छोड़ देना चाहिए।
(20/05/2024)
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