ओबीसी आरक्षण से मुस्लिम जातियों को हटाने की सियासी बयानबाजी से जबरदस्त रोष
ओबीसी आरक्षण से मुस्लिम जातियों को हटाने की सियासी बयानबाजी से जबरदस्त रोष
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कायमखानी सहित सभी ओबीसी मुस्लिम जातियां एकजुट होकर मजबूती से जद्दोजहद करने की तैयारी में
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मंडल कमीशन और अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों के तहत संवैधानिक प्रावधान के दायरे में दिए गए आरक्षण को लेकर उठते सवालों पर एक्सपर्ट के विचारों एवं तथ्यों के साथ प्रकाशित विस्तृत रिपोर्ट... इसे आखिर तक जरूर पढ़िए।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। सबसे पहले लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान के बांसवाड़ा में आयोजित चुनावी सभा में मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा उठाया। जो पूरी तरह तथ्यों से हटकर और चुनावी ध्रुवीकरण और आचार संहिता के खिलाफ था। क्योंकि देश में मुस्लिम के नाम पर कहीं भी आरक्षण नहीं मिला हुआ है, जो भी आरक्षण मुस्लिम जातियों को मिला हुआ है वो पिछड़ेपन के आधार पर संवैधानिक प्रावधान के तहत ओबीसी के नाम पर मिला हुआ है।
ओबीसी आरक्षण न हिन्दू के नाम पर मिला हुआ है और ना ही मुस्लिम, सिख, ईसाई या किसी और मजहबी पंथ के नाम पर। ओबीसी आरक्षण केन्द्र और राज्यों में बी पी मंडल कमीशन की सिफारिशों के तहत मिलना शुरू हुआ था। बाद में इस ओबीसी आरक्षण की सूची में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्ययन, सर्वे, सुनवाई और सरकार को सम्बंधित जाति के लिए की गई सिफारिश के तहत ओबीसी आरक्षण दिया गया। प्रधानमंत्री की मुस्लिम आरक्षण को लेकर की गई टिप्पणी के बाद कई भाजपा नेता भी यही वाणी बोलने लग गए। प्रधानमंत्री ने भी बांसवाड़ा के बाद कमोबेश हर सभा में मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर नफ़रती माहौल बनाने की कोशिश की, लेकिन जनता ने प्रधानमंत्री की इस टीका टिप्पणी को गम्भीरता से नहीं लिया। क्योंकि सबको मालूम है कि यह आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं बल्कि पिछड़ेपन के आधार पर संवैधानिक प्रावधान के दायरे में मिला हुआ है तथा प्रधानमंत्री और भाजपाई नेता इस टीका टिप्पणी के जरिए संवैधानिक प्रावधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं।
लगातार हो रही इस सियासी बयानबाजी को लेकर ओबीसी मुस्लिम जातियों में जबरदस्त रोष है। राजस्थान में भी भाजपाई नेताओं द्वारा की गई टीका टिप्पणी और उस हुए मीडिया कवरेज से ओबीसी मुस्लिम जातियों में यह चिंता साफ नजर आ रही है कि अगर सरकार ने ऐसा कोई एक्शन लेना शुरू किया तो क्या किया जाए ? इसके लिए सभी ओबीसी मुस्लिम जातियों के संगठन और पदाधिकारी सक्रिय हो गए हैं और वे एकजुट होकर मजबूती से इस मुद्दे पर जद्दोजहद करने की तैयारी कर रहे हैं। इस लेख में आगे विभिन्न ओबीसी मुस्लिम जातियों के जिम्मेदार लोगों और आरक्षण के जानकार लोगों के विचार हैं, जिन्हें पूरा और बारीकी से पढ़िए ताकि अच्छी तरह से समझ आ जाए कि ओबीसी आरक्षण क्या है और यह मुस्लिम जातियों को कैसे दिया गया ? तथा प्रधानमंत्री सहित भाजपा नेताओं द्वारा की जा रही सियासी बयानबाजी संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ कैसे है ?
आरक्षण का इतिहास और ओबीसी जातियों को आरक्षण का प्रावधान
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हमारे देश में आरक्षण की सर्व प्रथम शुरुआत 1902 में तत्कालीन कोल्हापुर रियासत में वहां के जन हितैषी शासक शाहू जी महाराज ने की थी। उन्होंने अपनी रियासत के प्रशासन में सभी जातियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 50 प्रतिशत सीटें गैर ब्राह्मण सभी जातियों (एससी-एसटी और ओबीसी) के लिए आरक्षित की थी। इसके बाद 14 जून 1936 को तत्कालीन त्रावनकोर रियासत में भी आरक्षण का अनुसरण किया गया, यह आरक्षण प्रत्येक समुदाय को उसकी संख्यात्मक ताकत के आधार पर दिया गया। दूसरी गोलमेज कांफ्रेंस के दौरान बाबा साहेब अम्बेडकर ने दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग रखी। जिसका कांग्रेस ने विरोध किया और स्वयं महात्मा गांधी ने बाबा साहेब अम्बेडकर से यह मांग छोड़ने का आग्रह किया, लेकिन बाबा साहेब अम्बेडकर ने गांधी से कहा कि "मैं जिन वर्गों के लिए न्याय की मांग कर रहा हूं उन्हें विशेष अवसर दिए बिना कुछ भी हासिल नहीं होगा।"
बाद में महात्मा गांधी ने इस मुद्दे के विरोध में आमरण अनशन कर दिया। आमरण अनशन के दौरान गांधी की हालत बिगड़ने लगी, तब उस समय के बड़े कांग्रेसी नेता पंडित मदनमोहन मालवीय सहित अम्बेडकर से मिले और उनसे गांधी की ज़िन्दगी बचाने का आग्रह किया। तब बाबा साहेब अम्बेडकर ने कुछ नरम रूख अपनाते हुए दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के लिए आजाद भारत में सरकारी नौकरियों, शिक्षण संस्थानों और विधायिकाओं में आरक्षण का प्रावधान करने का विकल्प रखा, जिस पर पूना पैक्ट हुआ। जो कि आगे चलकर आजाद भारत में आरक्षण का आधार बना और उसके अनुरूप आजाद भारत के संविधान में आरक्षण के प्रावधान किए गए।
इसके अलावा कांग्रेस की ब्राह्मणवाद परस्ती के कारण ही द्रविड़ आंदोलन के प्रणेता पैरियार ने 1925 में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी। वे लगातार कांग्रेस के पांच अखिल भारतीय सम्मेलनों में गैर ब्राह्मण जातियों को प्रतिनिधित्व दिलाने की मांग करते रहे। लेकिन उन्हें हमेशा अनसुना किया गया। 1925 के सम्मेलन में कहा गया कि अपने प्रस्ताव के समर्थन में अन्य प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर कराएं। उन्होंने 100 से अधिक प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर करवा दिए। फिर भी उनका प्रस्ताव विचारार्थ नहीं लिया गया। इससे खिन्न होकर पैरियार ने कांग्रेस छोड़ दी और द्रविड़ आंदोलन को तेज किया। जो आगे चलकर तमिलनाडु में कांग्रेस के सफाए का कारण बना और दक्षिण भारत में आरक्षण के पक्ष में मजबूत जन दबाव भी निर्मित हुआ। इसी के चलते दक्षिणी राज्यों में अलग-अलग आयोग गठित करके आरक्षण का प्रावधान किया गया। जो कि संविधान की 9वीं अनुसूची के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त भी है।
1953 में देश के पैमाने पर ओबीसी आरक्षण के लिए भारत सरकार ने काका कालेलकर आयोग बनाया, उसकी रिपोर्ट 1955 में आ गई, जिसको तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने लागू नहीं किया। इसके विरोध में आंदोलन के लिए बाबा साहेब अम्बेडकर, समाजवादी नेता डॉक्टर राममनोहर लोहिया और पैरियार के बीच में पत्राचार और विचार विमर्श हुआ। लोहिया और अम्बेडकर के बीच में बनी सहमति के आधार पर मिलकर साझा आंदोलन चलाने की घोषणा की गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह कहकर उनका मजाक उड़ाया कि "दो डाॅक्टर मिलकर आसमान में महल बना रहे हैं।" दुर्भाग्य से 6 दिसम्बर 1956 को बाबा साहेब डॉक्टर अम्बेडकर का निधन हो गया। बाद में उस मुहिम को डॉक्टर लोहिया के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी ने चलाया।
सोशलिस्ट पार्टी ने 1977 में बनी जनता पार्टी में इस शर्त पर विलय कुबूल किया था कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया जाएगा। एक तरफ केन्द्रीय सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी आरक्षण के लिए बी पी मंडल आयोग का गठन किया गया, तो दूसरी तरफ समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने ओबीसी आरक्षण राज्य स्तर पर लागू कर दिया। जिसमें पिछड़ेपन के आधार पर हिन्दू और मुस्लिम दोनों जातियों को शामिल किया गया। कर्पूरी ठाकुर की सरकार में जनसंघ (वर्तमान भाजपा) भी शामिल थी। यह आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं दिया गया था बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था।
1980 के प्रारंभ में मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सौंप दी। कांग्रेस के दो प्रधानमंत्रियों (इंदिरा गांधी और राजीव गांधी) ने अपने लगातार 10 साल के शासन में मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू नहीं किया। समाजवादियों की मजबूत ताकत के सहारे 1988 में गठित जनता दल ने ओबीसी आरक्षण को अपने घोषणा पत्र का अहम मुद्दा बनाया। सरकार बनने के बाद 13 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करते हुए केन्द्रीय सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण देने का निर्णय लिया, इसमें हिन्दू मुस्लिम सभी ओबीसी जातियां शामिल थी, जिनकी सिफारिश मंडल कमीशन ने की थी। तब जनता दल सरकार को भाजपा बाहर से समर्थन दे रही थी। इसी बीच मंडल कमीशन लागू करने से खिन्न होकर भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में देशव्यापी राम रथ यात्रा निकाली और वी पी सिंह सरकार को समर्थन वापस लेकर गिरा दिया। इसी के साथ राज्यों में भी ओबीसी आरक्षण देना शुरू कर दिया गया। यह सब कुछ मंडल कमीशन की सिफारिशों के तहत किया गया।
इस बीच एक विशेष बात यह भी हुई कि जनता दल सरकार द्वारा जारी ओबीसी आरक्षण की अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। फिर 1991 में कांग्रेस की सरकार केन्द्र में बनने के बाद इस आरक्षण में आर्थिक आधार को भी जोड़ दिया गया। यह भी सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज हुआ तथा पांच जजों की संविधान पीठ ने इस सम्पूर्ण मुद्दे की सुनवाई की। संविधान पीठ ने जनता दल सरकार द्वारा जारी सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर आरक्षण दिए जाने की अधिसूचना को बहाल रखा और सही ठहराया तथा इसके विपरित कांग्रेस सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के पक्ष में जारी अधिसूचना को खारिज करते हुए असंवैधानिक करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई और निर्णय में एक ऐतिहासिक भूमिका समाजवादी नेता मधु लिमये की रही, जो कि इस प्रकरण में इंटरविनर (दखल कर्ता) बने तथा स्वयं पैरवी करने की माननीय सुप्रीम कोर्ट से इजाजत प्राप्त की। सुप्रीम कोर्ट से मिली इजाजत के बाद इस प्रकरण में पैरवी करते हुए मधु लिमये ने सभी ऐतिहासिक तथ्यों को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखा। संविधान पीठ के विद्वान जजों ने यह टिप्पणी की कि "यदि मधु लिमये ने इंटरविनर बनकर सारे तथ्यों को नहीं रखा होता तो निर्णय अन्यथा भी हो सकता था।" संविधान पीठ का यह निर्णय 16 नवम्बर 1992 को आया था।
इस निर्णय के बाद राजस्थान में ओबीसी आरक्षण राष्ट्रपति शासन के दौरान 28 सितम्बर 1993 को तत्कालीन राज्यपाल बलीराम भक्त ने लागू किया था, इस आरक्षण में हिन्दू मुस्लिम सभी ओबीसी जातियां शामिल की गई, जिनकी मंडल कमीशन ने सिफारिश की थी। फिर भैरोंसिंह शेखावत और वसुंधरा राजे के नेतृत्व में 15 वर्ष तक भाजपा की सरकारें रही, लेकिन इस आरक्षण पर भाजपा ने कभी सवाल नहीं उठाया तथा ना ही इस निर्णय को बदला। बाद में राजस्थान राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश पर शेष अन्य ओबीसी जातियों को भी आरक्षण सूची में शामिल किया गया। जिनमें जाट, कायमखानी, मेव, सिन्धी मुस्लिम आदि प्रमुख हैं। यह समस्त ओबीसी आरक्षण धर्म की बजाए सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर संवैधानिक व्यवस्था के तहत दिया था। इस आरक्षण व्यवस्था के विरुद्ध कोई भी बात करता है तो वो संविधान विरोधी बात है।
इस सन्दर्भ में एक विशेष मुद्दा यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस मुस्लिम आरक्षण को लेकर जो गैर जरूरी और तथ्यहीन बातें कह कर वोटों के लिए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण एवं नफ़रती माहौल बना रहे हैं, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि गुजरात में भी ओबीसी आरक्षण के तहत कुछ मुस्लिम जातियों को पहले से आरक्षण दिया गया है तथा केन्द्रीय सूची में भी कुछ पिछड़ी मुस्लिम जातियों को आरक्षण पहले से मिला हुआ है। मोदी लगातार 12 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और अब 10 साल से प्रधानमंत्री हैं। इस सन्दर्भ में एक सवाल यह भी है कि जम्मू-कश्मीर में पहले महबूबा मुफ्ती के साथ भाजपा सरकार में रही, फिर अगस्त 2019 से जम्मू-कश्मीर केन्द्र शासित प्रदेश है। वहां मुस्लिम गुर्जर जाति को अनुसूचित जनजाति में आरक्षण मिला हुआ है। यह आरक्षण मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए अब तक जारी है। क्या प्रधानमंत्री मोदी इन दोनों मुद्दों पर भी कुछ बोलेंगे ?
-अर्जुन देथा
समाजवादी नेता और आरक्षण के जानकार।
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"अशोक गहलोत साहब के पहले कार्यकाल में जो ओबीसी कमीशन गठित किया गया था, तो उसमें मुझे भी मेम्बर बनाया गया था। मैंने और हमारे साथियों ने पिछड़े मुस्लिम इलाकों मेवात, जैसलमेर, बाड़मेर, भीलवाड़ा, अजमेर आदि का दौरा किया। भीलवाड़ा के कायमखानी गांवों में भी हम गए। हमने मुस्लिम समुदाय की पिछड़ी जातियों की स्थिति का अध्ययन किया, उनके द्वारा दी गई तथ्यात्मक रिपोर्ट और आंकड़ों का विश्लेषण और जांच पड़ताल की। फिर हमारे कमीशन ने राजस्थान सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके आधार पर सरकार ने कायमखानी, सिंधी मुस्लिम, मेव सहित विभिन्न जातियों को आरक्षण दिया था। यह आरक्षण सिर्फ पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था, इसमें धर्म का कोई लेना-देना नहीं था और यह आरक्षण पूरी तरह से संवैधानिक दायरे के तहत दिया गया था।"
-एडवोकेट सय्यद दौलत अली चित्तौड़गढ़
पूर्व सदस्य
राजस्थान राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग।
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"राजस्थान में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 21 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण दे रखा है। इस आरक्षण में हिन्दू मुस्लिम सभी पिछड़ी जातियां शामिल हैं। जिन्हें मंडल कमीशन की सिफारिश और बाद में स्टेट ओबीसी कमीशन की सिफारिश के अनुसार राज्य सरकार ने आरक्षण दिया था। इस ओबीसी आरक्षण की सूची में कायमखानी सहित विभिन्न पिछड़ी मुस्लिम जातियां भी शामिल हैं। भाजपा इस मुद्दे को लेकर सिर्फ साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर रही है। यह आरक्षण धर्म की बजाए पिछड़ेपन के आधार पर पूरी संवैधानिक प्रक्रिया के तहत दिया गया था। खास बात यह भी है कि 2017 में राजस्थान की भाजपा सरकार ने कायमखानी जाति को केन्द्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने के लिए सिफारिशी पत्र भी लिखा था। हम राज्य सरकार से बराबर सम्पर्क में हैं और उम्मीद करते हैं कि मुख्यमंत्री जी ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे, जिससे समाज में अशांति फैले और पिछड़े लोगों के साथ धर्म के नाम पर कोई अन्याय हो। राजस्थान कायमखानी महासभा पिछड़ी जातियों की इस जद्दोजहद में पूरी तरह उनके साथ है।"
-लेफ्टिनेंट कर्नल शौकत अली खान (रिटायर्ड)
संयोजक
राजस्थान कायमखानी महासभा।
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"अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में मुस्लिम जातियों को मिले आरक्षण की समीक्षा करने के राजस्थान सरकार के मंत्री अविनाश जी के बयान से मुस्लिम संगठनों में नाराज़गी है। ओबीसी मुस्लिम समाज मंत्री के बयान का कड़ा विरोध करता है। राजस्थान में सिंधी मुस्लिम, कायमखानी, देशवाली, मनिहार, बिसायती, चौपदार, कसाई, खेलदार, मिरासी, धोबी, लोहार, तेली, भिश्ती, मंसूरी, जुलाहा, सिपाही आदि कई मुस्लिम जातियों को ओबीसी आयोग की सिफारिश के आधार पर आरक्षण दिया गया था। ओबीसी में मिले मुस्लिम जातियों के आरक्षण के साथ छेड़छाड़ की गई तो सभी ओबीसी मुस्लिम संगठन एकजुट होकर आंदोलन करेंगे।"
-मेवे खान मंगलिया
प्रदेश संयोजक
सिंधी मुस्लिम समाज महापंचायत जैसलमेर
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"हमारे संविधान में ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था है, जो पिछड़ेपन के आधार पर है। इसलिए देश में जो जातियां सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक आधार पर पिछड़ी हुई हैं वे ओबीसी आरक्षण की हकदार हैं। ओबीसी आरक्षण में किसी जाति का शामिल करने का आधार हिन्दू मुस्लिम के नाम पर नहीं होता है बल्कि पिछड़ेपन के आधार पर होता है। इसलिए राजस्थान में जितनी भी मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण दिया गया है वो धर्म के आधार पर न होकर पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया है, जिसमें हमारी कायमखानी जाति भी शामिल है। यह आरक्षण मंडल कमीशन की सिफारिशों के अनुरूप दिया गया है। सबका साथ सबका विकास तभी सम्भव है, जब देश की सभी जातियों का पिछड़ापन दूर हो। पिछले कुछ दिनों से चुनावी लाभ के लिए मुस्लिम आरक्षण के नाम पर अनावश्यक टिप्पणियां कर मुस्लिम ओबीसी जातियों को टारगेट बनाया जा रहा है, जो ग़लत है। मंडल कमीशन की सिफारिशों के अनुसार सभी धर्मों की पिछड़ी जातियों को बिना किसी भेदभाव के यह आरक्षण मिलता रहना चाहिए। हमें अपने हक़ (ओबीसी आरक्षण) के लिए संघर्ष करने के लिए तैयार रहना चाहिए।"
-हाजी रणजीत खां पहाड़ान
अध्यक्ष
राजस्थान कायमखानी शोध संस्थान जोधपुर।
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"राज्य सरकार द्वारा जारी अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में 50 नंबर पर सम्मिलित चीता-मेहरात (काठात) समाज 1993 से पूर्व ही पिछड़ी जाति की सूची में सम्मिलित था, जिसका आधार सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ापन है। इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है। अजमेर मेरवाड़ा के अरावली पर्वत श्रृंखला में आबाद चीता -मेहरात (काठात) बिरादरी एक मार्शल कौम है। जिसका सेना में इतिहास बहुत स्वर्णिम है, इस समाज के दो दर्जन से ज्यादा सैनिकों ने देश के लिए शहादत दी है।
शैक्षणिक व आर्थिक आधार पर पिछड़ेपन के कारण सरकार ने जब अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में संशोधन करके सूची जारी की तो बहुत ही सोच विचार कर, सर्वे करके तथा हमारे समाज के प्रतिनिधियों से लंबी वार्तालाप के बाद हमारे समाज को ओबीसी में जोड़ा था। अब यदि कोई अपने राजनीतिक लाभ के लिए यह निराधार आरोप लगाए की धर्म के आधार पर हमारे समाज को आरक्षण दिया जा रहा है तो यह बेबुनियाद बात है, संविधान के प्रावधानानुसार ओबीसी का आरक्षण हमारे समुदाय को मिल रहा है।
हम सब जानते हैं कि भारत में हिंदू व मुसलमान दोनों वर्गों में जातियों का समूह विद्यमान है, जहां हर जाति का अपना एक अलग विधान है, उनकी अपनी खासियत है, इसी प्रकार चीता- मेहरात (काठात) समुदाय में भी बहुत सारी खूबियां विराजमान हैं, यह समाज आपस में ही शादी ब्याह करता है, किसी अन्य बिरादरी में वैवाहिक संबंध नहीं किए जाते हैं। इस समुदाय की अपनी महासभा और पंचायत है, जो इसके फैसले खुद करती है। अतः माननीय मुख्यमंत्री और माननीय सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्री द्वारा पिछले दिनों दिए गए बयान की हम निंदा करते हैं, जिसमें बेबुनियाद तरीके से कहा गया है कि मुस्लिम जातियों (चीता-मेहरात, काठात) को दिए गए आरक्षण को खत्म किया जाएगा, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों को दिए गए आरक्षण का आधार धार्मिक ना होकर पिछड़ापन है। देश सेवा का जज़्बा रखने वाले हमारे समुदाय में एक भी राज्य प्रशासनिक सेवा, भारतीय प्रशासनिक सेवा, रेलवे प्रशासनिक सेवा और तहसीलदार प्रशासनिक सेवा का अधिकारी नहीं है। जो ओबीसी में आरक्षण का मुख्य आधार है। फिर भी समीक्षा के नाम पर कोई हस्तक्षेप होता है तो इसके लिए न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाना पड़े तो खटखटाया जाएगा।"
-प्रोफेसर जलालुद्दीन काठात
पूर्व अध्यक्ष राजस्थान चीता -मेहरात (काठात) महासभा, ब्यावर।
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"राजस्थान में जिस तरह अन्य ओबीसी जातियों को आरक्षण मिला, उसी प्रावधान के तहत कायमखानी जाति को भी आरक्षण मिला है। यह आरक्षण राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्ययन, सुनवाई और कायमखानी बाहुल्य कुछ गांवों में दौरा करने के बाद आयोग की सिफारिश पर राज्य सरकार ने दिया था। कायमखानी ओबीसी आरक्षण में राजस्थान पिछड़ा वर्ग आयोग के तत्कालीन सदस्य एवं वरिष्ठ एडवोकेट सय्यद दौलत अली साहब (चित्तौड़गढ़) का विशेष योगदान रहा है। दौलत साहब ने भीलवाड़ा जिले के कुछ कायमखानी गांवों का दौरा कर कायमखानी जाति के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन को बारीकी से देखा और फिर पूरी संवैधानिक प्रकिया के तहत आयोग की सिफारिश पर यह आरक्षण दिया गया।
कायमखानी ओबीसी आरक्षण में राजस्थान कायमखानी महासभा के तत्कालीन संयोजक जी ख़ान साहब, पूर्व मंत्री यूनुस साहब और उनकी टीम का भी विशेष सहयोग रहा है। राजस्थान ओबीसी आयोग के सदस्य दौलत साहब जब कायमखानी बाहुल्य गांवों में कायमखानी जाति की सामाजिक , शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति का जायजा लेने के लिए पहुंचे, तो मुझ नाचीज़ सहित जी ख़ान साहब की पूरी टीम मौके पर मौजूद थी। तब रमज़ान का महीना था और मैं सर्किट हाउस में ठहरी इस टीम के लिए साईकिल पर सहरी का खाना ले जाया करता था। बड़ी जद्दोजहद के बाद यह आरक्षण मिला था। ओबीसी आरक्षण से मुस्लिम जातियों को हटाने की जो सियासी बयानबाजी हो रही है, उसका यदि सरकार क्रियान्वयन करने का प्रयास करती है, तो सभी ओबीसी मुस्लिम जातियों के साथ कायमखानी जाति इस जद्दोजहद में अपना तन, मन और धन सब कुछ लगाएगी और जो भी रणनीति बनेगी उसके तहत काम करेगी।"
-मोहम्मद खां चित्तौड़गढ़
महासचिव
कायमखानी वेलफेयर ट्रस्ट जयपुर।
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"ओबीसी आरक्षण से छेड़छाड़ को कोई भी ओबीसी जाति स्वीकार नहीं करेगी। भाजपा नेता इस बयानबाजी से हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनकी यह कोशिश अब सफल नहीं होगी। मुस्लिम जातियों को भी उसी संवैधानिक प्रावधान के तहत ओबीसी आरक्षण दिया गया है, जिसके तहत हिन्दू ओबीसी जातियों को आरक्षण दिया गया है। इस मुद्दे पर सभी ओबीसी जातियों को संगठित होकर ओबीसी आरक्षण को बचाना चाहिए, आज जो जातियां खामोश हैं अगला नम्बर उनका ही है।"
-डॉक्टर शहाबुद्दीन खान
महासचिव
प्रदेश मुस्लिम तेली महासभा (तंजीम) राजस्थान।
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"ओबीसी आरक्षण को लेकर की जा रही राजनीतिक बयानबाजी और उसमें मुस्लिम ओबीसी जातियों को आरक्षण सूची से बाहर करने की बातें किसी के हित में नहीं हैं। ऐसी राजनीतिक बयानबाजी की कायमखानी विरासत एवं वंशावली संरक्षण समिति कड़ी निन्दा करती है। राजस्थान में कायमखानी सहित विभिन्न पिछड़ी मुस्लिम जातियां ओबीसी आरक्षण सूची में शामिल हैं। इस मुद्दे पर कायमखानी विरासत एवं वंशावली संरक्षण समिति के फाउंडर मेम्बर ने 26 मई 2024 को एक वर्चुअल मीटिंग आयोजित कर कड़ी निन्दा की है और इस मामले में जो भी आवश्यक कदम होगा उसे उठाने की बात कही है।
कायमखानी सहित राजस्थान की विभिन्न मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण सूची में मंडल कमीशन और ओबीसी आयोग की सिफारिश से पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए संवैधानिक दायरे के तहत आरक्षण दिया है। यह आरक्षण धर्म के आधार पर न होकर सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया है। जिस पर सवाल उठाना और इसके खत्म करने की राजनीतिक बयानबाजी करना गैर जरूरी और समाज में अशांति फैलाने वाली है।
अगर राजस्थान में कायमखानी सहित विभिन्न मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण सूची से हटाने की कोई सरकारी प्रक्रिया शुरू की गई, तो कायमखानी विरासत एवं वंशावली संरक्षण समिति इस मुद्दे पर सिन्धी मुस्लिम, मेव, देशवाली, सिलावट, तेली, कुरैशी, मंसूरी, अन्सारी, गद्दी, भिश्ती, मिरासी आदि सभी मुस्लिम ओबीसी जातियों को साथ लेकर जो भी उचित जद्दोजहद होगी वो करेगी। इसके लिए मुख्यमंत्री जी से भी मिलने की कोशिश करेगी और आवश्यक हुआ तो माननीय उच्च न्यायालय की शरण में भी जाएगी तथा इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी करेगी।"
-कप्तान फजरू खां
अध्यक्ष
कायमखानी विरासत एवं वंशावली संरक्षण समिति।
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"राजस्थान में ओबीसी आरक्षण ओबीसी आयोग की सिफारिश पर सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर संवैधानिक तरीके से दिया गया है ना की धार्मिक आधार पर। क्योंकि इसमें हिन्दू मुस्लिम सभी धर्मों की विभिन्न पिछड़ी जातियां शामिल हैं। माननीय प्रधानमंत्री जी का भी यही उद्देश्य है कि पसमांदा मुस्लिम (पिछड़ी मुस्लिम जातियों) का उत्थान हो, इसलिए माननीय मुख्यमंत्री जी से गुज़ारिश है कि ओबीसी आरक्षण बरकरार रखा जाए और पसमांदा मुस्लिम जातियों के विकास के लिए विशेष योजनाएं बनाई जाएं ताकि पसमांदा मुस्लिम समुदाय भी तरक्की कर सके।"
-एडवोकेट नवीद अशफ़ाक रज़ा भाईजान
संयोजक
ऑल राजस्थान जुलाहा (अंसारी) समिति बारां।
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"ओबीसी आरक्षण की समीक्षा और मुस्लिम ओबीसी जातियों को हटाने की सियासी बयानबाजी सिर्फ ध्रुवीकरण और नफ़रती माहौल को बढाने वाली है। मेव सहित राजस्थान की जितनी भी मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण की सूची में शामिल किया गया है, वो पूरी तरह से संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार पिछड़े वर्ग आयोग की सिफारिश पर शामिल किया गया है। यह आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था।"
-अरशद खान
अध्यक्ष
राजस्थान मेव महासभा।
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"ओबीसी आरक्षण को लेकर की जा रही बयान बाजी और उसमें मुस्लिम ओबीसी जातियों को आरक्षण सूची से बाहर करने की बातें किसी के हित में नहीं हैं, ऐसी बयानबाजी की ऑल इण्डिया जमीयतुल कुरैश जयपुर कड़े शब्दों में निंदा करती है। राजस्थान की भजनलाल सरकार के कुछ नेता ओबीसी आरक्षण से मुस्लिम जातियों को हटाने की मांग कर रहे हैं। ओबीसी आरक्षण कुरैशी समाज सहित विभिन्न मुस्लिम जातियों को मंडल कमीशन और ओबीसी आयोग की सिफारिश से पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए संवैधानिक प्रावधान के अनुसार दिया गया है। यह आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं बल्कि पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया है।"
-फसीउद्दीन कुरैशी
अध्यक्ष
ऑल इण्डिया जमीयतुल कुरैश जयपुर।
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"ओबीसी आरक्षण मुस्लिम जातियों और हिन्दू जातियों के हिसाब से नहीं दिया गया था, यह आरक्षण पिछड़ेपन के हिसाब से कमीशन की सिफारिश पर दिया गया था। जिसमें हमारा जुलाहा अन्सारी समाज सहित अन्य समाज भी शामिल हैं।"
-शरफुद्दीन अन्सारी
जुलाहा अन्सारी बिरादरी जयपुर।
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"भाजपा ओबीसी रिजर्वेशन को धर्म के आधार पर बांटना चाहती है जो कि सरासर गलत है। जिन मुस्लिम जातियों को ओबीसी में शामिल किया गया था, उन्हें उनके सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर मंडल कमीशन और अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश पर संवैधानिक प्रावधान के तहत शामिल किया था, ताकि इन पिछड़ी मुस्लिम जातियों को भी आगे बढ़ने का अवसर मिले।"
-हाकम अली देशवाली डीडवाना।
(01/06/2024)
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माशा अल्लाह बहुत बेहतरीन आर्टिकल अल्लाह ताअ्ला आप की कोशिश को क़ुबूल फरमाएं आमीन 🤲🏻🌹🤲🏻
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