जोधपुर की मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी और वहां के सर सय्यद का सफरनामा...
जोधपुर की मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी और वहां के सर सय्यद का सफरनामा...
मरहूम जनाब हाजी मोहम्मद जी, इमदाद अली, इब्राहीम जागीरदार, इस्हाक मास्टर साहब, जैनू खां जी और जनाब शौकत अंसारी ने इसकी शुरुआत की थी। लाल मोहम्मद जी नीलगर इसके ठेकेदार थे। पैसे की तंगी से स्कूल का निर्माण रुक गया। उधर तकिया चाँदशाह में काम छिड़ा हुआ था। स्कूल में उस समय जो मुस्लिम 15 हजार देगा, कमरे का निर्माण करवायेगा उसके बताये नाम की तख्ती कमरे पर लगायी जायेगी, तो फिर कुछ और पैसा आया। ठेकेदार का बकाया चुकाया, तो काम फिर शुरू हुआ। अक्टूबर 1985 में मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर और अशोक गहलोत की मौजूदगी में एक समारोह बाद ये स्कूल चल पड़ा। लेकिन तब तक दिन-रात जी तोड़ मेहनत मशक्कत करने वालों ने ना तो खुद ने ना ही किसी और ने उन्हें सर सैयद अहमद खान कहा।
तकिया चाँदशाह में निर्माण की पहल सेठ नूर मोहम्मद कोहिनूर ने की, शब्बीर भाईजान साथ जुड़े। शब्बीर भाईजान की बॉल बेयरिंग की गोलियां बनाने की फैक्ट्री थी और उन बॉल बेयरिंग के अन्दर लगने वाली जाली बनाने की शिप हाऊस इलाके में एक अन्य फैक्ट्री चलती थी, जिसे अतीक गौरी चलाते थे। ये फैक्ट्री बाद में इंडस्ट्रियल एरिया, काजरी के सामने आदि जगहों पर डोलते आखिर बंद हो गई। बावजूद उस फैलियर अतीक गौरी को शब्बीर भाईजान अशरफ मंजिल से उठा लाये। आज के 78 वर्षीय अतीक गौरी उस समय 35 के थे। नूर जी ने उस नौजवान पर भरोसा कर लिया। आज खुद नूर जी को अतीक गौरी ठेंगा दिखा, बुजुर्ग सरपरस्त की बेइज्जती कर रहे हैं। इसे कहते हैं 'घमंड की इन्तहा'। चाँदशाह तकिये के रास्ते शब्बीर भाईजान के कंधे पे पांव रख अतीक गौरी मारवाड़ मुस्लिम एज्युकेशन एण्ड वेलफेयर सोसाइटी की पहली सीढ़ी चढ़ा। सर सैयद अहमद खान ने ऐसा कभी नहीं किया वे नरम दिल मुस्लिम लीडर थे।
अतीक गौरी मूलतः पाकिस्तान की पैदाईश है और सर सैयद अहमद खान दिल्ली के जाये जन्मे। अतीक के वालिद जनाब सद्दीक साहब थे और आखिरी वक्त तक उन्होंने पाकिस्तान में ही पाकीजा जिंदगी गुजरी। भारत-पाक बंटवारे में अतीक जोधपुर अपने नाना की परवरिश में आ गये और इनकी वलदियत मोहम्मद उमर लिख दी गई। अतीक दसवीं भी नहीं पढ़े? और धंधे लग गये। जबकि सर सैयद अहमद खान बहुत ज्यादा पढ़े लिखे विद्वान प्रतिभा के धनी थे। सर सैयद अहमद खान की पैर की जूती बराबर भी अतीक का मय्यार नहीं। ना पढ़ाई में, ना ईमानदारी में ना व्यक्तित्व में, ना कृतित्व में। किसी जिद्द में, ना घमंड में।
वर्ष 1999-2000 में स्कूल और सोसाइटी पर सत्ता के लिये घमासान हुआ। सद्दीक मेहर व ठेकेदार अब्दुल समद गुट और अतीक-शब्बीर भाईजान खेमे में जमकर लाठी भाटा जंग हुई। पुलिस, कोर्ट-कचहरी हुये और शब्बीर भाईजान-अतीक गौरी सत्तासीन हो गये। फैक्ट्री उठ गई, यहां इतनी बड़ी फैक्ट्री जो हाथ लग गई थी। सर सैयद अहमद खान के साथ ऐसा नहीं हुआ।
सत्ता हथियाने के बाद अतीक सहित 11 लोग 'इंडिया टूर' पर निकले। मुंबई, पूना, बैंगलोर, मद्रास, कलकत्ता होते दिल्ली आये। पूना पहुंचते ये 11 से बढ़कर 15 हो गये। 25 दिन में टूर पूरा किया, सोसाइटी के पैसे से मौजा ही मौजा। पूना में 'आजम कैम्पस' देखा। पी इनामदार से मिले। इदारा चलाना सीखने की बजाय ये पता किया कि चंदे में बड़ी-बड़ी रकम देने वाले कौन-कौन अल्लाह के सखी हैं। पता चला 'एलाना ग्रुप' के झुंझुनूवाला हैं। नाम पता ले आगे बढ़ते गये और जकात खैरात इमदाद करने वालों को खोजते रहे। सोसाइटी के लिये कम और खुद के लिये ज्यादा ? मक्का की सर जमीं पर भी जाकर एसी कथित हरकतों से नहीं चूके ? ऐसी एक भी मिसाल सर सैयद अहमद खान के लिये नहीं है।
मारवाड़ मुस्लिम एज्युकेशन एण्ड वेलफेयर सोसाइटी को वर्ष 2007 में बीएड कॉलेज, आईटीआई चलाने की इजाजत मिली, तो 'ऊपर की दो नम्बरी इन्कम' चालू हो गई। उस जमाने में सालाना ढाई से तीन लाख की ऊपरा ऊपरी की ये रकम सीधी जेब में आनी चालू हो गई। ये कोई 5 साल चला। जितेंद्र खत्री तब भी इनके साथ इस कथित भ्रष्टाचार में शामिल थे ? सर सैयद अहमद खान ने ये ऊपर वाली कमाई कभी नहीं देखी ना जेब में डाली ना किसी लाभार्थी को डालने दी।
अतीक गौरी ने अपने साले के साले डॉक्टर नोमान गौरी से विदेश से शुरू में खूब पैसा हासिल किया। 'एलाना ग्रुप' से धोबे भर-भर कर स्कूल के नाम पर नोट झटकाये। डॉक्टर गुलाम रब्बानी और हाजी इबादुल्लाह जी ने मुंबई के जाफर भाई से वर्ष 2012 - 2013 में 5 करोड़ दिलवाये। जनाब जाफर ने अलग से डेढ़ करोड़ रुपये यह कहकर दिया कि ये ब्याज लाभ से अर्जित पैसा है, इससे चारदीवारी या टॉयलेट बनवा दें स्कूल में नहीं लगायें। वो रकम साढ़े 6 करोड़ कहां लगी, खुलासा नहीं है ? मगर सर सैयद अहमद खान के नाम ऐसा कोई बदनुमा दाग इतिहास में नहीं है। अतीक गौरी का यही गुजरा सच है। कहां राजा भोज कहां गंगू तेली ?
मूलतः गुजरात के रहने वाले हमीद भाई और मजीद भाई जो लंदन में रहते हैं उनसे करोड़ों-करोड़ की इमदाद मिली, कहां गई रकम ? फलोदी, जैसलमेर, पोकरण, बाड़मेर आदि पड़ौसी इलाके के मुसलमानों को पीने का शुद्ध और मीठा पानी सुलभ हो इसके लिये अथाह रकम करोड़ों में इन्होंने दी। किसी एक गांव में भी मीठा और शुद्ध पानी किसी मुसलमान को नहीं मिला ? हमीद भाई, मजीद भाई ने मुसलमान बेरोजगार युवकों को एक-एक परिवार में 5-5 बकरियां और 1-1 बकरा देकर रोजगार से स्वावलंबी बनाने के लिये करोड़ों दिये। गरीब बेरोजगार मुसलमान युवकों को टेक्सी दिलाकर खाने कमाने के साधन देने के लिये फिर अलग से बहुत बड़ी राशि दी। इन अतीक गौरी ने कुछ पुरानी ऑटो खरीद खानापूर्ति बता दी। सौ गायों से गोशाला खोली और शिवसेना के संपत्त पूनिया से कथित मिलीभगत कर उसे बन्द की। गूगल पर भी सर्च किया लेकिन सर सैयद अहमद खान की जीवनी में ऐसा दाग नहीं है।
और तो और आज मुस्लिम कौम पर 3 करोड़ के जूते का पड़ना तय माना जा रहा है, इन्हीं अतीक गौरी की वजह से। तकिया चाँदशाह में 45 से 50 किरायेदारों के खिलाफ इस समय वक्फ ट्रिब्यूनल और वक्फ स्टेट ऑफिसर की अदालत में किराये संबंधी मामले विचाराधीन हैं। तकिये के दो किरायेदार जो अतीक गौरी के अति निकट के रिश्तेदार हैं उन्हें मुतवलिये कमेटी सचिव होने के नाते बकाये किराये में अतीक गौरी ने 12 लाख 62 हजार 800 रुपये की छूट कर औरों को रास्ता दिखाया है कि इस नजीर को पेश कर वे भी लाभान्वित हो लें।
अतीक गौरी ने यहां सचिव की हैसियत से अपने पोती दामाद अनिसुल हसन गौरी वल्द मोहम्मद हसन गौरी को 5 लाख 58 हजार 800 और साले के लड़के अब्दुल्ला उजैर गौरी वल्द जाकिर हुसैन को 7 लाख 4 हजार की बकाया किराये में छूट दी है। ये छूट 1 अप्रेल 2018 से 31 अगस्त 2022 के बकाया किराये में यह कहते हुये की है कि कोरोना अवधि में धंधे मंदे होने से छूट दी जाती है जबकि कोरोना की बीमारी 2020 - 2021 के मध्य थी। अब अन्य करीब 48 किरायेदार वैसी ही और उतनी ही छूट मांग रहे हैं। कोर्ट ने अगर अतीक के रिश्तेदारों को दी छूट को नजीर मान ली, तो कौम को तकिया चाँदशाह के किराये की आमदनी का ये सीधा सीधा 3 करोड़ का जूता पड़ सकता है। सर सैयद अहमद खान ने तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के लिये एक-एक रुपया जुटाया और अतीक ने अंधा बांटे रेवड़ी फिर फिर खुद को ही दे।
अतीक गौरी ने कथित भ्रष्ट तरीके अपना कर ना सिर्फ मुस्लिम कौम का करोड़ों करोड़ रुपया अपनी गुल्लक में डाला बल्कि जोधपुर और जोधपुर से बाहर भी कौम के पैसों से अकूत चल-अचल बेनामी संपत्तियां अर्जित की है। गंगाणा क्षेत्र में अरबिया मदरसे की 13.5 बीघा जमीन का म्यूटेशन अपने परिजनों के नाम करवा रखा है। आज इस जमीन की बाजारू कीमत सौ करोड़ रुपये आंकी जा रही है।



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