लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी की जीत हुई या राहुल गांधी की ?

लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी की जीत हुई या राहुल गांधी की ?

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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। 04 जून का इंतजार देश की जनता बड़ी बेसब्री से कर रही थी। इस दिन लोकसभा चुनाव 2024 की मतगणना होनी थी। लोगों के दिमाग में दिन रात एक ही सवाल घूम रहा था कि मोदी वापस आएगा या चला जाएगा ? सत्ताधारी पार्टी भाजपा और विपक्षी गठबंधन इंडिया की आईटी सेल सोशल मीडिया पर झूठे आंकड़े परोसकर लोगों को दिशा भ्रमित कर रहे थे।


टीवी चैनल और यूट्यूब चैनल अपनी अपनी डफली बजा रहे थे, कोई मोदी को ऐतिहासिक बहुमत से वापस ला रहा था, तो कोई मोदी को सत्ता से बेदखल कर राहुल गांधी की ताजपोशी कर रहा था। जब एग्जिट पोल आए तो उन्होंने भी बड़ी जीत भाजपा एनडीए की बताई। कुछ ने अपने आंकड़े 400 पार या उसके आस पास भी बता दिए। यह सब कुछ फर्जीवाड़ा था, जमीनी सच्चाई कुछ और ही थी, जिसे दो आने की सियासत जानने वाला भी आसानी से समझ सकता था।

"थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका" की टीम राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश की दर्जनों सीटों पर ग‌ई। जहां इस सवाल को जानने की कोशिश की कि राष्ट्रीय स्तर पर कौन जीत रहा है ? धरातल की सच्चाई बाबुलंद आवाज में कह रही थी कि न मोदी जा रहा है और ना ही इंडिया गठबंधन जीत रहा है। न भाजपा गठबंधन 400 पार जा रहा है और ना ही इंडिया गठबंधन 272 के बहुमत वाले आंकड़े के पास पहुंच रहा है। यह बात हमने पहले भी अपने लेखों और एपिसोड में स्पष्ट तौर पर बताई थी कि "भाजपा की सीटें घटनी तय हैं, लेकिन इतनी नहीं घटेंगी कि उसे सत्ता से बेदखल कर दिया जाए, इंडिया गठबंधन की सीटें बढ़ेंगी, लेकिन इतनी नहीं बढ़ेंगी कि प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली जाए।"

"थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका" ने 01 जून की शाम को जो एग्जिट पोल जारी किया था, उसमें भाजपा को 245-255 और एनडीए को 270-280 सीटें दी थी। इसी तरह कांग्रेस का आंकड़ा 75-85 और इंडिया गठबंधन (ममता बनर्जी को छोड़कर) का आंकड़ा 185-195 बताया था, ममता बनर्जी का 30-35 सीटों का अंकड़ा बताया था। थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका के आंकड़े मतगणना के दिन बड़ी हद तक सही साबित हुए। ऐसे आंकड़े किसी भी एग्जिट पोल के नहीं रहे, जबकि एग्जिट पोल करने वाले एक से बढ़कर एक विद्वान हैं, तो क्या उन्हें धरातल की सच्चाई नजर नहीं आई या उन्होंने अपनी विश्वसनीयता दांव पर लगाकर किसी एजेंडा विशेष के लिए बिना सिर पैर के आंकड़े जारी किए ?

अब आते हैं इस लेख के मूल सवाल की तरफ कि इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जीत हुई या राहुल गांधी की ? यह सवाल इसलिए कि मैदान में मोटे तौर पर दो ही चेहरे थे। इस सवाल का जवाब यह है कि दोनों ही नहीं जीते, बल्कि दोनों की करारी हार हुई है। वो इसलिए कि मोदी ने 400 पार का नारा लगा रखा था, जो परिणाम आए वे 300 के भी नीचे रह गए और सिर्फ सरकार बनाने का जुगाड़ हुआ है। मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए 2002 में पहला चुनाव लड़ा, तब से 2019 के लोकसभा चुनाव तक हर चुनाव में वे बड़ी और स्पष्ट जीत से सत्ता में रिपीट होते रहे हैं। यह पहली बार हुआ है कि मोदी को खुद के बलबूते स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है और गठबंधन सरकार बनाना उनकी मजबूरी बनी है। इसलिए यह लोकसभा चुनाव मोदी की खुली हार है।

जहां तक बात राहुल गांधी की है तो उन्होंने दो बड़ी न्याय यात्राएं निकाली, जमकर लफ्फाजी की। एक एक सीट के लिए उनके नेता साथी दलों से खींचतान करते रहे, एनवक्त पर भागते भागते सीट शेयरिंग हुई। पंजाब, बंगाल और केरल में साथी दलों के सामने चुनाव लड़ा। केरल में पूरी ताकत झौंककर उस चरण में बाकी देश भाजपा गठबंधन के लिए छोड़ दिया। खुद ही सम्भावित सत्ता का दूल्हा बनने के चक्कर में साथी दलों के प्रचार पर कोई फोकस नहीं किया। परिणाम सामने है मोदी को सत्ता से फटाफट खटाखट हटाने वाले राहुल गांधी कांग्रेस को तीन अंकों में सीट नहीं दिला पाए और 99 के फेर में सबको उलझा दिया। यह चुनाव राहुल गांधी के लिए भी हार साबित हुआ है, हालांकि यह जरूर कहा जा सकता है कि उन्होंने 52 सीटों से कांग्रेस को डबल के नजदीक लाकर 99 सीटों तक पहुंचा दिया तो एक तरह की जीत ही हुई है। लेकिन असल जीत सत्ता में आना और प्रधानमंत्री बनना था, उस पिच पर राहुल गांधी हार गए हैं।

यह चुनाव पूरी तरह से मोदी विरोध और मोदी समर्थन दो खेमों में बंट गया था। जो मोदी को वापस लाना चाहते थे उन्होंने भाजपा को वोट दिया और जो मोदी को हटाना चाहते थे उन मतदाताओं ने मोदी विरोधी पार्टियों यानी इंडिया गठबंधन के जिताऊ उम्मीदवार को वोट दिया। चुनाव को पूरी तरह से पीएम मोदी ने खुद ही खुद के विरोध और समर्थन में केन्द्रित कर दिया था। मोदी की गारंटी और मोदी का चेहरा, मोदी को वोट देना है, ऐसे नारे और भाषण हर मंच पर प्रधानमंत्री ने दिए। भाजपा का प्रचार भी इन्हीं मुद्दों पर केन्द्रित रहा, जो भारतीय चुनावी इतिहास में पहली बार देखा गया। इससे भाजपा में बैठे हुए मोदी विरोधी नेता भी मोदी के खिलाफ हो ग‌ए और उन्होंने पूरी ताकत से कारसेवा की। जिसका लाभ उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में स्पष्ट रूप से विपक्षी दलों को मिला है।

खबर है कि दोनों ही खेमों में जमकर भितरघात हुआ है। भाजपा खेमे को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की वजह से नुक़सान हुआ है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि इन तीनों की कारसेवा से भाजपा को करीब ढाई दर्जन सीटों का नुक़सान हुआ है। इसी तरह इंडिया गठबंधन के खेमे में भी भितरघात हुआ है। जो बिहार, झारखंड, कर्नाटक, ओडिशा, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि के परिणामों में स्पष्ट नजर आ रहा है।

खबर है कि बिहार में कांग्रेस ने बिना मन से गठबंधन का साथ दिया और अन्दरखाने बड़ा खेल किया, परिणाम सामने है आरजेडी की मजबूत खटिया को कांग्रेस ने पलट दिया। ऐसा ही उसने ओडिशा में बीजेडी को सत्ता से बेदखल करने के लिए किया, अन्दरखाने कांग्रेस ने यहां भाजपा को कांधा लगाकर उसे एकतरफा जीत दिला दी। झारखंड में हेमंत सोरेन के साथ और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के साथ भी कांग्रेस ने यही खेला किया। जिससे पूरा इंडिया गठबंधन 240 से कम पर अटक गया।

इस चुनाव की खास बात यह थी कि जनता बदलाव चाहती थी, जो विपक्षी दलों की खुदगर्जी और गैर जिम्मेदाराना रणनीति की वजह से नहीं हो पाया। कांग्रेस ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अपना घोषणा पत्र जारी किया, बड़ी सभा बुलाई। अगर उस दिन यह घोषणा पत्र इंडिया गठबंधन का जारी होता और सभी साथी नेता मंच पर होते तथा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे को प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित कर देते तो मैदान पूरी तरह से पलट जाता।

इसी तरह मोदी अगर स्पष्ट बहुमत चाहते तो उन्हें आसानी से मिल जाता। अगर वे चुनाव को खुद पर केन्द्रित नहीं करते, चुनाव को हिन्दू मुस्लिम बनाने की बजाए अपनी 10 साल की प्रोग्रेस रिपोर्ट पर केन्द्रित रखते तथा सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास वाले खुद के नारे को इस चुनाव का मुख्य फोकस बिन्दु बनाते तो यकीनन भाजपा 303 पार कर जाती। हर लोकसभा सीट पर औसतन 20 से 35 हजार मुस्लिम वोट भाजपा को मिलते रहे हैं, लेकिन इस बार गैर जरूरी अन्दाज में मोदी ने मंच से मुस्लिम समुदाय को जो टारगेट बनाया, उससे यह वोट भाजपा की बजाए इंडिया गठबंधन की तरफ एकजुट हो गया। खबर है कि मोदी की मुस्लिम विरोधी बयानबाजी ने भाजपा का नुक़सान और इंडिया गठबंधन का फायदा किया, इससे इंडिया गठबंधन को 40 से ज्यादा सीटों पर आसानी से जीत मिल गई, जो पिछली बार भाजपा ने जीती थी।

इसी तरह मोदी का 400 पार नारा भी आत्मघाती साबित हुआ। इससे विपक्षी दलों ने यह बात वोटर खासकर दलित और आदिवासी वोटर के गले उतार दी कि मोदी 400 पार संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के लिए मांग रहे हैं। इसका भी बड़ा नुक़सान भाजपा को हुआ है। कारण जो भी रहे, हार जीत किसी की भी हुई, लेकिन इस चुनाव में यह स्पष्ट हो गया कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ाई जा सकती। इस चुनाव में यह भी स्पष्ट हो गया कि हार का ठीकरा ईवीएम के सिर फोड़ना भी अक्लमंदी नहीं है।
(09/06/2024)
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