सियासी अखाड़े का आधुनिक दांवपेंच ?

सियासी अखाड़े का आधुनिक दांवपेंच ?

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सड़क पर जनहित के लिए आंदोलन करना, विरोध प्रदर्शन में पुलिस की लाठियां खाना और जनता के लिए जेल जाना सियासी नेताओं की पहचान होती थी, लेकिन कुछ बरसों से एक अनोखा दांवपेंच भी शुरू हो गया है, धार्मिक सामाजिक जलसे जुलूस करना, सामूहिक विवाह सम्मेलन और सम्मान समारोह करना। पैसे वाले लोग ऐसी ढोंग तपस्या करके सियासी सीढियां चढ़ने में सफल तो हो जाते हैं लेकिन जनहित और आंदोलन का इन्तकाल हो जाता है।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। हमारे देश में एक से बढ़कर एक राजनेता ऐसे हुए हैं, जिन्होंने जनहित के मुद्दों पर जबरदस्त आंदोलन किए हैं, विरोध प्रदर्शन में पुलिस के लाठीचार्ज में लाठियां खाई हैं। जनता के लिए जेल गए हैं और फिर चुनाव मैदान में उतरकर सत्ताधारी उम्मीदवारों को धूल चटाई है। कुछ तो जेल से पर्चा भरकर ही चुनाव जीते हैं। कुछ ऐसे भी नेता हुए हैं जो चुनाव तो कभी नहीं जीत पाए लेकिन उन्होंने सत्ताधारी लोगों की नाक में जनहित के मुद्दों पर पूरे जीवन नकेल डाल कर रखी थी। यह सब संघर्ष वे इसलिए कर पाए क्योंकि वे फकड़ फकीर थे, धन्नासेठों के गुलाम नहीं थे। कुछ नेता आज भी ऐसे हैं। लेकिन अब सियासत का ट्रेंड बदल गया है।


जनहित के लिए आंदोलन करने की बजाए पिछले कुछ बरसों में एक नया सियासी ट्रेंड शुरू हो गया है। वो है बिना कुछ किए भीड़ इकट्ठी की जाए, उस कार्यक्रम को कुछ रंग रूप दिया जाए और फिर उस कार्यक्रम में शामिल भीड़ के कांधों पर पैर रखकर सियासी सीढियां चढ़ा जाए। यह सियासी अखाड़े का आधुनिक दांवपेंच है। इसके लिए विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जो लोगों की भावनाओं से जुड़े हुए होते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में आसानी से भारी भीड़ जमा हो जाती है।

ऐसे कार्यक्रमों में आयोजक, संयोजक वगैरह कोई ना कोई धन्नासेठ होता है, क्योंकि कार्यक्रम पर काफी पैसा खर्च होता है, इसलिए धन्नासेठ ही आगे आगे रहता है और उसी को सियासी सीढियां चढ़ना होता है या परिवार के किसी सदस्य के लिए सियासी मैदान तैयार करना होता है। यह कार्यक्रम धार्मिक और सामाजिक भी हो सकते हैं, सामूहिक विवाह सम्मेलन और सम्मान समारोह भी हो सकते हैं। समय, क्षेत्र व सियासी परिस्थितियों के अनुसार जैसी आवश्यकता हो और जैसे कार्यक्रम से सियासी सीढियां चढ़ना आसान हो वैसा ही डिजाइन किया जाता है। फिर आधुनिक नेताजी और उनकी आईटी सेल सोशल मीडिया पर जमकर इसका प्रचार करते हैं

ऐसे कार्यक्रमों में आम आदमी के साथ बड़े बड़े लोगों को भी आमंत्रित किया जाता है, कार्यक्रम में सभी के लिए आना आसान रहता है, क्योंकि दिखने में यह कोई सियासी कार्यक्रम नहीं होता है। इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग, सरकारी अधिकारी कर्मचारी यानी सभी के लिए शरीक होना आसान रहता है, क्योंकि कार्यक्रम तो राजनीतिक है नहीं।

ऐसे कार्यक्रम पिछले एक दशक में काफी बढ़ ग‌ए हैं। ऐसा भी नहीं है कि इन कार्यक्रमों से किसी का भला नहीं होता है, जरूर होता है। लेकिन पूरा कार्यक्रम पर्दे के पीछे एक सियासी खेल के अलावा कुछ नहीं होता है। ऐसे कार्यक्रम करने वाले नेताजी हर समाज और इलाके में मौजूद हैं। ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने वाले नेताजी जनहित के लिए किए जाने वाले आंदोलन को पंक्चर करने, सत्ता व सियासत की मलाई खाने और खिलाने में माहिर होते हैं।‌

ऐसे धन्नासेठ नेताओं की वजह से जनहित के लिए किए जाने वाले आंदोलनों और जनहित का इन्तकाल हो जाता है तथा ऐसे लोग सत्ता व सियासत की कुर्सियों पर विराजमान हो जाते हैं जिनका जनता की पीड़ा से कोई लेना-देना नहीं होता है। ऐसे धन्नासेठ नेताओं को इन कार्यक्रमों को आयोजित करने के साथ यह भी बताना चाहिए कि उन्होंने अपनी जेब से हर साल कितने गरीब बच्चों की फीस जमा करवाई ? उन्होंने कितने जरूरतमंद बच्चों को कोचिंग भिजवाकर अधिकारी बनने में उनकी मदद की ?
(24/07/2024)
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