पुलिस की वर्दी में चौथ वसूली खाकी पर बड़ा दाग़

पुलिस की वर्दी में चौथ वसूली खाकी पर बड़ा दाग़

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पुलिस गुंडों का सबसे संगठित गिरोह है : जस्टिस मुल्ला
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। "पुलिस गुंडों का सबसे संगठित गिरोह है।" यह टिप्पणी किसी मामूली शख्स की नहीं है। यह तल्ख टिप्पणी साठ के दशक में इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस आनन्द नारायण मुल्ला ने एक केस की सुनवाई में की थी। इस केस में पुलिस के चरित्र को देखकर जस्टिस मुल्ला ने पुलिस की जमकर खिंचाई की थी। पुलिस के चरित्र पर ऐसी ही तल्ख टिप्पणी अगस्त 2021 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना ने भी एक कार्यक्रम में की थी।


इस कार्यक्रम में जस्टिस एनवी रमन्ना ने कहा कि "पुलिस स्टेशन मानवाधिकारों एवं मानवीय सम्मान के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। मानवाधिकारों के हनन और शारीरिक यातनाओं का सबसे ज्यादा खतरा थानों में है। थानों में गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्तियों को प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिल पा रही है जबकि इसकी बेहद जरूरत है।"

ऐसी तल्ख टिप्पणियों के बावजूद पुलिस महकमे में कोई बड़ा सुधार नजर नहीं आता है। आए दिन पुलिस की ज्यादती के मामले देश में कहीं न कहीं होते हैं, उन पर ख़बरें बनती हैं। पुलिस के आला अधिकारी और मंत्री व मुख्यमंत्री ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई करने की दुहाई देते हैं। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहता है। ऐसे मामलों में कुछ पुलिस अधिकारी व कर्मचारी सस्पेंड हो जाते हैं, कुछ को एपीओ कर दिया जाता है, कुछ को लाइन हाजिर कर दिया जाता है और कुछ दिनों बाद गाड़ी पहले की तरह वापस उसी पटरी पर दौड़ने लग जाती है।

ताज़ा मामला राजस्थान पुलिस का है। जिसमें पुलिस अधिकारियों और पुलिस कर्मियों के एक संगठित चौथ वसूली गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। मामले का पर्दाफाश भी तब हुआ जब पीड़ित ने कोर्ट की शरण ली। खबर है कि जयपुर कोर्ट ने दो करोड़ से अधिक की अवैध वसूली के मामले में 2 डीएसपी, 6 एसएचओ, 2 एएसआई सहित 44 लोगों के खिलाफ एसओजी को जांच कर 17 सितम्बर 2024 तक रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।

मामला बिजयनगर (ब्यावर) के कार्गो व्यवसायी शंभूदयाल गुर्जर का है, जिससे पुलिस ने न सिर्फ संगठित गुंडा गिरोह की तरह चौथ वसूली की है बल्कि विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित कर झूठे केसों में फंसाने की धमकी भी दी है। मामले की सुनवाई में जयपुर कोर्ट ने इसे पुलिस वालों का संगठित अपराध बताया है। इस मामले में जब पीड़ित शंभूदयाल गुर्जर ने और रूपए देने से मना कर दिया तो पुलिस ने उसे हनी ट्रैप में फंसाकर गिरफ्तार कर लिया और थाने ले जाकर जबरदस्त ज़ुल्म किया। पीड़ित का आरोप है कि ज़ुल्म इस कद्र किया कि बाल और खाल तक उखाड़ दिए।

पुलिस द्वारा किए गए इस अपराध का खुलासा भी तब हुआ जब हिम्मत कर पीड़ित शख्स न्यायालय की शरण में पहुंचा, जबकि बहुत से पीड़ित ऐसे भी होंगे जो दबाव झेलते रहते हैं और जो मांगे वो देते रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि पुलिस के उच्चाधिकारियों को अपने महकमे की ऐसी घिनौनी कहानियां मालूम नहीं होती। वे या तो किसी दबाव में ऐसे पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई नहीं करते हैं या फिर किसी लालच में।

पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी डीजीपी होता है, जो 25-30 साल पहले किसी जिले में एसपी भी रहा था। और एसपी को अपने जिले के अपराध और उसमें पुलिस की मिलीभगत की पूरी दास्तां मालूम रहती है। एसपी को यह भी मालूम रहता है कि किस थाने से कितनी वसूली होती है, उसे टारगेट कितना दे रखा है, इसे ऊपर कहां और किसके पास पहुंचाना है। सब कुछ मालूम होने के बाद भी ऐसे अपराध हों तो फिर क्या कहा जाए ? फिर तो माननीय जजों की टिप्पणी सौ प्रतिशत सच है।

राजस्थान में पुलिस थानों के दरवाज़े पर एक वाक्य बड़े अक्षरों में लिखा रहता है, "हमारा ध्येय-अपराधियों में भय, आमजन में विश्वास।" लेकिन उक्त वाक्य बहुत से मामलों में उल्टा हो जाता है और ऐसा ही शंभूदयाल गुर्जर के प्रकरण में हुआ है। ग़लत काम करने वाले पुलिस कर्मियों को ट्रैप एसीबी करती है तथा एसीबी में जो पुलिसकर्मी ट्रैप होते हैं उन पर छोटी मोटी रिश्वत के मामले भी होते हैं और बड़े संगीन मामले भी होते हैं।

रेप, मर्डर, दहेज हत्या, अपहरण जैसे संगीन मामलों में जब कोई पुलिस अधिकारी और पुलिसकर्मी एसीबी के जरिए ट्रैप होता है, तो समझा जा सकता है कि खाकी का चरित्र कहां तक पहुंच गया है ? एक ताज़ा मामला कोलकाता में डाॅक्टर लड़की की हत्या और बलात्कार का भी सुर्खियों में है। जिसमें पीड़िता के पिता ने कहा है कि "बेटी का शव घर में था और डीसीपी मुंह बंद करने के लिए घर पर पैसे देने आए थे।"

पुलिस का यह चरित्र खाकी पर सबसे बड़ा दाग़ है। संविधान की पालना की शपथ लेकर कानून का रखवाला बनने के लिए पहनी खाकी पर जब खाकी वाले ही दाग़ लगाएंगे तो फिर आमजन में विश्वास कैसे पैदा होगा ? ऐसा भी नहीं है कि सारे खाकी वाले एक जैसे हैं। खाकी में काफी लोग अपने महकमे के ऐसे घिनौने कामों से नफ़रत करते हैं, लेकिन सुधार करने के लिए उनका बस नहीं चलता है। खाकी वर्दी में देवता समान लोग भी हैं, जो पीड़ित के पक्ष में सबसे भीड़ जाते हैं और अपने ही महकमे की फटकार और प्रताड़ना का शिकार भी हो जाते हैं, फिर भी वे ग़लत कामों के दबाव में नहीं आते।
(09/09/2024)
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